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एक अनुत्तरित प्रश्न

हां ठीक था, अर्जुन !

तुम अपने युयुत्सु परिजनों पर

शस्त्र न उठाते i

उन्हें अपने गांडीव की प्रत्यंचा

की सीध में न लाते i

तुम्हारा यह निर्णय ठीक होता या न होता

हां सभी मर जाते तो शवो पर कौन रोता ? 

किन्तु यह क्या---

तुम्हारे शरीरांग कांपे क्यों ?

वदन सूखा क्यों,  दशन चांपे क्यों ?

वेपथु क्यों हुआ, क्यों हुआ लोमहर्षण 

अभी तो शंख घोष था, नही था अस्त्र वर्षण 

तब भी तुम्हारे हाथ से गांडीव खिसका

तुम्हारी…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 5, 2013 at 5:24pm — 33 Comments

खेल शब्दो का अजीब नही होता ???

कभी कभी

शब्दो के साथ

खेलने वाले ही

भूल जाते हैं

शब्दो की बाजीगरी

रात-दिन जो

रहते हैं शब्दो के बीच

कभी कभी उनको ही

नही मिलते शब्द

कहने को अपनी बात

जाहिर करने को

अपने जज्बात ....

ऐसा लगता है मानो

रूठ गया हो खुदा भी हमसे 

उनकी ही तरह

जैसे वो रूठे हैं हमसे

सिर्फ कुछ

शब्दो के कारण …

एक ख्याल

बार-बार आता है

मन के छोटे से घर में

कि क्यों नही होता ऐसा

कि जज्बात को …

Continue

Added by Sonam Saini on December 5, 2013 at 4:30pm — 17 Comments

खुशियों के हम दीप जलाएं

खुशियों के हम दीप जलाएं

जग में उजियारा फैलाएं  



हो हमसे कोई हृदय दुखी

वहाँ  प्रेम का बीज बो आयें

खुशियों के हम दीप जलाएं

जग में उजियारा फैलाएं 



हो न कोई भूखा, ग़मगीन

हों सब रोजगारी व ज़हीन

खुशियों के हम दीप जलाएं

जग में उजियारा फैलाएं 



निर्भय हो समाज में सभी जहाँ

बेटियों का हो सम्मान जहाँ  

खुशियों के हम दीप जलाएं

जग में उजियारा फैलाएं



भाई हों राम लक्ष्मण जहाँ

ना हो सीता वनवास जहाँ   …

Continue

Added by Meena Pathak on December 5, 2013 at 4:30pm — 18 Comments

तमन्ना यही एक पूरी खुदा कर : अरुन शर्मा 'अनन्त'

बह्र : मुतकारिब मुसम्मन सालिम

तमन्ना यही एक पूरी खुदा कर,
जमी ओढ़ लूँ मैं फलक को बिछा कर,

शुकूँ से भरी नींद अँखियों को दे दे,
दुआओं तले माँ के बिस्तर लगा कर,

बढ़ा हौसला दे मेरी झोपड़ी का,
बुजुर्गों के आशीष की छत बना कर,

अमन शान्ति का शुद्ध वातावरण हो,
मुहब्बत पिला दे शराफत मिला कर,

सितारों भरी एक दुनिया बसा रब,
अँधेरे का सारा जहाँ अब मिटा कर..

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by अरुन 'अनन्त' on December 5, 2013 at 4:00pm — 38 Comments

ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

हमारे नाम का चर्चा हुआ होगा सितारों में।

ज़माना खोजता होगा हमें भी बेसहारों में॥

.

किसी ने हाथ छोड़ा तो बढ़ा के रुक गया कोई,

हमारी तंगहाली भी नज़ारा थी नज़ारों में।

.

छुपाते हैं जिसे दिल में उसे ही छीन लेता है,

न जाने कौन क़ातिल है हमारे राज़दारों में।

.

न मुड़ के देखती है फिर लहर जो लौट जाती है,

बड़ी गहरी उदासी है समंदर के किनारों में।

.

रिवाज़ों के,समाजों के अजब रंगीन किस्से हैं,

वही जिनसे अदावत थी जमा हैं सोगवारों में।

.

'रवी'… Continue

Added by Ravi Prakash on December 5, 2013 at 3:30pm — 31 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
कुछ दोहे ....................डॉ० प्राची

भाव भँवर को पार कर , अर्पण कर सर्वस्व 

जड़ता जो चेतन करे , उसका चिर वर्चस्व // 1 //

संवेदन से हीन जो , भाव भक्ति से मुक्त 

प्रस्तर सम वह जड़ हृदय , अहंकार से युक्त // 2 //

मूढ़ व्यक्ति के मौन में , परिलक्षित अज्ञान 

संत जनों के मौन का , मूल तत्व निज ज्ञान // 3 //

सजग बुद्धि को दृष्ट है , चित्त वृत्ति का नृत्य 

ज्ञान अगन तप वृत्ति का , सधता है हर कृत्य // 4 //

नहिं अनंत में वृद्धि है , नहिं अनंत का…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on December 5, 2013 at 3:00pm — 35 Comments

***हमसाया हो जाएगा ….***

हमसाया हो जाएगा ….
.
जब जिस्म से
साँसों का बंधन टूट जाता है
विछोह की वेदना में
हर शख्स शोक मनाता है
शोक में दुनियादारी के लिए
चंद अश्क भी बहाए जाते है
आपसी मतभेद छुपाये जाते हैं
याद किया जाता है उसके कर्मों को
उससे अपने प्रगाड़ सम्बन्धों के 
मनके गिनवाए  जाते  हैं…
Continue

Added by Sushil Sarna on December 5, 2013 at 1:00pm — 6 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता - नि:शब्द (गणेश जी बागी)

शब्द कोष से संकलित

क्लिष्ट शब्दों का समुच्चय

गद्यनुमा खण्डित पक्तियों में

शब्द संयोजन

कथ्य और प्रयोजन से कोसों दूर

लक्ष्यहीन तीरों के मानिंद

बिम्ब और प्रतीक

कही तो जा धसेंगे

बस

वही होगा लक्ष्य

फिर.......

पाठक का द्वन्द्ध

बार-बार पढ़ना

पग-पग पर अटकना

समझने का प्रयत्न

गुणा भाग, जोड़ घटाव

सुडोकू सुलझाने का प्रयास

और अंततः

एक प्रतिक्रिया

नि:शब्द हूँ ।

***

(मौलिक व…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 5, 2013 at 11:30am — 51 Comments

वर्तमान पर कविता / संदीप पटेल /अतुकांत

आँखों से बहता लहू

लाल लाल धधकती ज्वालायें

कृष्ण केशों सी काली लालसाएँ

ह्रदय की कुंठा

असहनीय वेदना

दर्दनाक कान के परदे फाड़ती

चीखें

लपलपाती तृष्णा

तिलमिलाती भूख

अपाहिज प्रयास

इच्छाओं के ज्वार भाटे

आश्वासन की आकाशगंगा

विश्वासघाती उल्कापिंड

हवस से भरे भँवरे

शंकाओं से ग्रसित पुष्प

उपेक्षाओं के शिकार कांटे

हाहाकार चीत्कार ठहाके

विदीर्ण तन

लतपथ , लहूलुहान…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 5, 2013 at 11:23am — 14 Comments

ग़ज़ल -निलेश 'नूर'-ऐब खुद में ....

ऐब खुद के ढूंढकर उनसे किनारा कर लिया,

उस जहाँ के वास्ते थोडा सहारा कर लिया.

...

एक पल पर्दा हटा, आँखें खुली बस एक पल,  

क्या ही था वो एक पल, क्या क्या नज़ारा कर लिया.

...

दर्द हद से बढ़ गया, लेनें लगा फिर जान जब,

दर्द हम जीने लगे उसको ही चारा कर लिया.

...

इक तरफ़ तो मौत थी औ इक तरफ़ बेइज्ज़ती,

और हम करतें भी क्या, मरना गवारा कर लिया.

...

वो हमारे दिल को तोड़ें, था हमें मंज़ूर कब,

हमने ही खुद दिल को अपने पारा पारा कर…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on December 5, 2013 at 7:00am — 17 Comments

ग़ज़ल

2122 1212 22

तेरी रहमत अगर हुई होती ।
ज़िंदगी आज ज़िंदगी होती ।

आज पत्ते भी सब हरे होते।
गर हवा इस तरफ चली होती।

राह होती नहीं कभी मुश्किल।
साथ तू भी अगर रही होती।

तू अगर राजदां बना होता।
कोई तुहमत नहीं लगी होती।

कारवाँ दूर तक गया होता।
सोच सबकी अगर भली होती।

वो जुदा हो के भी मिला होता।
बात "साहिल" अगर हुई होती।

केतन साहिल
अप्रकाशित और मौखिक

Added by Ketan "SAAHIL" on December 4, 2013 at 10:30pm — 13 Comments

होंठों पर यूं -हंसी खिली हो

 आओ देखें कविता अपनी

रंग-बिरंगी -सजी हुयी -है

कितनी प्यारी -

मुझको -तुमको लगता ऐसे ...

 

जैसे भ्रमर की कोई

 कली खिली हो

भर पराग से उमड़ पड़ी हो

तितली के संग -

खेल रही हो मन का खेल !!

 

चातक  की चंदा

निकली हो आज -

पूर्णिमा-धवल चांदनी

धीरे -धीरे आसमान में

सरक रही हो

पास में आती

मोह रही हो सब का मन !!

 

बिजली ज्यों बादल का दामन

छू-आलिंगन कर 

चमक पड़ी…

Continue

Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on December 4, 2013 at 7:30pm — 10 Comments

आवारा कवि

अपनी आवारा कविताओं में -

पहाड़ से उतरती नदी में देखता हूँ पहाड़ी लड़की का यौवन ,

हवाओं में सूंघता हूँ उसके आवारा होने की गंध ,

पत्थरों को काट पगडण्डी बनाता हूँ मैं !

लेकिन सुस्ताते हुए जब भी सोचता हूँ प्रेम -

तो देह लिखता हूँ !

जैसे खेत जोतता किसान सोचता है फसल का पक जाना !

 

और जब -

मैं उतर आता हूँ पूर्वजों की कब्र पर फूल चढाने -

कविताओं को उड़ा नदी तक ले जाती है आवारा हवा !

आवारा नदी पहाड़ों की ओर बहने लगती है…

Continue

Added by Arun Sri on December 4, 2013 at 1:13pm — 18 Comments

'मैं' को ध्येय बनाऊँगी

कल्पना के मुक्त पर से

सीमाओं तक जाऊँगी।

दुश्वारियों से परे, निज

अस्तित्व को मैं…

Continue

Added by Vindu Babu on December 4, 2013 at 12:30pm — 30 Comments

बात क्या है जो रात भारी है : अरुन शर्मा 'अनन्त'

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
2122 1212 22

बात क्या है जो रात भारी है,
इश्क है या कोई बिमारी है,

जान लेती रही हमेशा पर,
याद तेरी बहुत दुलारी है,

मौत से डर के लोग जीते हैं, 
जिंदगी ये ही सबसे प्यारी है,

हुस्न कातिल सही सुनो लेकिन,
सादगी फूल सी तुम्हारी है,

हाथ खाली ही लेके जायेगा,
जग से राजा भले भिखारी है....

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by अरुन 'अनन्त' on December 4, 2013 at 11:30am — 29 Comments

सारे शहर में उग गए मशरूम जमी पर

२२१२     १२१२    २२१    १२२ 

दम भूख से हैं तोड़ते मासूम जमीं पर 

पीकर शराब मस्ती में तू झूम जमी पर

 

बच्चे मनाते फुलझड़ी बिन रो के दिवाली 

पीकर तुझे लगे मची है धूम जमी पर 

अम्बार फरजी डिग्रियों के तूने लगाए 

लटका के अब गले में इन्हें घूम जमी पर 

दो बूँद अश्क जो गिरे आँखों से यूं तेरी 

सारे शहर में उग गए मशरूम जमी पर 

सड़कों पे गर पिया तो पोलिश का भी है पंगा 

बनवा ले झुरमुटों में ही कोई रूम जमी…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on December 4, 2013 at 11:06am — 24 Comments

कुंडलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

नीरसता में बदलता, नाशवान सुख-भाग,

सुख दुख में सम भाव रह,भौतिक सुख है रोग |

भौतिक सुख है रोग, अर्थ जीवन का जाने 
खुद का हो उद्देश्य, कृपा हम प्रभु की माने | 

कह लक्ष्मण कविराय, भरे मन में समरसता,
स्वच्छ करे मन भाव, तब न होगी नीरसता ||

(मौलिक व् अप्रकाशित)

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 4, 2013 at 9:30am — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सपना टूट गया (व्यंग्य)

एक बार हमें भी लगा कि हमें शायर बनना चाहिये हमने शुरुआत की, हमने शुअरा को पान खाते देखा तो हमें लगा यह भी शायर बनने के लिये ज़रूरी है सो हमने शुरुआत यहीं से की l

आनन फानन कुछ अशआर लिख मारे और छपवाने के लिये मशहूर अखबार के दफ़्तर गये जहाँ हमें हमारी शख़्सियत को देखते हुये संपादक से मिलने का सौभाग्य मिला l

संपादक महोदय ने ऊपर से नीचे तक हमें देखा और हमारे हाथ से लेकर हमारी रचनाये पढ़ने के बाद संपादक महोदय ने कुछ कहने की भी जहमत नही उठाई, वो अपने मनहूस लैपटॉप पर कोई फिल्म…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on December 4, 2013 at 9:00am — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
!!!! काले काले वर्षा वाले !!!! अतुकांत !!!!

सावन के बादल

काले काले ,

वर्षा वाले !

क्षुधित मानव की प्यास

बुझाने वाले…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on December 4, 2013 at 7:00am — 25 Comments

दीवाना होश खो देगा

कन्हैया यूँ न मुस्काओ दीवाना होश खो देगा ।

कि खुद डूबेगा मस्ती में वो तुमको भी डुबो देगा ।

दीवाने को नही मालुम तेरी मुस्कान का जादू ।

जो देखेगा छटा मुख की तो हो जाये न बेकाबू ।

फिर तो होके वो पागल तुम्हारे पीछे दौड़ेगा ।

कन्हैया यूँ न मुस्काओ दीवाना होश खो देगा ।

ये करुणा से भरी आँखें पिलाती प्रेम का प्याला ।

के उस पर माधुरी तेरी घोल दे कौन सी हाला ।

गिरेगा लड़खड़ाकर जब तुम्हें बदनाम कर देगा ।

कन्हैया यूँ…

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Added by Neeraj Nishchal on December 4, 2013 at 6:26am — 18 Comments

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