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रवि भसीन 'शाहिद'
  • Male
  • Ferozepur, Punjab
  • India
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रवि भसीन 'शाहिद''s Friends

  • Samar kabeer
  • लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
  • योगराज प्रभाकर
 

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रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"धरोहर (लघुकथा) ताज महल की सैर कर रहे राहुल और प्रियंका ख़ूब मूड में थे। घूम-घूम कर थक गए तो एक जगह छाँव देख कर आराम करने की सोची। लंच बॉक्स भी पैक कर के लाए थे, सो बैठ कर दोपहर का भोजन करने लगे। जब खाना-पीना हो गया तो अचानक राहुल को ख़ुराफ़ात सूझी और…"
4 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-60 (विषय: धरोहर)
"आदरणीया बबिता गुप्ता जी, बहुत ख़ूब! दिल को छू गई आप की लघुकथा।"
4 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on अमीरुद्दीन खा़न "अमीर "'s blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अमीरुद्दीन ख़ान 'अमीर' साहिब, मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने नाचीज़ की सलाह पर ग़ौर किया। मुहतरम, मैं आपसे भी छोटा तालिब-ए-इल्म हूँ। कोई जसारत हो गई हो तो माज़रत-ख़्वाह हूँ।"
7 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on अमीरुद्दीन खा़न "अमीर "'s blog post ग़ज़ल
"आदरणीय अमीरुद्दीन ख़ान 'अमीर' साहिब, बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही आपने तरही मिस्रे पर, नाचीज़ आपको दाद और मुबारक़बाद पेश करता है। मुहतरम आपने जो इन अल्फ़ाज़ के हिज्जे लिखे हैं: व, मेहि, सेहि, ज, लग'तिइन्हें ऐसे लिखना मुनासिब होगा:वो, में ही, से ही,…"
10 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post तड़प उनकी भी चाहत की इधर जैसी उधर भी क्या ?(७७ )
"आदरणीय गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' साहिब, आदाब। आपने बड़ी मुश्किल रदीफ़ निभाई इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल में। दाद और मुबारक़बाद क़ुबूल फरमाएँ। हुज़ूर, मतले को पढ़ कर और कई अश'आर के मिस्रा-ए-सानी पढ़ कर मुझे 'है' की कमी महसूस हुई। कुछ सोचने के…"
11 hours ago
Samar kabeer commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post जी हाँ (ग़ज़ल)
"दोनों ग़ज़लें मैं भेज दूँगा, निश्चिंत रहें ।"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post जी हाँ (ग़ज़ल)
"आदरणीय उस्ताद-ए-मुहतरम, सादर प्रणाम! इस ग़ज़ल को अपने आशीर्वाद से नवाज़ने के लिए और बेहतरीन इस्लाह के लिए आपका हार्दीक आभार! जी सर, मैं दोनों ग़ज़लें ढूंढने की चेष्टा करूँगा। आपका ब्लॉग तो मैं पढ़ ही रहा हूँ, बाक़ी तरही मिसरे वाली ग़ज़ल ढूँढने के लिए थोड़ा…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय राज़ नवादवी साहिब, ग़ज़ल पढ़ने के लिए और ज़र्रा-नवाज़ी के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय अनीस भाई, प्रोत्साहित करने के लिए आपका हार्दीक आभार! आदरणीय उस्ताद-ए-मुहतरम की सारी बातों का गंभीरता से संज्ञान लिया है साहिब!"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय अंजली गुप्ता जी, हौसला बढ़ाने के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्र-गुज़ार हूँ। इस मिसरे को बदलने का प्रयास करूँगा, मुहतरमा। सादर"
yesterday
Samar kabeer commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post जी हाँ (ग़ज़ल)
"जनाब रवि भसीन 'शाहिद' जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । 'अभी भी है तुम्हें उस बेवफ़ा से प्यार? जी हाँ' इस मिसरे में 'भी' की जगह "तक" शब्द उचित होगा । आपने जान एलिया' की जिस ग़ज़ल…"
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post जी हाँ (ग़ज़ल)
"आदरणीय अमीरुद्दीन ख़ान साहिब, आदाब। नाचीज़ की ग़ज़ल पर ग़ौर करने के लिए और ज़र्रा-नवाज़ी के लिए तह-ए-दिल से आपका शुक्रगुज़ार हूँ मुहतरम।"
Friday
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय आक़िब साहिब, ज़र्रा-नवाज़ी के लिए आपका बेहद शुक्रगुज़ार हूँ। सातवें शे'र के बारे में आप सहीह फ़र्मा रहे हैं कि 'गुहर' से निस्बत बेहतर बनती, लेकिन उससे मेरे कहने का भाव नहीं आ पाता। दरअस्ल मैं ये कहने का प्रयास कर रहा था कि जो ग़म दिल…"
Friday
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय अशफ़ाक़ अली साहिब, आपकी दाद-ओ-तहसीन के लिए बेहद शुक्रगुज़ार हूँ।"
Friday
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय समर कबीर साहिब, सादर प्रणाम। उस्ताद-ए-मुहतरम, ग़ज़ल को वक़्त देने के लिए और अनमोल इस्लाह के लिए आपका तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ, सर। त्रुटि वाले और कमज़ोर मिस्रों को सुधारने का प्रयास करूँगा जनाब।"
Friday
रवि भसीन 'शाहिद' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"आदरणीय अशफ़ाक़ अली साहिब, इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल से मुशायरे का आग़ाज़ करने के लिए बधाई स्वीकार करें।     झेलना पड़ता है हर दौर के मौसम का मिज़ाज     तब कहीं जा के मुहब्बत का शजर बनता है बहुत अच्छा शे'र है साहिब! तरही मिस्रे पर…"
Friday

Profile Information

Gender
Male
City State
Punjab
Native Place
Ferozepur
Profession
Teacher
About me
Passionate about Urdu poetry and music, an English and IELTS trainer by profession, author of a book of short stories 'And That's the Whole Story'

रवि भसीन 'शाहिद''s Blog

जी हाँ (ग़ज़ल)

हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222 / 1222 / 1222 / 122

अभी भी है तुम्हें उस बेवफ़ा से प्यार? जी हाँ

निभाने को ये ग़म ता-उम्र हो तय्यार? जी हाँ [1]

उसे देखे बिना इक पल नहीं था चैन दिल को

उसे फिर देखना चाहोगे तुम इक बार? जी हाँ [2]

सिवा ज़िल्लत मिला कुछ भी नहीं कूचे से उसके

अभी भी क्या तुम्हें जाना है कू-ए-यार? जी हाँ [3]

पता तो है तुम्हें सर माँगती है ये मुहब्बत

तो क्या जाओगे हँसते हँसते…

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Posted on March 26, 2020 at 3:38pm — 5 Comments

ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)

रमल मुसम्मन सालिम मख़्बून महज़ूफ़ / महज़ूफ़ मुसक्किन

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़इलुन/फ़ेलुन

2122 1122 1122 112 / 22

ये सफ़र है बड़ा दुश्वार ख़ुदा ख़ैर करे

राह लगने लगी दीवार ख़ुदा ख़ैर करे [1]

इस किनारे तो सराबों के सिवा कुछ भी नहीं

देखिए क्या मिले उस पार ख़ुदा ख़ैर करे [2]

लोग खाते थे क़सम जिसकी वही ईमाँ अब

बिक रहा है सर-ए-बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे [3]

ये बग़ावत पे उतर आएँगे जो उठ बैठे

सो रहें हाशिया-बरदार ख़ुदा ख़ैर करे…

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Posted on March 20, 2020 at 7:00pm — 13 Comments

जो तेरी आरज़ू (ग़ज़ल)

बहरे हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़

1 2 2 2 / 1 2 2 2 / 1 2 2

जो तेरी आरज़ू खोने लगा हूँ

जुदा ख़ुद से ही मैं होने लगा हूँ [1]

जो दबती जा रही हैं ख़्वाहिशें अब

सवेरे देर तक सोने लगा हूँ [2]

बड़ी ही अहम हो पिक फ़ेसबुक पर

मैं यूँ तय्यार अब होने लगा हूँ [3]

जो आती थी हँसी रोने पे मुझको

मैं हँसते हँसते अब रोने लगा हूँ [4]

बढ़ाता जा रहा हूँ उनसे क़ुरबत

मैं ग़म के बीज अब बोने लगा हूँ [5]

जो पुरखों की दिफ़ा…

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Posted on March 15, 2020 at 1:00am — 10 Comments

करेगा तू क्या मिरी वकालत (ग़ज़ल)

बहरे मुतक़ारिब मुसम्मन मक़बूज़ अस्लम

121   22   121   22

फ़रेब-ओ-धोका है ये अदालत

करेगा तू क्या मिरी वकालत [1]

रसूल कितने ही आ चुके पर

गई न इंसान की जहालत [2]

सनम रिझाएँ ख़ुदा मनाएँ

है गू-मगू की ये अपनी हालत [3]

जो मुड़ गया राह-ए-इश्क़ से तो

रहेगी ता-उम्र फिर ख़जालत [4]

किसे फ़राग़त जो दे तवज्जो

दिखाइएगा किसे बसालत [5]

है मुख़्तसर मेरी गुफ़्तगू पर

है ग़ौर और फ़िक्र में तवालत…

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Posted on March 10, 2020 at 5:30pm — 4 Comments

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At 5:13pm on March 1, 2020,
प्रधान संपादक
योगराज प्रभाकर
said…

आपकी ज़र्रानवाज़ी का तह-ए-दिल से शुक्रिया मोहतरम जनाब रवि भसीन 'शाहिद' साहिब. 

 
 
 

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