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Manan Kumar singh
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Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post मत समझना मैं...(गजल)
"जी नमस्कार आदरणीय समर जी।"
Feb 12
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post मत समझना मैं...(गजल)
"जी आभार आदरणीय।"
Feb 12
Samar kabeer commented on Manan Kumar singh's blog post मत समझना मैं...(गजल)
"जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।"
Feb 12
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post मत समझना मैं...(गजल)
"शकुरजी, शायद आपका मतलब शेर 5 के बदले शेर 6 से है।"
Feb 12
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post मत समझना मैं...(गजल)
"शुक्रिया आदरणीय शकूर जी!जरा विस्तार से कह देते तो जल्दी ध्यान चला जाता,सादर।"
Feb 12

सदस्य कार्यकारिणी
शिज्जु "शकूर" commented on Manan Kumar singh's blog post मत समझना मैं...(गजल)
"आ. मनन सिंह सर, अच्छी ग़ज़ल है, सादर बधाई। शेर क्र. 3 और 5 में तक़ाबुल ज रदीफ़ की सूरत बन रही है ज़रा देख लीजिएगा।"
Feb 12
Manan Kumar singh posted a blog post

मत समझना मैं...(गजल)

2122 2122 2122 2मत समझना मैं पढ़ा अख़बार हूँ कल काहमसफ़र हूँ,काबिले-आसार हूँ कल का।1राह सिमटी जा रही है आज की पल-पलदेख लो मुझको जरा आधार हूँ कल का।2कौड़ियों के मोल बिकता आज तुम्हारासच लिए चलता रहा मनुहार हूँ कल का।3रोशनाई की उमंगों का रहा कायललग रहा जैसा भले उजियार हूँ कल का।4हो गया धुँधला बदन करतूत तेरी हैमौन हूँ मैं आज पारावार हूँ कल का।5बेच लो अपनी हकीकत हो सके जितनासच लिए सबका खरा बाजार हूँ कल का।6गीत अपने तुम सुना लो आज ढुलमुल-सेगर्दिशों से जूझता अशआर हूँ कल का।7 "मौलिक व अप्रकाशित"See More
Feb 9
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-46 (विषय:मोह)
"शुक्रिया।"
Jan 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-46 (विषय:मोह)
"बहुत बहुत आभार आदरणीया बबिता जी।"
Jan 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-46 (विषय:मोह)
"जी आभार,आपको सही सही याद है,सादर।"
Jan 30
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-46 (विषय:मोह)
"आभार आदरणीय।"
Jan 29
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-46 (विषय:मोह)
"आदरणीय उस्मानीजी, पिछली लघुकथा गोष्ठी में प्रकाशित मेरी लघुकथा पर गौर करें।"
Jan 29
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-46 (विषय:मोह)
"आदरणीय उस्मानीजी!याद करें कि कब और कहाँ ऐसी रचना आपने पढ़ी।लघुकथा आपको भाई,इसके लिए आभारी हूँ।"
Jan 29
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-46 (विषय:मोह)
"आभार आदरणीय।"
Jan 29
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-46 (विषय:मोह)
"आभारी हूँ मोहतरम।"
Jan 29
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-46 (विषय:मोह)
"आभारी हूँ आदरणीय।"
Jan 29

Profile Information

Gender
Male
City State
Mumbai
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E 52 Krishna Apt , Patna
Profession
Service
About me
A poet/ Writer

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मत समझना मैं...(गजल)

2122 2122 2122 2

मत समझना मैं पढ़ा अख़बार हूँ कल का

हमसफ़र हूँ,काबिले-आसार हूँ कल का।1

राह सिमटी जा रही है आज की पल-पल

देख लो मुझको जरा आधार हूँ कल का।2

कौड़ियों के मोल बिकता आज तुम्हारा

सच लिए चलता रहा मनुहार हूँ कल का।3

रोशनाई की उमंगों का…

Continue

Posted on February 8, 2019 at 11:00pm — 6 Comments

गजल(जैसे तैसे बात बनी है...)

22  22  22 22

जैसे-तैसे बात बनी है

रमई चादर हाथ लगी है।1

मंदिर-मंदिर घूम रहा मैं

चमचा-चमचा आस पली है।2

'बबुआ काम करेगा बढ़कर',

'दादाओं' ने बात कही है।3

'मम्मी' का मैं राजदुलारा

लगता, 'पगड़ी' माथ चढ़ी है।4

अपनी कुर्सी पर बैठा 'वह'

दिल में कितनी बात खली है!5

साँझ-सबेरे ईश-विनय कर

'राम-रमा' में प्रीत जगी है।6

रंगे आज सियार बहुत हैं

मुझपर सबकी आँख लगी है।7

चोट…

Continue

Posted on November 11, 2018 at 11:08am — 6 Comments

गजल(उठे हैं.....)

122 122  122 12

उठे हैं किसी को गिरा के मियाँ

चले पाग सर पे सजा के मियाँ।1

कहा था, डरेगा न कोई यहाँ

रहे खुद को हाफ़िज बना के मियाँ।2

रहेगा न सूखा शज़र एक भी--

कहें नीर सारा सुखा के मियाँ।3

मिटी भूख उनकी हुए सब सुखी

चहकते चले माल खा के मियाँ।4

किये लाख सज़दे, मिले कब सनम?

गये थे कभी सर नवा के…

Continue

Posted on October 29, 2018 at 7:15am — 10 Comments

गजल(था कभी...)

2122 2122 2122 212
था कभी कितना नरम वह! हर कदर आखर हुआ
जब हवाओं ने छुआ तब पात वह जर्जर हुआ।1

सूख जाती है सियाही आजकल जल्दी यहाँ
ख्वाहिशों के फ़लसफों पे आदमी निर्झर हुआ।2

मिट्टियों की कौन करता है यहाँ पड़ताल भी
हर शज़र गमला सजा आकाश पर निर्भर हुआ।3

जो उड़ाता था वहाँ बेपर घटाओं को कभी
देखते ही देखते वह आजकल बेपर हुआ।4

वक्त की मदहोशियाँ क्या-क्या करा देतीं यहाँ
गर्द के बस ढ़ेर जैसा एक दिन अकबर हुआ।5
"मौलिक व अप्रकाशित"

Posted on October 23, 2018 at 10:00am — 5 Comments

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At 11:03pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
आदरणीय
श्री मनन कुमार सिंह जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
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सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन
At 8:47pm on May 24, 2015, kanta roy said…
स्वागत आपका दोस्त
At 5:20pm on April 12, 2015, Manan Kumar singh said…
आदरणीय गोपालजी, आपकी मित्रता मेरे लिए अमूल्य है।
At 8:29pm on April 7, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ0 मनन जी

आपकी मित्रता मेरा गौरव है . सादर .

 
 
 

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