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हमें माफ़ कर दो आफरीन.....

प्रिय आफरीन, 
हम तुम्हे पहले से कहाँ जानते थे. वो तो जब तुम्हारे अपने  पापा ने तुम्हारी जान लेने की कोशिश की तब अख़बार वालो ने हमें तुम्हारे बारे में बताया...पूरे पाँच दिन तुम ज़िन्दगी और मौत की लड़ाई लडती रही , लेकिन अफ़सोस .....हार गयी.....हमारा तुमसे कोई रिश्ता कहाँ है, लेकिन इन पांच दिनों में, एक एक पल हम तुम्हारे लिए बेचैन रहे , और आज ...जब तुम चुपचाप जिंदगी से लड़ते लड़ते, हार कर अपनी दुनिया में लौट गयी.....बता…
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Added by Sarita Sinha on April 12, 2012 at 10:00am — 24 Comments

कुछ हाइकू

 
ईमानदार
बेईमानी बचाता
थक ही गया

 
इन्सान ही हैं
दिन गुजारते जो
तंग गली में

 
जिन्दा दिल हैं
काश समझ पाते
जिन्दा दिल को
 
 
 
बड़ा खतरा
बाहर वाले नहीं
अपने ही हैं

Added by Neelam Upadhyaya on April 12, 2012 at 10:00am — 2 Comments

कविता : सिस्टम

मच्छर आवाज़ उठाता है

‘सिस्टम’ ताली बजाकर मार देता है

और ‘मीडिया’ को दिखाता है भूखे मच्छर का खून

अपना खून कहकर

 

मच्छर बंदूक उठाते हैं

‘सिस्टम’ ‘मलेरिया’ ‘मलेरिया’ चिल्लाता है

और सारे घर में जहर फैला देता है

 

अंग बागी हो जाते हैं

‘सिस्टम’ सड़न पैदा होने का डर दिखालाता है

बागी अंग काटकर जला दिए जाते हैं

उनकी जगह तुरंत उग आते हैं नये अंग

 

‘सिस्टम’ के पास नहीं है खून बनाने वाली…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2012 at 8:30pm — 8 Comments

किसका किसका हिसाब बाक़ी है

किसका किसका हिसाब बाक़ी है,

जाने क्या क्या अज़ाब बाक़ी है......

नब्ज़ देखो अभी भी चलती है,

हसरते टूट गयीं जान अब भी बाक़ी है.....

दिलों के ज़ख्म हैं आँखों की राह रिसते हैं,

तुम समझते हो कि आँसू हमारे बाक़ी हैं.....

सुनो एक बात पूछनी थी, मगर रहने दो,

तुम को क्या पता एहसास कहाँ बाक़ी है.....

मेरे गुनाहों की…

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Added by Sarita Sinha on April 11, 2012 at 6:11pm — 15 Comments

अपना बना लेंगे

अपना बना लेंगे 


यकीं हमको नहीं होता 
कि वोह हैं बेवफ़ा यारो
चलो वोह बेवफ़ा ही सही
मुहब्बत हम सिखा देंगे
दिलों से नफरत मिटाने का
जनूं हम भी तो रखते हैं
देखना एक दिन उनको भी …
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on April 11, 2012 at 5:27pm — 2 Comments

महकायो इस जग को.



लम्हा-लम्हा सरक रहा है,

     जीवन तेरा- मेरा.
साँस चले तक सब कुछ समझो,
     उसके बाद अँधेरा!
सफ़र अनिश्चय-भरा हुआ है,
     ठौर नहीं है बस में.
जाने कब उठ जाये जग से,
      जीवन का ये डेरा. 
कितना भी तुम रहो संभाले,
       जीवन की  ये जेबें.
हालातों की रेज़र ले के
     बैठा वक़्त…
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Added by AVINASH S BAGDE on April 11, 2012 at 2:30pm — 5 Comments

सोचा न था

कभी प्यार हमें भी हो सकता है  , हमने  सोचा न था

दिल हमारा भी यूँ धड़क सकता है , हमने सोचा न था
जिस एहसास से हम गुज़र रहे है वो एहसास,
जिसमे हर पल किसी को पाने की है आस 
हमे भी होगा, सोचा न था |
कोशिशें की उन्हें भुलाने की इस दिल को पत्थर बनाने की
यादों को उनकी मिटाने की 
ख्वाबों को  उनके  भुलाने की
लाखों कोशिशों के बाद भी ये  मिट न पाएंगे,
सोचा न था |
एक बात मगर फिर भी इस…
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Added by Rohit Dubey "योद्धा " on April 11, 2012 at 11:00am — 5 Comments

मेरी कलम ने तुम्हें , महबूबा बनाया है .

 

जान ले लेगा वो तिल, लब पे जो बनाया है .

मेरी कलम ने तुम्हें , महबूबा बनाया है .

मुस्कुराती हो जब तो गालों पे, जानलेवा भंवर सा बनता है.

खोलती हो अदा से जब पलकें , झील में दो कँवल सा खिलता है.

साथ जिसको नहीं मिला तेरा, क्यों यहाँ ज़िन्दगी गंवाया है.

मेरी कलम ने तुम्हें , महबूबा बनाया है .

हुस्न की देवी तेरे ही दम से, खिलते हैं फूल दिल के गुलशन में.

देखकर तुमको ही ये हुरे ज़मीं , पलते हैं इश्क दिल की धड़कन में.

हर कोई देखता है तुमको ही, रब…

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Added by satish mapatpuri on April 11, 2012 at 12:42am — 11 Comments

और मैं कवि बन गया (हास्य) / शुभ्रांशु

सुबह-सुबह एक अजीब सा खयाल आया. आप कहेंगे ये सुबह-सुबह क्यों ? खयाल तो अक्सर रात में आते हैं, जोरदार आते हैं. फिर ये सुबह के वक्त कैसे आया ! यानि, कोई रतजगा था क्या कल रात जो इस खयाल को आने में सुबह हो गयी ? नहीं, ऐसा कुछ नहीं है. वस्तुतः, मेरे हिसाब से, ये खयाल कुछ अजीब सा था, इसीलिये इसे समझते-बूझते सुबह हो गयी.

चूँकि सुबह के वक्त जो कुछ भी आता है बहुत जोर से आता है, सो, खयाल की भी हालत कुछ वही थी. एकदम से बाहर निकल आने को बेकरार ! अब सुबह-सुबह अपना खयाल कहाँ, किसपे साफ़ करुँ ? एकदम…

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Added by Shubhranshu Pandey on April 10, 2012 at 10:00pm — 19 Comments

यह भी अपना देश है

(प्रस्तुत पंक्तियों को उल्लाला छंद में लिखने का प्रयास किया गया है,इसके प्रत्येक चरण में 13-13मात्रायें होती हैं।लघु-गुरू का कोई विशेष नियम नहीं होता,किन्तु 11वीं मात्रा लघु होनी चाहिए)



भूखी आंतों के लिए,

सेंसेक्स बस बवाल है।

तीसमार खां कह रहे,

मार्केट में उछाल है॥



जेब नहीं कौड़ी फुटी,

जनता सब बेहाल है।

भारत विकसित हो रहा,

वाह!बढ़िया कमाल है॥



कर्ज बोझ सिर पे लदा,

कृषक हुआ बदहाल है।

हम विकसित हो जायगें,

यह कोरा भौकाल…

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Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 10, 2012 at 9:30pm — 12 Comments

फुरसत

फुरसत



शहर की  मशहूर सी उस गली के दोनों किनारों पर बने घरों में रोशनी करने के लिए बिजली  के तार एक दूसरे से उलझे हुवे एक घर से दूसरे घर में, दुसरे घर से तीसरे घर में और इसी तरह  गली के सारे घरों से जुड़े हुवे थे. बिजली के इन तारों में उलझ कर एक दिन एक बंदर की मौत हो गयी. गली में बने सभी घरों में रहने वाले लोगों को बंदर की मौत से लगने वाले पाप से छुटकारा पाने की चिंता हो गयी.  गली के सभी बाशिंदओं ने आपस में रायशुमारी करने के…

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Added by Neelam Upadhyaya on April 10, 2012 at 8:30pm — 5 Comments

लायेगा अब कौन सुराज

आजाद था भारत पहले से कब गुलामी की  बेड़ियों में जकड़ा था 
सोच हमारी थी गलत फिर भी  न बदली  इसी बात का  रगडा था 
था सोने की चिड़िया भारत देश कहते अब भी है  इनकार नहीं 
पहले था  लूटा विदेशियों ने अब लूटते  वो जिनके घर बार यहीं 
हमेशा पूजा लुटेरों को निज स्वारथ घर भेदी बन सत्कार किया …
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Added by MANISHI SINGH on April 10, 2012 at 6:27pm — 13 Comments

व्यथा - एक पेड़ की

 तनहा खड़ा एक पेड़ हूँ मैं 

मन ही मन खड़ा  छटपटाता हूँ 

अतीत की धुंद में खो जाता हूँ 

कभी था बाग़ ए बहार यहाँ 

उजड़ा गुलशन बिखरा ये चमन 

लगता अब जैसे शमशान यहाँ 

आज न वो आँगन है 

न ही वे संगी साथी …

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 10, 2012 at 1:17pm — 6 Comments

एक आश्वासन भक्त का

मुझे सुनाई दी, बोली

मुझसे मेरी आत्मा बोली

पढ़ले पहले तू वेद, पुराण

या कुरान कलमां|

मै बैठा हूँ –

गिरजाघर और मंदिरों में, 

मिल जाएँगी परछाई-

गुरुद्वारों औ मस्जिदों में: 

कण कण में, ख्वाईशो में,

इश्क की फरमाईशो मे

प्यार दिल से करों तो –

मै मिलूंगा सोहणी-महिवाल में 

सच मानो मै मिलूँगा –

हीर-राँझा…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 10, 2012 at 11:30am — 2 Comments

'दरख़्त'



ताबूत  बनाते  हैं  दरख्तों  से   

या  'दरख़्त' को  कब्र  हैं देते ..

किसी  का  तो  जनाज़ा  है …

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Added by Lata R.Ojha on April 10, 2012 at 1:30am — 2 Comments

हारे ना - दृढ निश्चय जब हो !

दूर क्षितिज छाये है लाली

पक्षी-पर -ना रुकता देखो कैसे उड़ता जाता !!

नीचे -सागर विस्तृत कितना पानी -पानी

माझी-नौका -तूफाँ -लड़ते फिर पतवार चलाता !!

मंजिल कितनी दूर -न जाने -पीता पानी

राही पल -पल जोश बढ़ाये डग तो भरता जाता !!

पर्वत नाले पार किये बढ़ जाती धरती

कहीं छुएगी आसमान को साहस बढ़ता जाता !!

बीज दबा है बोझ से फिर भी

टेढ़ी - मेढ़ी राह धरे दम भरते निकला आता !!

अपनी मंजिल सब पाए जब आस बंधी

हारे ना - दृढ निश्चय जब हो !

एक आँख…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 9, 2012 at 5:49pm — 4 Comments

बुलंदी

ना कर  खुदी  को  बुलंद  इतना

कि अपनो का साथ छूट  जाएँ

और खुदा  भी  ना  पूछे,

बता  तेरी  रजा  क्या  हे

गर बढ़ना हे आगे 

तो अपनों को साथ 

लेकर चल

मंजिल पर पहुच कर

कही अकेला ना रह जाये

हर ख़ुशी बेमानी हे

गर अपनों से ना बांटी जाये

Added by Sanjeev Kulshreshtha on April 9, 2012 at 11:55am — 1 Comment

तनहा सफ़र

तनहा कट गया जिन्दगी का सफ़र कई साल का

चंद अल्फाज कह भी डालिए अजी मेरे हाल पर

मौसम है बादलों की बरसात हो ही…

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Added by RAJEEV KUMAR JHA on April 9, 2012 at 8:30am — 7 Comments

सपने

तम में अपनी तुणीर बाँध कर जब ये चलते हैं,

मेरे ह्रदय मन आँगन से रोज निकलते हैं,

एक बाण और कई लक्ष्य दें मन को छलते हैं,

मानव मन के इक कोने में सपने पलते हैं,

सुप्त पड़ी काया में तो निशदिन खेल ये करते हैं,

श्वेतश्याम से आकर मन में रंग ये भरते हैं,

कई बार मुरझाये मन में यह उजियारा करते हैं,

और मानव के जगने तक नैनों में ठहरते हैं,

कभी पूर्णता पा जाएँ सोच कर मन में टहलते हैं,

मानव मन के इक कोने में सपने पलते हैं,

छूकर मानव के मन…

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Added by Ashok Kumar Raktale on April 9, 2012 at 6:43am — 2 Comments

भारत का भविष्य बनाना है.

जहाँ में फैली भूख गरीबी 
भ्रष्टाचार  एक  महामारी है 
फलता फूलता था धर्म  जहाँ  
वहां आन बसे व्यभिचारी  हैं 
सरे बाजार लुटती अस्मत अब 
लूट  घसीट  के ये बड़े…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 8, 2012 at 2:56pm — 4 Comments

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