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All Blog Posts (19,170)

जब रोज मरा करते थे ...

बातें खत्म हो गई जिसका 

जिक्र हम किया करते थे ...

वो गलियाँ कहीं 

खो गईं जिनपे हम 

चला करते थे ... 

न शाम रही न धुआँ 

किसी एक भी 

चराग में... 

वो चले गए जिन्हे

हम देखा करते थे... 

हमको क्या हक़ है

अब, किसी को कुछ कहने का ,,, 

रास्ता वो सब छूट गए 

जिनपे हम मिला करते थे ... 

अब हमको क्या मारेगी 

क्या, ये दुनियाँ की विरनिया 

वो अंदाज और था जीने का 

जब रोज मरा करते थे…

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Added by Amod Kumar Srivastava on December 8, 2013 at 10:55am — 6 Comments

लघुकथा : बल्ब और सीएफ़एल

सीएफ़एल बोली, "हे बल्ब महोदय! आप ऊर्जा बहुत ज्यादा खर्च करते हैं और रोशनी बहुत कम देते हैं। मैं आपकी तुलना में बहुत कम ऊर्जा खर्च करके आपसे कई गुना ज्यादा रोशनी दे सकती हूँ।"

 

बल्ब महोदय ने चुपचाप सीएफ़एल के लिए कुर्सी खाली कर दी। रोशनी फैलाने वालों के इतिहास में बल्ब महोदय का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा गया।

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 7, 2013 at 11:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल -सिर हमारे इल्ज़ाम क्यों

2 1 2 2          2 2 1 2

.

दफ़्तरों में आराम क्यों

फाइलों में है काम क्यों

 

सुरमयी सी इक शाम है

फिर उदासी के नाम क्यों

 

कर गया वो करतूत…

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Added by अमित वागर्थ on December 7, 2013 at 11:00pm — 11 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
त्रिभंगी छंद पर एक प्रयास........................डॉ० प्राची

छंद त्रिभंगी

विधान : चार पद, दो दो पदों में सम्तुकांतता,

            प्रति पद १०,८,८,६ पर यति,

            पदांत में गुरु अनिवार्य 

            प्रत्येक पद के प्रथम दो चरणों में तुक मिलान

            जगण निषिद्ध 

यह जीवन मृण्मय ,  बंधन तृणमय , भास हिरण्मय ,  भरमाए 

इन्द्रिय बहिगामी , कृत…

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Added by Dr.Prachi Singh on December 7, 2013 at 10:10pm — 12 Comments

ग़ज़ल- मौसम की आसमान में जाहिर हुई खुशी।

ग़ज़ल- 

.

मौसम की आसमान में जाहिर हुई खुशी।

खुश्बू है आम की, और कोयल है कूकती।।

बाहर निकल के घर से जरा खेत में चलें,

फ़सलों की खुश्बुओं से निखरती है जिन्दगी...

सूरज को प्रातः काल नमस्कार कीजिये,

अंधकार वो भगाये है, देता है रोशनी....

है आज मेरी और सितारों की ग़फतगू,

ऐ-चाँद पास आओ जरूरत है आपकी...

बरसों गुजर गये हैं मुलाक़ात भी हुये,

अब भी ख़याल आता है मुझको…

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Added by सूबे सिंह सुजान on December 7, 2013 at 10:00pm — 12 Comments

कुछ हाइकू

जीवन का क्या 

कब झड़े ज्यूँ सूखे

पेड़ के पत्ते

माँ का दुलार

कितना भी हो, लगे

ओस की बूँद

मन बावरा

कभी जो मान जाता

मन की बात

नदी डालती

भले ही मीठा जल

सागर खारा

.

(मौलिक-अप्रकाशित)

Added by Neelam Upadhyaya on December 7, 2013 at 6:00pm — 6 Comments

तुम्हारे बाहुपाश के लिए …

तुम्हारे बाहुपाश के लिए …….



कितने

वज्र हृदय हो तुम

इक बार भी तुमने

मुड़कर नहीं देखा

तुम्हारी एक कंकरी ने

शांत झील में

वेदना की

कितनी लहरें बना दी

और तुम इसे एक खेल समझ

होठों पर

हल्की सी मुस्कान के साथ

मेरे हाथों को

अपने हाथों से

थपथपाते हुए

फिर आने का आश्वासन देकर

मुझे

किसी गहरी खाई सा

तनहा छोड़कर

कोहरे में

स्वप्न से खो गए

और मैं

तुम्हें जाते हुए

यूँ निहारती रही…

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Added by Sushil Sarna on December 7, 2013 at 5:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122 2121

ख़म नहीं ज़ुल्फ़ों के ये जिनको कि सुलझायेंगे आप 

उलझने हैं इश्क़ की फिर से उलझ जायेंगे आप

कौन कहता है मुहब्बत अक्स है तन्हाइयों का

हम न होंगे साथ जब साये से घबराएंगे आप

दे तो दोगे इस ज़माने के सवालो का जवाब

दिल नहीं सुनता किसी की कैसे समझायेंगे आप

जा रहे हो बे-रुखी से जान लो इतना ज़रूर

क़द्र जब होगी मुहब्बत कि…

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Added by Ayub Khan "BismiL" on December 7, 2013 at 2:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल- सारथी || तुम हो कली कश्मीर की ||

तुम हो कली कश्मीर की , कोई फ़ना हो जाएगा 

रब देख ले तुझको अगर , वो भी फ़िदा हो जाएगा /१

कोरा दुपट्टा बांध लो, पतली कमर के खूंट से 

सरकी अगर ये नाज़ से , मौसम खफ़ा हो जाएगा/२

साहिब बहाने से गया, मैं बारहा उसकी गली 

दिख जाये गर शोला बदन , कुछ तो नफा हो जाएगा /३ 

शीशे से नाजुक हुस्न पर, जालिम बड़ी मगरूर है 

दो पल की है ये नाजुकी, फिर सब हवा हो जाएगा /४ 

मुझको सज़ा-ए-मौत दो , शामिल रहा हूँ क़त्ल में 

उनको सुकूँ मिल जाएगी, हक़ भी…

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Added by Saarthi Baidyanath on December 7, 2013 at 12:30pm — 12 Comments

अतुकांत कविता .... लड़ूँगी प्रभु से

सोच रही हूँ
लड़ूँगी प्रभु से
जब मिलूँगी पर वह भी
डर से
छुपा बैठा है , आता ही नहीं
बुलाने पर हमारे हमारी जिन्दगी को
तबाह किये बैठा है , जिस दिन भी
मिलेगा सुनाउँगी
उसे बहुत जानता हैं
वह भी शायद
इसी लिए मेरी जिन्दगी
की डोर को
ढील दिए
बैठा है ....
.
सविता मिश्रा
"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by savitamishra on December 7, 2013 at 12:00pm — 22 Comments

भोर का तारा छिपा जाने किधर है //गज़ल //कल्पना रामानी

212221222122

आज खबरों में जहाँ जाती नज़र है।

रक्त में डूबी हुई, होती खबर है।

 

फिर रहा है दिन उजाले को छिपाकर,

रात पूनम पर अमावस की मुहर है।

 

ढूँढते हैं दीप लेकर लोग उसको,

भोर का तारा छिपा जाने किधर है।  

 

डर रहे हैं रास्ते मंज़िल दिखाते,

मंज़िलों पर खौफ का दिखता कहर है।

 

खो चुके हैं नद-नदी रफ्तार अपनी,

साहिलों की ओट छिपती हर लहर है।

 

हसरतों के फूल चुनता मन का…

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Added by कल्पना रामानी on December 7, 2013 at 10:56am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक (ग़ज़ल "राज")

२१२२   २१२२  २१२२  २



जब तलक पँहुचे लहर अपने मुहाने तक

साथ क्या दोगे मेरा तुम उस ठिकाने तक



हीर राँझे की कहानी हो  बसी जिसमे

ले चलोगे क्या मुझे तुम उस जमाने तक



प्यार का सैलाब जाने कब बहा लाया

हम सदा डरते रहे आँसू बहाने तक



थी बहुत मासूम अपने प्यार की मिटटी

दर्द ही बोते रहे अपने बेगाने तक



क्यों करें परवाह हम अब इस ज़माने की

हर कदम पे जो मिला बस दिल दुखाने तक  



छोड़ दी किश्ती भँवर में देख साथी रे

जिंदगी गुजरे फ़कत अब…

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Added by rajesh kumari on December 7, 2013 at 10:00am — 29 Comments

बापू

सन अड़तालीस की तीस जनवरी के दिन

नहीं मरे थे तुम

बापू



तुम एक गोली से

मर भी नहीं सकते थे

तुम्हारे जर्जर हो चुके शरीर को

सिर्फ भेद पाई थी

वह गोली

चंद सूखी लकड़ियों से भी

नहीं जल सकते थे तुम

बापू

 

तुम्हारी चिता जला पाई थी

सिर्फ तुम्हारे अचेत शरीर को

 तुम्हे कंधा देने

उमड़ पड़ा था पूरा देश

आज भी बदस्तूर जारी है

तुम्हें कंधा देना

बापू

 

आज भी हर घर…

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Added by hemant sharma on December 7, 2013 at 12:00am — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
प्रेमधारा मेरी बाधित है अभी ( ग़ज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122      2122      2122      212

.

आपकी पिछली कही मन में प्रवाहित है अभी

इसलिये तो प्रेमधारा मेरी बाधित है अभी

 .

अब सदा बहती ही रहती है उपेक्षा आँखों से

मै कहाँ हूँ आपके मन में ये साबित है अभी

 .…

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Added by गिरिराज भंडारी on December 6, 2013 at 2:30pm — 29 Comments

सबने तो वाह वाह की

कैसे सुनाएँ दास्ताँ तरसी निगाह की ।

दौरे ग़मों में किस तरह हमने पनाह की ।

 

दर्दे सितम प्यार में मिलते रहे हमे ,

चुपचाप सह गए कभी हमने न आह की ।

 

बीती फकत जो ज़िन्दगी हमने किया नही ,

हमें सजा भी मिल गयी ऐसे गुनाह की ।

 

एक एक करके हसरतें दम तोड़ती गयीं ,

हमको मिला वही कभी जिसकी न चाह की ।

 

तूफाँ कभी न आया शायद मेरी डगर ,

उसकी डगर में ज़िन्दगी हमने तबाह की ।

 

हाले बयान  ये जो महफ़िल में कर…

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Added by Neeraj Nishchal on December 6, 2013 at 2:30pm — 17 Comments

पहले थे हम इक हकीकत अब कहानी हो गए/ ग़ज़ल

पहले थे हम इक हकीकत अब कहानी हो गए

जब से अपने ख्वाब यारो आसमानी हो गए

 

पांच सालों में महल सा अपने घर को कर लिया

चोर डाकू करके मेहनत खानदानी हो गए

 

तुम जियो खुश जिन्दगी भर ऐसा उसने जब कहा

एक सिक्का था उछाला हम भी दानी हो गए

 

यूँ हमारी हर ग़ज़ल खुशबू हुई औ सर चढ़ी 

देखते देखते हम जाफरानी हो गए

 

“दीप” गम के पर्वतों को तुमने क्या पिघला दिया  

गर्दिशों की कौम के सब पानी पानी हो गए

 

संदीप…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 6, 2013 at 2:00pm — 21 Comments

श्याम जैसी वो साँवरी होगी : अरुन शर्मा 'अनन्त'

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून

2122  1212  22



खूबसूरत हँसी परी होगी,
सोचता हूँ जो जिंदगी होगी,



सादगी कूटकर भरी होगी,

श्याम जैसी वो साँवरी होगी,

 

ख्वाहिशें क्यूँ भला अधूरी हैं,
मांगने में कहीं कमी होगी,



ख़त्म कर लें विवाद आपस का,
मैं गलत हूँ कि तू सही होगी,

 

मौत ने खा लिया बता देना,

जिस्म में जान जब नही होगी,



शांत चुपचाप दोस्त रहने दो,

सत्य बोलूँगा खलबली…

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Added by अरुन 'अनन्त' on December 6, 2013 at 1:00pm — 26 Comments

नव शोणित

ये कैसा नव शोणित है , जिसमे जीवन रस घोल नहीं |

जीवन बगिया में महके ऐसा , योवन सौरभ का शोर नहीं ||

सरबस लूटे कोई फिर भी , जिस रक्त में कोई उबाल न हो |

वह खून नहीं जल धारा है , जिसमें कोई मलाल न हो |

जो देश धर्म के लिए जिए ,वह जीवन है वह जीवन है |

जो मानवता के लिए मरे , वह मानव है वह मानव है ||

मानवता को मानव से यों , हमने ही तो दूर किया |

दानवता को लाकर के यहाँ , हमने ही मसहूर किया ||

देवत्व इसी से लुप्त हुआ , और दिल भी दया से रिक्त हुआ |…

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Added by chouthmal jain on December 6, 2013 at 12:00am — 5 Comments

ग़ज़ल : सच है यही कि स्वर्ग न जाती हैं सीढ़ियाँ

बह्र : २२१२ १२११ २२१२ १२

-------- 

सच है यही कि स्वर्ग न जाती हैं सीढ़ियाँ

मैं उम्र भर चढ़ा हूँ पर बाकी हैं सीढ़ियाँ

 

तन के चढ़ो तो पल में गिराती हैं सीढ़ियाँ

झुक लो जरा तो सर पे बिठाती हैं सीढ़ियाँ

 

चढ़ते समय जो सिर्फ़ गगन देखता रहे

जल्दी उसे जमीन पे लाती हैं सीढ़ियाँ

 

मत भूलिये इन्हें भले आदत हो लिफ़्ट की

लगने पे आग जान बचाती हैं सीढ़ियाँ

 

रहना अगर है होश में चढ़ना सँभाल के

हर पग पे एक पैग…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on December 5, 2013 at 11:09pm — 24 Comments

प्यार में होता सदा ही दर्द क्यों है ?

2 1 2 2   2 1 2 2   2 1 2 2



प्यार में होता सदा ही दर्द क्यों है ?

प्यार में अब चल रही यूँ कर्द क्यों है ?



यार को जो हैं समझते इक खिलौना

प्यार जाने हो गया अब नर्द क्यों है ?



है बिना दस्तक चला आता सदा जो

वो बना यूँ आज फिर हमदर्द क्यों है ?



छू रही है रूह मेरी आते जाते

यह तुम्हारी साँस इतनी सर्द क्यों है ?



अपनी यादों को समेटे जब गए हो

आज यादों की उठी फिर गर्द क्यों है ?



प्यार पर है जुल्म…

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Added by Sarita Bhatia on December 5, 2013 at 6:00pm — 22 Comments

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