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आइना ये पत्थरों की मार कैसे सह गया (ग़ज़ल 'राज ')

2122  2122  2122  212

इक मुहब्बत का महल कब चुपके चुपके ढह गया

बिन किये आवाज सब आँखों का काजल कह गया

 

अनमनी सी वो अकेली रह गई किश्ती खड़ी

पाँव के नीचे से ही सारा समन्दर बह  गया

 

वो खुदा भी उस फ़लक से देख कर हैरान है

आइना ये पत्थरों की मार कैसे सह  गया

 

ठोकरों ने ही तराशे वो पशेमाँ पंख फिर

ताकते परवाज़ से पीछे गुज़शता रह गया

 

फूल से भी जो हथेली सुर्ख  होती थीं  कभी

उस हथेली में पिघल कर आज सूरज बह गया

--------------मौलिक एवं अप्रकाशित  

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Comment by rajesh kumari on October 9, 2016 at 7:51pm

आद० महेंद्र कुमार जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हो गया दिल से आभारी हूँ |

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 9, 2016 at 6:25pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीया, दाद कुबूल कीजिए

Comment by नाथ सोनांचली on October 8, 2016 at 6:23pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी बेहतरीन गजल के लिए दिली मुबारकबाद कबूल फरमाये
Comment by Shyam Narain Verma on October 8, 2016 at 5:27pm
बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल ....हार्दिक बधाई ! 
Comment by Samar kabeer on October 8, 2016 at 5:26pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,बढ़िया ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
तीसरे शैर में :उस फ़लक'की जगह "अब फ़लक"होना चाहिये, आपका क्या खयाल है ?
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 8, 2016 at 3:28pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी बहुत ही खूबसूरत और दिलकश गजल हुई है । सस्नेह बधाई स्वीकार करें । सादर ।
Comment by Sushil Sarna on October 8, 2016 at 12:39pm

फूल से भी जो हथेली सुर्ख होती थीं कभी
उस हथेली में पिघल कर आज सूरज बह गया

आदरणीया राजेश कुमारी जी क्या कहूँ आपने अपनी ग़ज़ल में खूबसूरत अहसासों का वो समां बाँधा है कि दिल बाग़ बाग़ हो गया ... इस दिलकश ग़ज़ल के लिए दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं।

Comment by Mahendra Kumar on October 8, 2016 at 9:55am

आदरणीय राजेश मैम, सभी शेर लाजवाब हैं। शेर दर शेर दाद कुबूल कीजिए। मतले और तीसरे शेर के लिए आपको मेरी तरफ से विशेष बधाई।

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