For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

221—2121—1221—212

 

कविता में सम्प्रदाय लिखा-सा मिला जहाँ

शब्दों के साथ जल गई सम्पूर्ण बस्तियाँ

 

धीरे से छंट रहा था कुहासा अनिष्ट का

कुछ शिष्टजन ही लेके चले आये बदलियाँ

 

शासक, प्रशासकों से ये संचार-तंत्र तक

घूमे असत्य भी अ-पराजित कहाँ कहाँ

 

ये फलविहीन वृक्ष लगाने से क्या मिला ?

दशकों से गिड़गिड़ाती, ये कहती हैं नीतियाँ

 

अँकुए में सिर उठाने का दृढ़ प्रण है बीज का

आती हैं तीव्र वेग से, तो आये आंधियाँ

 

मैं फैलता रहा हूँ निरर्थक चतुर्दिशा

षड्यंत्र तम का देखिए सबसे प्रबल यहाँ 

 

उर्वर धरा से छीन के पोषण के तत्व वो

क्यों देखते हैं स्वप्न में गेंहूँ की बालियाँ

 

अब पल्लवन की राह से परिचित कहाँ रही 

ये पत्रहीन हो चुकी बेडौल टहनियाँ

 

इस दृश्य के भी पाश्व कई दृश्य है छुपे

मष्तिष्क है तो खोल तनिक सच की रश्मियाँ

 

घटना पढ़ी अवश्य समाचार-पत्र में

‘मिथिलेश’ कह सके न कभी, क्या हुआ वहाँ

 

----------------------------------------------------------

(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
----------------------------------------------------------

 

Views: 288

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 13, 2017 at 12:29pm

वाह्ह्ह वाह्ह्ह्हह मिथिलेश भैया हिंदी शब्द की बाहुल्यता किये गैर मुरद्दफ़ ये ग़ज़ल/गीतिका भी बहुत खूब रही हर शेर पर दाद प्रेषित है बहुत बहुत बधाई  

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 12, 2017 at 9:30am
वाह आदरणीय बेहतरीन समसामयिक चित्रण करती हुई ग़ज़ल..मेरे लिए ये सबसे कठिन मापनी है..सोचता हूँ कभी लिख सकूँगा इसपे..सादर
Comment by जयनित कुमार मेहता on February 9, 2017 at 9:37pm
आदरणीय मिथिलेश जी, हिन्दी के तत्सम शब्दावलियों से इस बह्र में ये क़माल आप ही कर सकते हैं। लाजवाब ग़ज़ल हेतु हृदयतल से अशेष बधाइयाँ आपको।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 9, 2017 at 8:25pm

आ० मिथिलेश जी , वाह क्या मुरस्सा गजल कही आपने

घटना पढ़ी अवश्य समाचार-पत्र में

‘मिथिलेश’ कह सके न कभी, क्या हुआ वहाँ      / (एक कोशिश मेरी भी ) पर कह न पाया मैं  कभी था क्या छपा वहां

Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on February 9, 2017 at 7:27pm
आदरणीय मिथीलेशजी शानदार ग़ज़ल की बधाई स्वीकार करें।
Comment by Mohammed Arif on February 9, 2017 at 6:02pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी आदाब,शानदार ग़ज़ल लिखी है आपने । बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 9, 2017 at 5:15pm

आदरणीय मिथिलेश जी ..जीवन में आजकल जो हो रहा है हर पहलू को शानदार तरीके से शेरो के माध्यम से ग़ज़ल में पिरोया है आपने ..हिंदी की इस शानदार ग़ज़ल पर आपको ढेर सारी बधाई सादर 

Comment by Samar kabeer on February 8, 2017 at 10:51pm

जनाब मिथिलेश वामनकर जी आदाब,बहुत ही उम्दा और मुरस्सा ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को ,इस पर आपकी मिहनत साफ़ दिखाई दे रही है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
सातवे शैर के ऊला मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखिये :- 'तत्व वो' ।

कुछ मिसरों में टंकण त्रुटियों को दुरुस्त कर लीजिये,शैर का मज़ा ख़राब हो रहा है ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 8, 2017 at 10:46pm
आदरणीय मिथिलेश सर सादर प्रणाम, बहुत बढ़िया ग़ज़ल के लिए बधाइयाँ, घाव गंभीरता से की गई है, बात दमदारी से कही गयी है
Comment by दिनेश कुमार on February 8, 2017 at 7:35pm
आ मिथिलेश भाई.. ऐसी ग़ज़ल कहने के लिये दिल से मुबारकबाद।
शानदार। हर शेर बहुत अच्छा हुआ है। वाह

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post शृंगारिक दोहे :
"आ. भाई सुशील जी, सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post अथ अभिकल्पित-आचार-संहिता (आलेख)
"आ. भाई शेख उस्मानी जी, बेहतरीन आलेख के लिए कोटि कोटि बधाई।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई नवीन जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Anamika singh Ana's blog post गीत
"आ. अनामिका जी, इस बेहतरीन गीत के लिए हार्दिक बधाई।"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on TEJ VEER SINGH's blog post बौना आदमी - लघुकथा -
"आ. भाई तेजवीर सिंह जी सादर अभिवादन। सुंदर- संदेशपरक लघुकथा पर ढेरों बधाई ।"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई नरेन्द्र सिह जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई तस्दीक अहमद जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
3 hours ago
TEJ VEER SINGH posted a blog post

गंगा - लघुकथा -

गंगा - लघुकथा -शंकर सेना में  हवलदार था। उसकी पोस्टिंग सिलीगुड़ी में थी। आज उसका अवकाश था तो अपनी…See More
10 hours ago
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव posted a discussion

ओबीओ लखनऊ चैप्टर की साहित्य संध्या माह अप्रैल 2019 – एक प्रतिवेदन                                      डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव

ओबीओ लखनऊ-चैप्टर की साहित्य संध्या माह अप्रैल 2019 का आगाज रविवार दिनांक 28अप्रैल 2019 को श्री…See More
10 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on TEJ VEER SINGH's blog post मेरा भारत महान - लघुकथा -
"हार्दिक आभार आदरणीय शेख उस्मानी साहब जी।"
12 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on TEJ VEER SINGH's blog post मेरा भारत महान - लघुकथा -
"आदाब। कच्चा चिट्ठा। हार्दिक बधाई आदरणीय तेजवीर सिंह साहिब इस बढ़िया व उम्दा रचना के लिए।"
15 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।"
16 hours ago

© 2019   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service