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Mahendra Kumar
  • Male
  • India
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दिगंबर नासवा commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ
"उम्दा ग़ज़ल और लाजवाब शेर ... बहुत बधाई "
Wednesday
Balram Dhakar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ
"आदरणीय महेंद्र जी, ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है। बहुत बहुत बधाई, इस शानदार ग़ज़ल के लिए। सादर।"
Feb 11
Mahendra Kumar's blog post was featured

ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ

बह्र : 1222 1222 122तुम्हारे शहर से मैं जा रहा हूँबिछड़ने से बहुत घबरा रहा हूँ वहाँ दुनिया को तू अपना रही हैयहाँ दुनिया को मैं ठुकरा रहा हूँ उठा कर हाथ से ये लाश अपनीमैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ तुम्हारे इश्क़ में बन कर मैं काँटासभी की आँख में चुभता रहा हूँ नहीं मालूम जाना है कहाँ परन जाने मैं कहाँ से आ रहा हूँ मुहब्बत रात दिन करनी थी तुमसेतुम्हीं से रात दिन लड़ता रहा हूँ पढ़ा इक लफ़्ज़ भी उसने ने मेराग़ज़ल जिसके लिए लिखता रहा हूँ मुहब्बत करने वाले मर गए हैंमैं दिल को कब से ये समझा रहा हूँ नहीं आया मुझे…See More
Feb 6
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ
"आद0 महेंद्र जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने। आद0 समर कबीर साहब की इस्लाह भी उत्तम। बहुत बहुत बधाई आपको इस सृजन पर"
Feb 2
Samar kabeer commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ
"जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'वहाँ दुनिया को तू अपना रही है' इस मिसरे को यूँ करना उचित होगा:- 'वहाँ दुनिया को तुम अपना रहे हो' कारण ये कि उर्दू शाइरी में महबूब को स्त्रीलिंग नहीं…"
Feb 1
Samar kabeer commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
"'मैंने देखा है कि इस दुनिया में क्या होता है' ये मिसरा ठीक है । 'जो गलत करते हैं, वो लोग सही होते हैं' इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:- 'जो ग़लत करते हैं,वो लोग भले होते हैं' आख़री शैर हटाना उचित होगा ।"
Feb 1
Surkhab Bashar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ
"जनाब महेंद्र कुमार जी, आदाब उम्दा ग़ज़ल के लिये मुबारक बाद कुबूल करें"
Feb 1
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ
"आ. भाई महेंद्र जी, अच्छी गजल हुयी है हार्दिक बधाई ।"
Feb 1
Mahendra Kumar posted a blog post

ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ

बह्र : 1222 1222 122तुम्हारे शहर से मैं जा रहा हूँबिछड़ने से बहुत घबरा रहा हूँ वहाँ दुनिया को तू अपना रही हैयहाँ दुनिया को मैं ठुकरा रहा हूँ उठा कर हाथ से ये लाश अपनीमैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ तुम्हारे इश्क़ में बन कर मैं काँटासभी की आँख में चुभता रहा हूँ नहीं मालूम जाना है कहाँ परन जाने मैं कहाँ से आ रहा हूँ मुहब्बत रात दिन करनी थी तुमसेतुम्हीं से रात दिन लड़ता रहा हूँ पढ़ा इक लफ़्ज़ भी उसने ने मेराग़ज़ल जिसके लिए लिखता रहा हूँ मुहब्बत करने वाले मर गए हैंमैं दिल को कब से ये समझा रहा हूँ नहीं आया मुझे…See More
Jan 31
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
"आदरणीय Mahendra Kumar जी ,मैं इस्लाह के लायक तो अपने आप को नहीं समझता हूँ क्योंकि इतनी मुझे भी जानकारी नहीं है | मुझे जैसा किसी ने बताया मैंने वैसा ही आपको बता दिया | हालाँकि आप अगर ज्यों को २ मात्रा मानते हैं तो क्यों भी उसके बराबर है फिर एक मात्रा…"
Jan 31
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
"बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय सुरेन्द्र जी. हृदय से आभारी हूँ. सादर."
Jan 31
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
"सादर आदाब आदरणीय समर कबीर सर. ग़ज़ल में आपकी शिरकत और बेशकीमती इस्लाह का हमेशा की तरह शुक्रगुजार हूँ. दो बिन्दुओं पर आपकी राय जानना चाहूँगा : 1. "मैंने देखा है कि इस दुनिया में क्या होता है" क्या मतले का यह ऊला सही रहेगा? 2. क्या…"
Jan 31
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
"बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय दिगंबर नासवा जी. //कुछ शेर दुबारा गौर करना मांगते हैं// यदि आप खुल कर बताते कि किन अशआर पर गौर करना है तो आपका बेहद शुक्रगुजार रहता. सादर."
Jan 31
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
"बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत जी.  1. जहाँ तक मुझे पता है "या" और "क्यों" की मात्रा 1 ले सकते हैं "ज्यों" की नहीं. "क्या" के विषय में मुझे संशय है पर आदरणीय समर कबीर सर के जवाब से लगता है…"
Jan 31
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
"आद0 महेंद्र जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने। शेष तुरन्त जी और आद0 समर साहब ने बता दी हैं। बधाई स्वीकार कीजिये"
Jan 30
Mahendra Kumar replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-46 (विषय:मोह)
"रचना पर आपकी पुनः उपस्थिति और उत्साहवर्धक टिप्पणी हेतु हृदय से आभारी हूँ आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी. बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर."
Jan 30

Profile Information

Gender
Male
City State
Allahabad
Native Place
Fatehpur

Mahendra Kumar's Blog

ग़ज़ल : मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ

बह्र : 1222 1222 122

तुम्हारे शहर से मैं जा रहा हूँ

बिछड़ने से बहुत घबरा रहा हूँ

 

वहाँ दुनिया को तू अपना रही है

यहाँ दुनिया को मैं ठुकरा रहा हूँ

 

उठा कर हाथ से ये लाश अपनी

मैं अपने आप को दफ़ना रहा हूँ

 

तुम्हारे इश्क़ में बन कर मैं काँटा

सभी की आँख में चुभता रहा हूँ

 

नहीं मालूम जाना है कहाँ पर

न जाने मैं कहाँ से आ रहा हूँ

 

मुहब्बत रात दिन करनी थी तुमसे

तुम्हीं से…

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Posted on January 31, 2019 at 7:51pm — 6 Comments

ग़ज़ल : मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है

बह्र : 2122 1122 1122 22/112

मैंने देखा है कि दुनिया में क्या क्या होता है

मुझसे मत बोलिए मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है

 

इश्क़ ही सबसे बड़ा ज़ुर्म है इस दुनिया में

ये ख़ता कर लो तो हर शख़्स ख़फ़ा होता है

 

जो गलत करते हैं, वो लोग सही होते हैं

और जो अच्छा करे तो वो बुरा होता है

 

मैं भी इस ज़ख़्म को नासूर बना डालूँगा

दर्द बतलाओ मुझे कैसे दवा होता है

 

कभी दिखता था ख़ुदा मुझको भी मेरे अन्दर

और अब इस पे भी…

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Posted on January 27, 2019 at 11:30am — 10 Comments

ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं

बह्र : 221 1221 1221 122

अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं

वो लोग किसी और ज़माने के लिए हैं

कुछ लोग हैं जो आग बुझाते हैं अभी तक

बाकी तो यहाँ आग लगाने के लिए हैं

यूँ आस भरी नज़रों से देखो न हमें तुम

हम लोग फ़क़त शोर मचाने के लिए हैं

हर शख़्स यहाँ रखता है अपनों से ही मतलब

जो ग़ैर हैं वो रस्म निभाने के लिए हैं

अब क्या किसी से दिल को लगाएँगे भला हम

जब आप मेरे दिल को दुखाने के लिए…

Continue

Posted on January 16, 2019 at 4:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल : कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो

बह्र : 2122 1122 1122 22

कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो

आओ बैठो यहाँ पे हश्र हमारा देखो

कैसे हिन्दू को किया दफ़्न वहाँ लोगों ने

एक मुस्लिम को यहाँ कैसे जलाया देखो

जिस तरह लूटा था दिल्ली को कभी नादिर ने

उसने लूटा है मेरे दिल का ख़ज़ाना देखो

आदमी वो नहीं होता जो दिखा करता है

जो नहीं दिखता हो जैसा उसे वैसा देखो

नूर से जल के, फ़लक से कोई साज़िश करके

चाँद को कैसे सितारों…

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Posted on January 13, 2019 at 7:30pm — 18 Comments

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At 9:45am on January 27, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय महेंद्र जी
बहुत शुक्रिया
 
 
 

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