For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

March 2020 Blog Posts (64)

ग़ज़ल

मुल्क़ है ख़ुशहाल बतलाती रही मुझको हँसी

नित नये किस्सों से भरमाती रही मुझको हँसी

गफ़लतों में झूमते थे छुप गया है सूर्य अब

बादलों की सोच पर आती रही मुझको हँसी

मौत आगे लोग पीछे, था सड़क पर क़ाफ़िला

क़ाफ़िले का अर्थ समझाती रही मुझको हँसी

देखकर मायूस बचपन और सहमी औरतें

चुप्पियाँ हर ओर शरमाती रही मुझको हँसी

गालियों के संग अब तो मिल रहीं हैं लाठियाँ

मौत सच या भूख उलझाती रही मुझको हँसी

अब करोना क़हर…

Continue

Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on March 31, 2020 at 8:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

2122   2122     2122    212

तोड़ने से पहले मुझको आजमा कर देख ले

अपने घर के एक कोने में सजा कर देख ले

आज भी ज़िंदा है दुनिया में वफ़ा की रोशनी

अपने आंगन में कोई पौधा लगाकर देख ले

कोई अक्षर तुझको मिल जाएगा मेरे नाम का

अपने हाथों की लकीरों को मिला कर देख ले

हौसला करने से मिल ही जाता है सब कुछ यहाँ

वक़्त की भट्टी में बस खुद को तपा कर देख ले

सबसे बढ़कर खूबसूरत कैसे हैं तेरी हया

आइने को आंखों में काजल सजाकर देख…

Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on March 31, 2020 at 12:31am — 6 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

कैसा हाहाकार मचा है मालिक करुणा बरसाओ

सन्नाटा खुद चीख रहा है मालिक करुणा बरसाओ

भूख, गरीबी, लाचारी से पहले ही आतंकित थे

एक नया तूफान उठा है मालिक करुणा बरसाओ

वादा तुमने किया था सबसे भीड़ पड़ी तो आओगे

खतरे में फिर मानवता है मालिक करुणा बरसाओ

कौन सुनेगा टेर हमारी बिना तुम्हारे ओ पालक

बेबस मानव कांप गया है मालिक करुणा बरसाओ

तुमने साथ दिया न तो फिर किसके दर पर जाएंगे

सबके मन मे व्याकुलता है मालिक करुणा…

Continue

Added by Manoj kumar Ahsaas on March 30, 2020 at 10:19pm — 1 Comment

आसमाँ .....

आसमाँ .....

बहुत ढूँढा
आसमाँ तुझे
दर्द की लकीरों में
मोहब्बत के फ़कीरों में
ख़ामोश जज़ीरों में
मगर
तू छुपा रहा
धड़कन की तड़पन में
यादों के दर्पण में
कलाई के कंगन में
वक्त सरकता रहा
सागर छलकता रहा
अब्र बरसता रहा
मगर
तू न समझा
मैं किसे ढूँढता हूँ
पागल आसमाँ
मैं तो
इस दिल की ज़मी का
आँखों की नमी का
अपनी ज़बीं का
आसमाँ ढूँढता हूँ

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on March 30, 2020 at 8:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल

हवा ख़ामोश है वीरान हैं सड़कें

बहुत अब हो चुका बेकार मत भटकें

नहीं देंगे झुलसने आग से गुलसन

हमीं हैं फूल इसके रोज़ हम महकें

हमेशा ही रही तूफ़ान से यारी

घड़ी नाज़ुक अभी हम आज कुछ बहकें

हमें मंज़ूर है, हम शंख फूकेंगे

कि अब तो चश्म अपनों के नहीं छलकें

क़सम ले लें लड़ेंगे हम करोना से

मगर ऐसे कि अब दंगे नहीं भडकें

पुराना डर मुझे बेचैन करता जब

कभी उठतीं कभी गिरतीं तेरी…

Continue

Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on March 30, 2020 at 4:30pm — 2 Comments

अ़ज़्म

डरते  हैं  जो मुश्किल से घबराते हैं  ख़तरों से , 

लरज़ीदः क़दम फिर वो मन्ज़िल को नहीं पाते ,, 

गर अ़ज़्म जो पुख़्ता हो लें काम भी हिम्मत से, 

तो  लोग  सितारों  से  आगे  हैं  निकल  जाते ।

                   

'मौलिक व अप्रकाशित' 

Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' on March 29, 2020 at 12:19pm — 2 Comments

मेरा सपना

कल नींद में हमने एक सपना देखा।

देखा कि ,मेरा देश बदल गया है।।

जाति ,धर्म का नहीं है रगड़ा

ऊंच-नीच का खत्म है झगड़ा।।

नारी का नहीं है शोषण,

गरीब को भरपूर है पोषण।

सब के, भंडार भरे हैं,

निठल्ले भी काम करें हैं।

ना अपराधों की कही है गंध,

थाना ,कचहरी सब है बंद।

नेता सब सुधर गए हैं,

भ्रष्टाचारी ना जाने किधर गए हैं।

ना रिश्वत है ,ना चित्कार कहीं,

है शांति चहु ओर,

पर जब नींद खुली तो देखा, हकीकत है कुछ और।।



द्वारा भूपेंद्र… Continue

Added by Bhupender singh ranawat on March 29, 2020 at 10:15am — 1 Comment

स्नेह-धारा

स्नेह-धारा

कल्पना-मात्र नहीं है यह स्नेह का बंधन ...

उस स्वप्निल प्रथम मिलन में, प्रिय

कुछ इस तरह लिख दी थीं तुमने

मेरे वसन्त की रातें

मेरी समस्याओं ने

अव्यव्स्थाओं ने, अभिलाषाओं…

Continue

Added by vijay nikore on March 29, 2020 at 8:00am — 3 Comments

तड़प उनकी भी चाहत की इधर जैसी उधर भी क्या ?(७७ )

(1222 1222 1222 1222 )

तड़प उनकी भी चाहत की इधर जैसी उधर भी क्या ?

लगी आतिश मुहब्बत की इधर जैसी उधर भी क्या ?

**

मिलन के बिन तड़पते हैं वो क्या वैसे कि जैसे हम

जो बेचैनी है सोहबत  की इधर जैसी उधर भी क्या ?

**

हुआ है अनमना सा दिल हुई कुछ शाम भी बोझिल

तम्मना आज ख़िलवत की इधर जैसी उधर भी क्या ? 

**

बग़ैर इक दूसरे के जी सकें और मर न पाएँगे

ज़रूरत ऐसी…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 29, 2020 at 12:00am — 7 Comments

दूजा नहीं विकल्प

है मुश्किल आई बड़ी , सारी दुनिया त्रस्त

मिल कर साथ खड़े रहें , कहता है यह वक्त

परमपिता का न्याय तो  सबके लिए समान

अरबों के मालिक भले हों कोई श्रीमान

ईश्वर पर विश्वास का व्यर्थ मुलम्मा ओढ़

कर ना भ्रष्टाचार तू , जीवन यह अनमोल

प्रकृति हमें समझा रही , पर हित लें संकल्प

अन्य बचें तब हम बचें , दूजा नहीं विकल्प

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on March 28, 2020 at 5:30pm — 4 Comments

संदेश समय यह देता है!

प्रभु ने तुम्हें बनाया था जब
साथ तुम्हारे और बहुत कुछ
भी सिरजा था,
तुम अपने मद में भूल गए
किरदार में अपने फूल गए
 
दोहन तो सबका खूब किया
पोषण पर किंतु न ध्यान दिया
सब जीव-जंतु और वृक्ष, नदी
ये सब तुमको कुछ देते हैं
बदले में कुछ ना लेते हैं
 
अस्तित्व से तेरे जुड़े हैं ये
सबके पीछे कुछ कारण हैं
उस कारण को भी भूल…
Continue

Added by Dr Vandana Misra on March 28, 2020 at 5:19pm — 1 Comment

बोल उठी सच हैं लकीरें तेरी पेशानी की(७६ )

(2122 1122 1122 22 /112 )

बोल उठी सच हैं लकीरें तेरी पेशानी की

इस जवानी ने बहुत जिस्म की मेहमानी की

**

क्या दिया कोई किसी अपने को धोका तूने

वज्ह  आख़िर तो कोई होगी पशेमानी की 

**

वक़्त का पहिया लगातार चले मर्ज़ी से

फ़िक्र उसको नहीं दुनिया की परेशानी की

**

आब जिस रूप में हो उसकी बशर है क़ीमत…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 27, 2020 at 11:00pm — 4 Comments

सरकारी राशन



गांव मुहल्लों के लोग कोरोना के कहर के भय से मुक्त अब राहती राशन की आस में खुश हैं।मुखिया, सरपंच और गांव के अगहरिया लोगों के सभी लोग राशन कार्ड धारी हैं ही,लाल कार्ड वाले भी हो गए हैं।भले ही साधन संपन्न हों,तो क्या हुआ?एक बार कुछ ले देकर नाम शामिल हो गए,तो फिर चांदी ही चांदी है।मुफ्त का माल खाते रहिए।पूछता ही कौन है? वातावरण इसी मुआफिक बना हुआ है।कल्लू खेतिहर की बीवी बगल के घर आई है।

" कल अनाज लेने जाना होगा", कल्लू की बहुरिया इतराती हुई बोली।

" कहा से?"अनजान बनती हुई मास्टर भोला…

Continue

Added by Manan Kumar singh on March 27, 2020 at 7:06pm — 2 Comments

ऐ पागल पथिक !

ऐ पागल पथिक ! ठहरो जरा ,

रुको जरा , सांस लो तनिक ,

सम्भलो जरा I

सब कुछ पाने की चाह में ,

कुछ टूट गया उस आशियाने में,

कुछ छूट गया उस हसीं फ़सानें में ,

ठहरों, रुको, उसे सवारों, उसे खोजो जरा I

रुको जरा ........

घर पर नन्हों की आस में ,

और बुजुर्गों की लम्बी प्यास में ,

छूटे किसी साज और रियाज़ में ,

वक्त की चीनी घोलो जरा, कोई सुर ताल छेड़ो जरा I

रुको जरा ........

लूडो की गोटियाँ खोजो ,

शतरंज की बिसात बिछाओ जरा ,

कैरम की धूल…

Continue

Added by Dr. Geeta Chaudhary on March 27, 2020 at 3:32pm — 2 Comments

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ?

कोई भी भाषा हो , लेकिन

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ ?

जो दिल से भाव निकलते हैं

वह कोमल सा अहसास कहाँ ?

है नर्तन मधुर तरंगों सा

अपना ' प्रणाम ' अन्यान्य कहाँ ?

जिससे झंकृत हृद - तार मृदुल

वह सुन्दरता , उल्लास कहाँ

जब बच्चा ' अम्मा , कहकर के

जा , माँ के गले लिपटता है

इस नैसर्गिक उद्बोधन में

अद्भुत आनन्द , हुलास कहाँ ?

कोई भी भाषा हो , लेकिन

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ…

Continue

Added by Usha Awasthi on March 27, 2020 at 9:33am — 10 Comments

कोरोना का तांडव

पंख कटे पंछी हुए ,सीमित हुयी उड़ान

सर पे अम्बर था जहाँ, छत है गगन समान

सारी दुनिया सिमट कर कमरे में है कैद

घर के बाहर है पुलिस, खड़ी हुई मुश्तैद

जिनकी शादी ना हुयी , उनकी मानो खैर

और हुयी जिनकी न लें, घर वाली से बैर

घर के कामो में लगें, हर विपदा लें टाल

साँप छुछूंदर गति न हो, करफ्यू या भूचाल

भागवान से लड़ नहीं, बात ये मेरी मान

भागवान के केस में, चुप रहते भगवान

प्रथम दिवस आखिर कटा, साँसों में थे…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on March 26, 2020 at 7:54pm — 2 Comments

कोरोना पर जीत मंत्र

आप अपने आप को ,कर लो घर में बंद।
फिर खुशियां ही खुशियां है, मुश्किल के दिन चंद।।

सेनीटाइजर या साबुन से, धो लो अपने हाथ।
ज्यादा गर याद आए अपनों की, तो फोन पर कर लो बात।।

हम सबको मिलकर लड़नी है, कोरोना की लड़ाई।।
एक दूजे से दूरी ही ,इसकी है दवाई ।।

कानून तुम मान लो ,सुने कर दो रास्ते ।।
हेलो हाय छोड़ के, बस करो नमस्ते ।।

दाल रोटी से काम चला लो, छोड़ो तुम मेवा ।।
घर पर रहकर कर लो, देश की सेवा।।
द्वारा भूपेन्द्र सिंह राणावत

Added by Bhupender singh ranawat on March 26, 2020 at 7:48pm — 1 Comment

जी हाँ (ग़ज़ल)

हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222 / 1222 / 1222 / 122

अभी भी है तुम्हें उस बेवफ़ा से प्यार? जी हाँ

निभाने को ये ग़म ता-उम्र हो तय्यार? जी हाँ [1]

उसे देखे बिना इक पल नहीं था चैन दिल को

उसे फिर देखना चाहोगे तुम इक बार? जी हाँ [2]

सिवा ज़िल्लत मिला कुछ भी नहीं कूचे से उसके

अभी भी क्या तुम्हें जाना है कू-ए-यार? जी हाँ [3]

पता तो है तुम्हें सर माँगती है ये मुहब्बत

तो क्या जाओगे हँसते हँसते…

Continue

Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 26, 2020 at 3:38pm — 5 Comments

सब निरोग सब हों सुखी

कोरोना का संक्रमण सारे देश , जहान

है दुस्साध्य परिस्थिति , मुश्किल में है जान

इस संकट की घड़ी में हमको रहना एक

दृढ़ संकल्पित हों खड़े , भुला सभी मतभेद

सर्व हिताय खड़े हुए डा0 नर्स तमाम

पुलिस महकमे के लिए है आराम हराम

नित सफाई कर्मी करें बिना शिकन के काम

इनके सेवा भाव को शत , शत मेरा प्रणाम

आई है , टल जाएगी , यह जो बड़ी विपत्ति

अनुशासित घर में रहें बिना किसी आपत्ति

सब निरोग , सब हों सुखी , करना यही…

Continue

Added by Usha Awasthi on March 25, 2020 at 5:32pm — 2 Comments

ज़रा  सोचें  अगर इंसान सब लोहा-बदन  होते(७५ )

(1222 1222 1222 1222 )

ज़रा  सोचें  अगर इंसान सब लोहा-बदन  होते

यक़ीनन फिर क़ज़ा आने पे पत्थर के क़फ़न होते

**

निज़ामत ग़ौर करती  गर ग़रीबों की तरक़्क़ी पर

वतन में अब तलक भी लोग क्या नंगे बदन होते ?

**

फ़िरंगी की अगर हम नक़्ल से परहेज़ कर लेते 

नई पीढ़ी के फ़रसूदा भला क्या पैरहन होते ?

**

जूँ  लुटती आज है लुटती इसी मानन्द  गर   क़ुदरत

तो क्या दरिया शजर बचते कहीं पर कोई बन होते ?

**

अगर इन्सां न  मज़हब और फिरकों में बँटा…

Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 25, 2020 at 5:00pm — 3 Comments

Monthly Archives

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Gurpreet Singh jammu commented on Gurpreet Singh jammu's blog post ग़ज़ल - गुरप्रीत सिंह जम्मू
"शुक्रिया आदरणीय सुशील सरना जी"
6 minutes ago
Gurpreet Singh jammu commented on Gurpreet Singh jammu's blog post ग़ज़ल - गुरप्रीत सिंह जम्मू
" शुक्रिया आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर जी "
6 minutes ago
TEJ VEER SINGH commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post हमें लगता है हर मन में अगन जलने लगी है अब
"हार्दिक बधाई आदरणीय मुसाफ़िर जी। लाजवाब ग़ज़ल। "
5 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

हमें लगता है हर मन में अगन जलने लगी है अब

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२ बजेगा भोर का इक दिन गजर आहिस्ता आहिस्ता  सियासत ये भी बदलेगी मगर आहिस्ता…See More
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा त्रयी. . . . . .
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। बेहतरीन दोहे हुए हैं ।हार्दिक बधाई।"
23 hours ago
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा त्रयी. . . . . .
"आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, बहुत ख़ूब दोहा त्रयी हुई है। विशेष कर प्रथम एवं तृतीय दोहा शानदार हैं।…"
yesterday
vijay nikore posted a blog post

धक्का

निर्णय तुम्हारा निर्मलतुम जाना ...भले जानापर जब भी जानाअकस्मातपहेली बन कर न जानाकुछ कहकरबता कर…See More
yesterday

प्रधान संपादक
योगराज प्रभाकर replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आ० सौरभ भाई जी, जन्म दिवस की अशेष शुभकामनाएँ स्वीकार करें। आप यशस्वी हों शतायु हों।.जीवेत शरद: शतम्…"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा त्रयी. . . . . .

दोहा त्रयी. . . . . . ह्रदय सरोवर में भरा, इच्छाओं का नीर ।जितना इसमें डूबते, उतनी बढ़ती पीर…See More
yesterday
अमीरुद्दीन 'अमीर' posted a blog post

ग़ज़ल (जो भुला चुके हैं मुझको मेरी ज़िन्दगी बदल के)

1121 -  2122 - 1121 -  2122 जो भुला चुके हैं मुझको मेरी ज़िन्दगी बदल के वो रगों में दौड़ते हैं…See More
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post तेरे मेरे दोहे ......
"आ. भाई सौरभ जी, आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ ।"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आपका सादर आभार, प्रतिभा जी"
Monday

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service