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सारे शहर में उग गए मशरूम जमी पर

२२१२     १२१२    २२१    १२२ 

दम भूख से हैं तोड़ते मासूम जमीं पर 

पीकर शराब मस्ती में तू झूम जमी पर

 

बच्चे मनाते फुलझड़ी बिन रो के दिवाली 

पीकर तुझे लगे मची है धूम जमी पर 

अम्बार फरजी डिग्रियों के तूने लगाए 

लटका के अब गले में इन्हें घूम जमी पर 

दो बूँद अश्क जो गिरे आँखों से यूं तेरी 

सारे शहर में उग गए मशरूम जमी पर 

सड़कों पे गर पिया तो पोलिश का भी है पंगा 

बनवा ले झुरमुटों में ही कोई रूम जमी पर 

दिन ढलते शाम होते ही  अद्धा तू  गटक ले 

जन्नत है कैसी हो तुझे मालूम जमी पर 

मासूम लाडले तेरे भटकेंगे गली में 

हो वक़्त से पहले ही न मरहूम  जमी पर 

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 10, 2013 at 7:41pm

अभ्यास के लिए अच्छा है.  संप्रेषनीयता पर भी ध्यान दें. वर्ना शेर के मिसरों में राबिता की कमी दिखेगी.

शुभेच्छाएँ


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 6, 2013 at 3:57pm

क्या मेरी टिप्प्णी दृष्टिगोचर नहीं हो रही ?


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 6, 2013 at 3:01pm

आदरणीय बागी जी के कमेन्ट को लगता है कोई पीने वाला ले उड़ा :):):):)


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 6, 2013 at 3:00pm

दम भूख से हैं तोड़ते मासूम जमीं पर 

पीकर शराब मस्ती में तू झूम जमी पर----पीने वालों पर अच्छा व्यंग किया है आशुतोष जी 

 

बच्चे मनाते फुलझड़ी बिन रो के दिवाली 

पीकर तुझे लगे मची है धूम जमी पर ----इस शेर को कई दफ़े पढ़ा पर समझ नहीं पाई 

अम्बार फरजी डिग्रियों के तूने लगाए 

लटका के अब गले में इन्हें घूम जमी पर -----काम नहीं बने तो गले में डाल कर ही घूमेगा 

दो बूँद अश्क जो गिरे आँखों से यूं तेरी 

सारे शहर में उग गए मशरूम जमी पर ----अश्कों से मशरूम उगे तो वाह वाह बीज की जरूरत ही नहीं :))))))

सड़कों पे गर पिया तो पोलिश का भी है पंगा 

बनवा ले झुरमुटों में ही कोई रूम जमी पर -----पोलिश ????झुरमुट तो जमीं पर हो होते हैं न ??

दिन ढलते शाम होते ही  अद्धा तू  गटक ले 

जन्नत है कैसी हो तुझे मालूम जमी पर ----जी सही कहा नालियों में जन्नत मिलती है फिर उन्हें 

मासूम लाडले तेरे भटकेंगे गली में 

हो वक़्त से पहले ही न मरहूम  जमी पर --भाव उन्नत है बह्र गड़बड़ा रही है 

बधाई ....इस ग़ज़ल को पढ़कर पीने वाले पीना भूल जायेंगे....:):):) 

Comment by ram shiromani pathak on December 6, 2013 at 1:16am

बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय डॉ. आशुतोष जी........बधाई आपको

दम भूख से हैं तोड़ते मासूम जमीं पर ............ प्रयोग समझ नहीं पाया मै आदरणीय ... सादर 

पीकर शराब मस्ती में तू झूम जमी पर////// सुझाव है क्या?

कृपा कर मार्गदर्शन करें। । सादर

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 5, 2013 at 4:29pm

आदरणीय आशुतोष सर बढ़िया ग़ज़ल कही है दाद कुबूल फरमाएं

Comment by Neeraj Nishchal on December 5, 2013 at 12:25pm

बहुत ही खूबसूरत और उम्दा ग़ज़ल
बहुत बहुत बधाई आदरणीय आशुतोष जी
।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 5, 2013 at 8:42am

आदरणीय राम शिरोमणि जी ..हौसला अफजाई के लिए हार्दिक धन्यवाद .सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 5, 2013 at 8:42am

आदरणीया कुंती जी ..आपका प्रोत्साहन मुझे नूतन लिखने की प्रेरणा देता है ,,सादर धन्यवाद के साथ 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 5, 2013 at 8:40am

आदरणीय गिरिराज भाईसाब ..प्रोत्साहन के लिए तहे दिल शुक्रिया ...सादर 

कृपया ध्यान दे...

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