*दोहा*
बरखा के बढ़ते क़दम, आये हैं अब पास।
दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।
*चौपाई*
वह फुहार वह साथ तुम्हारा। हरपल था सुरभित अति प्यारा।।
मन साजन यह कैसे भूले। साथ-साथ तुम हम थे झूले।।
*
तुम थे झूले थाम कलाई। मैं साजन कितनी शरमाई।।
तुम जब-जब थे पींग बढ़ाते। हम इक दूजे में खो जाते।।
*
झुकीं-झुकीं मेरी ये अँखियाँ। देख रहीं थीं हँस-हँस सखियाँ।।
पर साजन तुम रुके न माने। मिले मुझे सखियों से ताने।।
*
भूल न पाई वह पल प्यारे। स्वप्न सरीखे हैं वह सारे।।
आने को है फिर अब सावन। लेकिन पास नहीं तुम साजन।।
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~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’, उज्जैन.
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