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मेरे दिल से पूछो ये चाहता क्या हैं ,

मेरे दिल से पूछो ये चाहता क्या हैं ,

चाह थी मंजिल तो मुश्किल से मिला ,

पैसे जुटाया लुट गया तो फायदा क्या हैं ,

अपने ही साथ नहीं दिए तो वो रिश्ता कैसे ,

महसूस किया मैंने ये जीवन जिसमे ,

राहों में ओ छोर चले तो जीना क्या हैं ,

खुशिया दूर से निकल गई समझ ना सका ,

वो आखे चुराने लगे समझा मजरा क्या हैं ,

मेरे दिल से पूछो ये चाहता क्या हैं ,

उनकी ख़ुशी खुश रहने के लिए कम न था ,

हा ओ किसी और के हो गए इसका गम हैं ,

लोगो को नजर आता हैं हंसता चेहरा… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on October 5, 2010 at 8:48pm — 2 Comments

सूरज से आँख मिलाता ''चिराग'' और काल के गाल पर आँसू ढुलकाती उसकी गज़लें

सूरज से आँख मिलाता ''चिराग'' और काल के गाल पर आँसू ढुलकाती उसकी गज़लें



सौजन्य से : रविकान्त<अनमोलसाब@जीमेल.कॉम>, संजीवसलिल@जीमेलॅ.कॉम



कहते हैं उसके यहाँ देर है अंधेर नहीं. काश यह सच हो. ३४ वर्षीय जवान, संभावनाओं से भरे शायर शशिभूषण ''चिराग'' का चला जाना उसके निजाम की अंधेरगर्दी की तरफ इशारा है. पूछने का मन है ''बना के क्यों बिगाड़ा रे, बिगाड़ा रे नसीबा, ऊपरवाले... ओ ऊपरवाले.'' बकौल श्री रविकान्त 'अनमोल': '' 'चिराग़' जैसा संभावनाओं का शाइर ३४ वर्ष की छोटी आयु में चला… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on October 5, 2010 at 12:00am — 1 Comment

विशेष लेख: देश का दुर्भाग्य : ४००० अभियंता बाबू बनने की राह पर -: अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल' :-

विशेष लेख:



देश का दुर्भाग्य : ४००० अभियंता बाबू बनने की राह पर



रोम जल रहा... नीरो बाँसुरी बजाता रहा...



-: अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल' :-



किसी देश का नव निर्माण करने में अभियंताओं से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका और किसी की नहीं हो सकती. भारत का दुर्भाग्य है कि यह देश प्रशासकों और नेताओं से संचालित है जिनकी दृष्टि में अभियंता की कीमत उपयोग कर फेंक दिए जानेवाले सामान से भी कम है. स्वाधीनता के पूर्व अंग्रेजों ने अभियंता को सर्वोच्च सम्मान देते हुए उन्हें… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on October 4, 2010 at 8:31pm — 3 Comments

गौतम की प्रतीक्षा ?

कुछ तितलियाँ



फूलों की तलहटी में तैरती



कपड़े की गुथी गुड़ियाँ



कपास की धुनी बर्फ



उड़ते बिनौले



और पीछे भागता बचपन



मिट्टी की सौंध में रमी लाल बीर बहूटियाँ



मेमनों के गले में झूलते हाथ



नदी की छार से बीन-बीन कर गीतों को उछालता सरल नेह



सूखे पत्तों की खड़-खड़ में



अचानक बसंत की लुका-छिपी



और फिर बसंत -सा ही बड़ा हो जाना -



तब दीखना… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on October 4, 2010 at 5:00pm — 10 Comments

कुछ हाइकू -

कब सुनते
अतीत के सुस्वर
बीतती उमर

- - -

पीपल दादा
सुरसुराती हवा
उदास मन

- - -

झूमती जाती
सुनहली बालियाँ
पगली हवा

- - -

मैं एक नदी
गिरती औ उठती
आगे ही जाती

- - -

स्वर्ग सा सुख
ममता भरी छाँव
माँ की गोद में

- - -

सनता जाता
स्वार्थ के कीचड़ में
ये जग सारा

Added by Neelam Upadhyaya on October 4, 2010 at 4:35pm — 3 Comments

काँटा और गुहार :: (c)





Photography by : Jogendra Singh

_____________________________________



काँटा और गुहार :: © ( क्षणिका )





आसान नहीं है ...



पाँव से काँटा निकाल देना ...



हाथ बंधे हैं पीछे और ...



उसी ने बिखेरे थे यह कांटे ...



निकालने की जिससे ...



हमने करी गुहार है ...





जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 02 अक्टूबर 2010… Continue

Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on October 3, 2010 at 2:30am — 3 Comments

याद उस ग़रीब को भी कर लीजै

याद उस गरीब को भी ....
याद उस गरीब को भी कर लीजै
अदना सा था वो गोद में भर लीजै.
इरादा फौलादी था उसका, दोस्तों
नाम आज तो उसका भी ले लीजै.
पैंसठ में जो मार दी जुनूनी को, उसे
आज तक नहीं भूला, याद कर लीजै.
जय जवान-जय किसान का नारा दिया
जगाया भारत को उसे याद कर लीजै.
रहबर ही दुश्मनों से साज था, 'चेतन'
शास्त्री जी की आज तो खबर ले लीजै

Added by chetan prakash on October 2, 2010 at 7:30pm — 6 Comments

और बेहतर कलाम क्या करते

तेरे पहलू में शाम क्या करते

उम्र तेरी थी , नाम क्या करते



तेरी महफ़िल में हम जो आ जाते

लोग किस्से तमाम क्या करते



आसमां तेरा ये जमीं तेरी

हम जो करते मुकाम क्या करते



होश में आते हम भला क्यूँ कर

सारे खाली थे जाम , क्या करते



कशमकश आग की उसूलों से

मौम के इंतजाम क्या करते



सच के फिर साथ चल नहीं पाए

झूठ पे थे इनाम, क्या करते



कांच का था ये दिल जो टूटा है

इत्तला खासोआम क्या करते



जब से होने लगे… Continue

Added by vineet agarwal on October 2, 2010 at 2:11am — 3 Comments

"तमन्नायें..."



ज़िन्दगी... ... ...

देती रही तमन्नायें...

उन्हें सहेजती रही मैं...

खुद में... ... ...

इस उम्मीद से...

कि कभी... किसी रोज़...

कहीं ना कहीं...

इन्हें भी दूँगी पूर्णता...

और करूँगी...

खुद को भी पूर्ण...

जिऊँगी तृप्त हो...

इस दुनिया से...

बेखबर... ... ...



पर... ... ...

नहीं जानती थी मैं...

कि तमन्नायें होतीं हैं...

सिर्फ सहेजने के लिये...

इन समंदर…
Continue

Added by Julie on October 1, 2010 at 10:05pm — 5 Comments

..... कर दिया कमाल

वाह जनाब वाह, आप लोगों ने कर दिया कमाल ,

खुश हो गया हिंद, राम लला का मिल गया माल ,

तीन भाग में बट गया मिटीं सब मुश्किलात ,

कितना अच्छा था ये मौका दिखे सब एक साथ ,

अब गुजारिश मेरी सब से यही चाहे हिंदुस्तान ,

राम लला का मंदिर बने जो हैं देव तुल्य समान ,

गरिमा बढ़ जाएगी सब की देखेगा सारा जहान ,

हिन्दू मुस्लिम भाई भाई साथ रहेंगे सिख ईसाई ,

चारो की ताकत से ही हिंद में नई जान हैं आई ,

कौन कहता हैं हम लड़ते पूरे विश्व से हैं सवाल ,

वाह जनाब वाह आप लोग कर… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on October 1, 2010 at 12:30pm — 3 Comments

क्या लेना

क्या लेना





मुझे मंदिर से क्या लेना

मुझे मस्जिद से क्या लेना

मैं दिल से इबादत करता हूँ

मुझे राम, रहीम संग रहना

मैं गीता पढ़ सकता हूँ

गुरु ग्रन्थ साहिब रट सकता हूँ

कुरान और बाइवल मेरे दिल में बसे

मुझे इन सब के संग रहना

मुझे सियासत नहीं आती

बिलकुल भी नहीं भाती

इक सीधा सदा हूँ इन्सान

मुझे इन्सान बनके ही रहना

में 'दीपक कुल्लुवी' हूँ

मुझे है प्यार दुनिया से

मुझे सबसे मुहब्बत है

मुझे और नहीं कुछ… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on October 1, 2010 at 9:47am — 3 Comments

प्रिय ! मेरी बात सुनो

आप प्रकृति की अनुपम रचना है

मगर ...

कृत्रिम प्रसाधनो का लेपन

बनावटीपन जैसा लगता है ॥

मैं आपको रंगना चाहता हूँ

प्रकृति के रंगों से ॥



मैं आपको देना चाहता हूँ

टेसू के फूलों की लालिमा

कपोलों पर लगाने के लिए ॥

मृग के नाभि की थोड़ी सी कस्तूरी

देह -यष्टि पर लगाने के लिए ॥

फूलों के रंग -बिरंगे परागकण

माथे की बिंदी सजाने के लिए ॥

और तो और

थोड़ी सी लज्जा मांग कर लाई है मैंने

आपके लिए

लाजवंती के पौधों से ॥



इसके… Continue

Added by baban pandey on October 1, 2010 at 9:10am — 3 Comments

माही बह रही थी

माही नदी के पानी पर ढाक के पेड़ों की सुनहरी काली छाया , चांदी का वरक लपेटे बहता प्रवाह और किनारे की बजरी पर उगी नरम घास अनारो के कबीलाई मन के संस्कार बन चुके थे. उसका बचपन यहीं रेत में लोट-लोटकर उजला हुआ था. घंटों नदी के पानी में पैर डालकर बैठी रहती.छोटे-छोटे हाथ अंजुरी में पानी समेटते और हवा में कुछ बूंदें यूँ ही उछल जातीं. अनारो उन्हें लपकने की कोशिश करती और जब एक-आध बूंद उसके श्याम मुख पर गिरती तो खनखनाकर ऐसे हंसती कि सारा वातावरण उसकी हंसी से… Continue

Added by Aparna Bhatnagar on October 1, 2010 at 7:30am — 6 Comments

सामयिक कविता: फेर समय का........ संजीव 'सलिल'

सामयिक कविता:



फेर समय का........



संजीव 'सलिल'

*

फेर समय का ईश्वर को भी बना गया- देखो फरियादी.

फेर समय का मनुज कर रहा निज घर की खुद ही बर्बादी..

फेर समय का आशंका, भय, डर सारे भारत पर हावी.

फेर समय का चैन मिला जब सुना फैसला, हुई मुनादी..



फेर समय का कोई न जीता और न हारा कोई यहाँ पर.

फेर समय का वहीं रहेंगे राम, रहे हैं अभी जहाँ पर..

फेर समय का ढाँचा टूटा, अब न दुबारा बन पायेगा.

फेर समय का न्यायालय से खुश न कोई भी रह… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on October 1, 2010 at 12:43am — 2 Comments

गजल ... फूल जैसे किसी बच्चे की झलक (वफ़ा नक़वी)

फूल जैसे किसी बच्चे की झलक है मुझ मे,
कितने मासूम ख्यालों की महक है मुझ में !

रोज़ चलता हूँ हजारों किलोमीटर लेकिन,
खत्म होती ही नहीं कैसी सड़क है मुझ में !

मैं उफ़क हूँ मेरा सूरज से है रिश्ता गहरा,
एक दो रंग नही सारी धनक है मुझ में !

वो मुहब्बत वो निगाहें वो छलकते आँसू,
चंद यादों की अभी बाक़ी खनक है मुझ में

चाँद से कह दो हिकारत से ना देखे मुझ को,
माना जुगनू हूँ मगर अपनी चमक है मुझ में !

Added by SYED BASEERUL HASAN WAFA NAQVI on September 30, 2010 at 7:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल- हकीक़त ज़िन्दगी की.

काँटों की रंजिश फूलों से निकाला ना कीजिये.

किसी बेगुनाह पे कीचड़ उछाला ना कीजिये.



किस्मत में लिखा अँधेरा, तो अँधेरा ही मिलेगा,

घर किसी और का जला के उज्जाला ना कीजिये.



दूसरों से मुहब्बत की, उम्मीद करना है जायज,

मगर नफरत अपने सिने में भी पाला ना कीजिये.



इंसानियत से बढ़ कर कोई भी मजहब नहीं होता,

मजहब से कभी इंसानियत को खंगाला ना कीजिये.



भूखी है सारी दुनिया प्रेम और अपनापन की,

होंठों पे मीठे बोल खातिर ताला ना… Continue

Added by Noorain Ansari on September 30, 2010 at 3:23pm — 1 Comment

राम या रहमान

वह बोझिल मन लिए

उदास उदास

निहार रहा अपनी कुदरत

खड़ा क्षितिज के पास

मिल कर भी

नहीं मिलते जहाँ

दो जहां



अपनी अपनी आस्था की धरा पे

कायम हैं उसके बनाये इंसान

हो गए हैं जिनके मन प्रेम विहीन

बिसरा दिए हैं जिन्होंने दुनिया और दीं



इस रक्त रंजित धरा पर बिखरे

खून के निशाँ

वही नही बता सकता

उन्हें में कौन है

राम और कौन रहमान



बिसूरती मानवता के यह अवशेष

लुटती अस्मत,मलिन चेहरे,बिखरे केश



सुर्ख… Continue

Added by rajni chhabra on September 30, 2010 at 3:00pm — 4 Comments

कहाँ तक

कहाँ तक

कहाँ तक संजोउं मैं सपने सुहाने
कहाँ तक बचाऊ मैं सपने सुहाने
अपना ही नाम तक भूलने लगा हूँ
कहाँ तक छुपाऊं मैं सपने सुहाने
क्या हूँ मैं किसको पता
क्या था मैं किसको पता
सबको दिखेगा बस मेरा आज
दिखाऊं किसे ज़ख्म दिल के पुराने
कल तक तो 'दीपक' था 'कुल्लुवी' है आज
किसे क्या पता ,है आवाद या बर्वाद
कोई भूल चुका होगा किसी को याद होगा
किसे क्या पता अब तो हम हैं दीवाने

दीपक शर्मा कुल्लुवी

०९१२३६२११४८६

Added by Deepak Sharma Kuluvi on September 30, 2010 at 11:05am — 1 Comment

प्राकृतिक छटाः-

सुरज निकला है पुरब की ओर,

बिखरी है रोशनी चारो ओर।

आसमान के चाँद-तारे छिप गये,

जमीन के सारे नजारे दिख गये।।



मुर्गे ने बांग सबको सुना दिया,

हो गया सवेरा सबको बता दिया।

लोगों ने अपना बसेरा छोड़ दिया,

लगे काम पर कह सेबेरा हो गया।।



चिड़ियों ने गाना शुरू किया,

मिठे स्वर को फैलाना शुरू किया।

निकली चिड़ियाँ खुले आसमान में,

लग गयी भोजन की तलाश में।।



फुलों ने अपना खोला बदन,

लगीं फैलाने मनोहर पवन।

खुशबु ने इसके किया है… Continue

Added by Deepak Kumar on September 30, 2010 at 10:30am — 1 Comment

घरौंदा कहूँ या सराय :: ©

.

::: घरौंदा कहूँ या सराय :: ©



प्रेम सागर से झील की ओर जाता हुआ ...

जैसे छोटी सी दुनिया बसाना चाहता हो ...

छोटे सपनों सा घरौंदा बसाना चाहता हो ...



कोई आये कह दे मुझे रह लूँ बन पथिक ...

कुछ समय के लिए , तेरे इस आसरे में ...

सोच रहा हूँ अब इसे घरौंदा कहूँ या सराय ...

आना है तुम्हें फिर से चले जाने के लिए ...



तुम न… Continue

Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 29, 2010 at 7:30pm — 1 Comment

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