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ग़ज़ल -निलेश 'नूर' -लोग फिर

ग़ज़ल 

लोग फिर बातें बनाने आ गए,

यार मेरे, दिल दुखाने आ गए. 

...

जिंदगी का ज़िक्र उनसे क्या करूँ,

मौत को जो घर दिखाने आ गए.

...

रूठनें का लुत्फ़ आया ही नहीं,

आप पहले ही मनाने आ गए. 

...

दो घडी बैठो, ज़रा बातें करो,

ये भी क्या बस मुँह दिखाने आ गए.

...

जेब अपनी जब कभी भारी हुई,      

लोग भी रिश्ते निभाने आ गए.

...

राह से गुज़रा पुरानी जब कभी,

याद कुछ चेहरे पुराने आ गये. …

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Added by Nilesh Shevgaonkar on December 2, 2013 at 8:00am — 19 Comments

भोले मन की भोली पतियाँ

भोले मन की भोली  पतियाँ

लिख लिख बीतीं हाये रतियाँ

अनदेखे उस प्रेम पृष्ठ को

लगता है तुम नहीं पढ़ोगे

सच लगता है!

बिन सोयीं हैं जितनीं रातें

बिन बोलीं उतनी ही बातें

अगर सुनाऊँ तो लगता है

तुम मेरा परिहास करोगे

सच लगता है!

रहा विरह का समय सुलगता

पात हिया का रहा झुलसता

तन के तुम अति कोमल हो प्रिय

नहीं वेदना सह पाओगे

सच लगता है!…

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Added by वेदिका on December 2, 2013 at 5:00am — 54 Comments

एक किसान

मौसम के

सहारे वह

अरमान सजाता

जीवन का

दिन रात ना समझे वह तो

एहसास,ना वर्षा,ना ठंड का

कमर तोड़ मेहनत पर भी

ना मिलता उसे निवाला था।

खाद बीज महँगा अब तो

पानी भी ना देता संग था।

कर्ज में डूब कर भी वह

करता पूरे कर्म था।

तब जीवनदायक

अनाज का दाना

आता उसके घर था।

बड़े अरमान इसी दाने पर

हाथ पीले बेटी के 

बदले मेहर की वह

तन दिखाती साड़ी को

जीवन की है और जरूरत

महीनो तक मुँह का निवाला

कर्ज निवारण इसी दाने…

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Added by Akhand Gahmari on December 2, 2013 at 12:13am — 8 Comments

इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम / ग़ज़ल "संदीप पटेल "दीप"

रस्म वाले देश की औलाद हैं हम
आज के बच्चे कहें सैयाद हैं हम

उनकी बीबी मायके जब से गयी है  
कहते फिरते आजकल आज़ाद हैं हम

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम

छोड़ के वो हाथ मेरा जो चले थे
गमजदा हैं देख ये आबाद हैं हम

"दीप" हरदम की मदद है दूसरों की
इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 10:00pm — 12 Comments

अन्धकार

मौन हवाएं

सर्द गर्म और सीली सीली

आते जाते

आम जनों की

तबियत ढीली  

सन्नाटों की चीख

अनवरत अनुशासित है

लेन देन की बात करे हैं

सारे उल्लू

चन्दा का उजियारा

ढूँढे

जल भर चुल्लू

भूतों और पिशाचों से

बस ये शासित है

दहशत वहशत

खुली सड़क पर

खुल के झूमें

डाकू और लुटेरे

क्षण क्षण

दामन चूमें

शबनम का कतरा

त्रण त्रण में आभासित…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 8:00pm — 13 Comments

***बुजुर्ग को सुनाते हैं …..***

बुजुर्ग को सुनाते हैं …..



हाँ

मानता हूँ

मेरा जिस्म धीरे धीरे

अस्त होते सूरज की तरह

अपना अस्तित्व खोने लगा है

मेरी आँखों की रोशनी भी

धीरे धीरे कम हो रही है

अब कंपकपाते हाथों में

चाय का कप भी थरथराता है

जिनको मैं अपने कंधों पर

उठा कर सबसे मिलवाने में

फक्र महसूस करता था

वही अब मुझे किसी से मिलवाने में

परहेज़ करते हैं

शायद मैं बुजुर्ग

नहीं नहीं बूढा बुजुर्ग हो गया हूँ

मैं अब वक्त बेवक्त की चीज़ हो गया हूँ…

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Added by Sushil Sarna on December 1, 2013 at 6:12pm — 20 Comments

मेरा मन झूम राधा हो : अरुन शर्मा 'अनन्त'

भलाई का इरादा हो,
परस्पर प्रेम आधा हो,

मुरारी की सुनूँ मुरली,
मेरा मन झूम राधा हो,

लबालब प्रेम से हो जग,
गली घरद्वार वृंदा हो,

यही मैं चाहता हूँ रब,
मेरी चाहत चुनिन्दा हो,

ह्रदय में प्रेम उपजे औ,
मधुर सम्बन्ध जिन्दा हो,

खुले आकाश के नीचे,
सदा निर्भय परिन्दा हो,

बसे इंसानियत दिल में,
मरा भीतर दरिन्दा हो....

मौलिक व अप्रकाशित ..

Added by अरुन 'अनन्त' on December 1, 2013 at 3:30pm — 28 Comments

माँ की बेटी को सलाह [ दोहावली ]

लक्ष्मी है तू गेह की, तू मेरा सम्मान
सबको देना मान तू ,भाई पिता समान /


बेटी है तो क्या हुआ तू है घर की लाज
हमारा तू गुरूर है, मेरी तू आवाज /


बनना मत तू दामिनी,सहकर अत्याचार
लेना दुर्गा रूप तू ,करना तू संहार /

मत घबराना तू कभी, जो हो जग बेदर्द
तू है दुर्गा कालिका ,मत सहना तू दर्द /


जिसका तुझसे हो भला,उसके आना काम
अबला नारी जो दिखे ,उसको लेना थाम /

..............मौलिक व अप्रकाशित .......

Added by Sarita Bhatia on December 1, 2013 at 11:30am — 14 Comments

ग़ज़ल - मेरे सम्मान की धज्जी उड़ाता है

1 2 2 2      1 2 2 2       1 2 2 2

मेरे किरदार पे वो शक जताता है

बिना ही बात वो तेवर दिखाता है…

Continue

Added by sanju shabdita on November 30, 2013 at 8:00pm — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गर्म हवा है खूब यहाँ की ( गज़ल ) गिरिराज भंडारी

गर्म हवा है खूब यहाँ की

************************

2 2  2 2  2 2   2 2

.

जो भी मुझसे सम्बंधित है

सुख पाने से वो वंचित है

 

मौन यहाँ है सबसे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on November 30, 2013 at 5:00pm — 22 Comments

भरोसा

ऑंखो  में था जो

सपना गुम हुआ,

वफा की राह

टूटा वह 

मैं बिखर गया

है भरोसा प्‍यार पर

तेरे हमें इस कदर

वेवफा नहीं कहूँगा

कभी मेरे जानेजिगर

मेरी ही चाहत

में रही शायद

कमी होगी

नहीं याद करती

दूर हो  चली,

चली थी बनने

जो कभी मेरा हमसफर।

जब रोया मैं याद कर

उसके तराने को

अश्‍क सुखाये मेरे

दिल की जलन ने

पी गये बंद ओठ 

यादों के अश्‍क को।

खुले ओंठ तो…

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Added by Akhand Gahmari on November 30, 2013 at 4:30pm — 8 Comments

तरही ग़ज़ल

किसी सोच में कभी डूब के जो लिखा न हो औ कहा न हो

वो ग़ज़ल है क्या और वो गीत क्या किसी दिल को जिसने छुआ न हो

 

मेरी शाईरी में है जो निहाँ मेरे हर्फ़ में वो रवाँ रवाँ

मेरी है दुआ उसी रब से के कहूँ जब मैं कोई खफा न हो

 

ज़रा पूछिए किसी आदमी से छुआ है कैसे ये आसमाँ

क्या सफ़र में फर्श से अर्श के कोई है वो जो कि गिरा न हो

 

कहे माँ कहीं मिलें गर्दिशें तो खुदा दिखाता है रास्ता

इसी मोड़ पर मेरे वास्ते वो चराग ले के खडा न…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on November 30, 2013 at 4:00pm — 20 Comments

***पेशानी पे मुहब्बत की यारो ……….***

पेशानी पे मुहब्बत की यारो ……….

लगता है शायद 

उसके घर की कोई खिड़की 

खुली रह गयी 

आज बादे सबा 

अपने साथ 

एक नमी का 

अहसास लेकर आयी है 

इसमें शब् का मिलन और 

सहर की जुदाई है 

इक तड़प है 

इक तन्हाई है 

ऐ खुदा 

तूने मुहब्बत भी 

क्या शै बनाई है 

मिलते हैं तो 

जहां की खबर नहीं रहती 

और होते हैं ज़ुदा 

तो खुद की खबर नहीं रहती 

छुपाते…

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Added by Sushil Sarna on November 30, 2013 at 2:00pm — 20 Comments

वृद्धाश्रम

भाव की हर बांसुरी में

भर गया है कौन पारा ?

देखता हूं

दर-बदर जब

सांझ की

उस धूप को

कुछ मचलती

कामना हित

हेय घोषित

रूप को

सोचता हूं क्‍या नहीं था

वह इन्‍हीं का चांद-तारा ?

बौखती इन

पीढि़यों के

इस घुटे

संसार पर

मोद करता

नामवर वह

कौन अपनी

हार पर

शील शारद के अरों को

ऐंठती यह कौन धारा ?

इक जरा सी

आह…

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Added by राजेश 'मृदु' on November 30, 2013 at 1:30pm — 34 Comments

मौसम-ए-इश्क दबे पाँब चला जाता है

2122     /1122    /1122        /22

मौसम-ए-इश्क हसीं प्यास जगा जाता है

प्रेमी जोड़ों का सुकूँ चैन चुरा जाता है 

दिल की धड़कन को बढ़ा सीने में तूफ़ान छुपा

मौसम-ए-इश्क दबे पाँब चला जाता  है 

सर्द हो  रात  हो बरसात का मादक मंजर

मौसम-ए-इश्क  सदा सब को जला जाता है  

 

दर्द  ऐसा  भी है, अहसास सुखद है जिसका 

मौसम-ए-इश्क वो अहसास करा जाता  है



देख आँखों मे चमक गुल की यूँ  हैराँ मत हो

मौसम-ए-इश्क हसी नूर…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on November 30, 2013 at 1:30pm — 19 Comments

माँ सरस्वती का स्मरण

छंद  - दोहा

 

काव्य रसिक समवेत है ,अद्भुत दिव्य समाज I

माते !  अपनी  कच्छपी , ले कर  आओ  आज II  

 

वीणा  के  कुछ   छेड़  दो , ऐसे   मधुमय   तार I

सारी   पीडाये    भुला ,  स्वप्निल   हो   संसार II

 

सपनो  में  ही  प्राप्त है ,  जग को  अब  आनंद I

अतः मदिर माते  i करो , हम  कवियों  के  छंद II

 

यदि भावों  से  गीत  से, जग  को मिलता  त्राण I

रस  से  सीचेंगे   सदा ,  उनके   आकुल   प्राण …

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 30, 2013 at 12:00pm — 22 Comments

हाकिम निवाले देंगे

गाँव-नगर में हुई मुनादी

हाकिम आज निवाले देंगे

 

सूख गयी आशा की खेती

घर-आँगन अँधियारा बोती

छप्पर से भी फूस झर रहा

द्वार खड़ी कुतिया है रोती

 

जिन आँखों…

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Added by बृजेश नीरज on November 30, 2013 at 8:40am — 43 Comments

अमर पुष्प

अमर पुष्प

कुछ बातें ऐसी थीं

कुछ ठहरी हुई कुछ चंचल

कुछ कही हुई

कुछ अनकही.

कुछ सपने

पलकों में थे बिखरे

ख्यालों की लम्बी दरिया में

कुछ बातें थी उपली.

मैं तुम्हें देखती थी

मुस्काते नयनों से

तुम भी देखते थे

पर रहते थे मौन.

तुम्हारे आस-पास

बन तितली उड़ती रहती

तुम्हारे हृदय का पट न खुला

मैं पहेली बूझ न सकी.

तुम्हारी चुप्पी ने

मेरे कितने सवालों को…

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Added by coontee mukerji on November 30, 2013 at 2:39am — 20 Comments

***ऐ सांझ ,तू क्यूँ सिसकती है .......***

ऐ सांझ ,तू क्यूँ सिसकती है .......

ऐ सांझ ..

तू क्यूँ सिसकती है //

अभी कुछ देर में ..

तिमिर घिर जाएगा …

तिमिर की चादर में …

हर रुदन छुप जाएगा //

रुदन …

उस क्षण का …

जब एक ….

किलकारी ने ….

अपनी चीख से ब्रह्मांड में ….

सन्नाटा कर दिया //

रुदन उस क्षण का ….

जब एक कोपल …

एक वहशी की वासना का ….

शिकार हो गयी //

रुदन उस क्षण का …..

जब दानव बना मानव ……

दरिंदगी की सारी हदें …..

पार कर गया //

रुदन उस…

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Added by Sushil Sarna on November 29, 2013 at 3:12pm — 18 Comments

जरूरत ................ लघु कथा ( अन्नपूर्णा बाजपेई )

जरूरत

 

पूनम कानों मे ईयर फोन लगाये रेलिग के सहारे खड़ी किसी से बाते कर रही थी , पास ही चारपाई पर लेटा उसका दो माह का दूधमुहा शिशु बराबर बिलख रहा था । इतनी देर मे तो पड़ोस की छतों से लोग भी झांक कर देखने लगे थे कि क्या कोई है नहीं बच्चा इतना क्यों रो रहा है ?

देखा तो पूनम पास ही खड़ी थी लेकिन उसका मुंह दूसरी ओर था । लोगों ने आवाज भी लगाई पर उसने सुना नहीं । अब तक नीचे से बूढ़ी सास भी  हाँफती हुई आ गई थी और बड़बड़ाते हुए उन्होने बच्चे को गोद मे उठा लिया । परन्तु पूनम कि बातें…

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Added by annapurna bajpai on November 29, 2013 at 1:30pm — 29 Comments

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