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देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)

बह्र : 2122 2122 2122 212 

देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले

झूठ, नफ़रत, छल-कपट से जैसे गद्दारी मिले

संत सारे बक रहे वाही-तबाही लंठ बन 

धर्म सम्मेलन में अब दंगों की तैयारी मिले

रोशनी बाँटी जिन्होंने जिस्म उनका जल गया

और अँधेरा बेचने वालों को सरदारी मिले

कौन सी चौखट पे जाएँ सच बताने जब हमें

निर्वसन राजा मिला नंगे ही दरबारी मिले

क़त्ल होने को यहाँ बस सत्य कहना है बहुत

हर गली-कूचे में दुबकी आज अय्यारी मिले

ख़ूब मँहगाई बढ़ी तो आदमी सस्ता हुआ

चंद सिक्कों की खनक पर अब वफ़ादारी मिले

----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 30, 2026 at 10:14am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 25, 2026 at 8:25am

इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी. 

हार्दिक बधाई 

 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 24, 2026 at 5:11pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय Ravi Shukla जी

Comment by Ravi Shukla on November 16, 2025 at 9:40am

आदरणीय धर्मेंद्र जी बहुत अच्छी गजल आपने कहीं शेर दर शेर मुबारक बात कुबूल करें। सादर

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 14, 2025 at 9:04pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय,  मिथिलेश वामनकर जी एवं आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on October 6, 2025 at 8:48pm

आदरणीय धर्मेन्द्र जी समाज की वर्तमान स्थिति पर गहरा कटाक्ष करती बेहतरीन ग़ज़ल कही है आपने है, आज समाज में दिख रहे नैतिकता के ह्रास, असत्य और धर्म के नाम पर पाखंड, छल और स्वार्थ को इन अशआर में व्यंग्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया है आपने. सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक पतन को उजागर करती इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 29, 2025 at 8:29am

आ. भाई धर्मेंद्र जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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