For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (17,574)

कोन कहता

कोन कहता ज़िन्दगी इक गम का नाम है
दर्द मैं डूबी हुई दुखों की खान है
मेरी तरह जलो और रोशन करो दुनियां को
फिर देखो यह ज़िन्दगी कितनी हसीन ख्वाब है

दीपक शर्मा कुल्लुवी

09136211486

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 18, 2010 at 5:47pm — 3 Comments

दो छोटी कविताएँ

मैं
नदी का बहाव नहीं
ना वक्त
मेरी फितरत है
लौटता हूँ
नमी बन
रिसता हूँ
तुम्ही में

***

इधर कविता
पीर की परिधि पर
साकार हो
शब्दों में
भरती रही भाव;
उधर
एक जिंदगी
मेरी कविता को
आकार देती सी
एक
नवजात कविता
आँचल में संजोये,
एक और
नई कविता का
तलाशती धरातल
माथे पे ले तगारी
उतरती
उस गोल घुमावदार
सीढ़ियों से
किसी मौल के
***

Added by Narendra Vyas on August 18, 2010 at 4:27pm — 6 Comments

तन्हा तन्हा पाया

ग़ज़ल

تنهى تنهى بيا

तन्हा तन्हा पाया





न उसनें साथ निभाया

न इसने साथ निभाया

जब भी देखा दिल को अपनें

तन्हा तन्हा पाया

कहनें को तो सब थे अपनें

सब तो यही कहते थे

लेकिन जब भी मुड़कर देखा

साथ किसीको ना पाया

कद्र मेरे जज्वातों की

वोह क्या खाक करेंगे

जिनको मुहब्बत नफरत में

फर्क करना ना आया

कोन नहीं चाहता उनकी याद में

बनें ना यादगारें

हमनें अपनी यादों को

सबके दिल… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 18, 2010 at 3:36pm — 4 Comments

कितना बदल गया

कितना बदल गया



मेरा शहर कितना बदल गया

मेरे वास्ते अब क्या रहा

मेरा शहर कितना बदल -----

न वोह मंजिलें न वोह रास्ते

जो कभी थे मेरे वास्ते

यहाँ लुट गया मेरा आशियाँ

यहाँ हमसफ़र न कोई रहा

मेरा शहर कितना बदल -----

जो गुजर गया उसे भूल जा

मेरा दिल यह कहता है मान जा

यह वक़्त की सौगात है

मेरा वक़्त अच्छा ना रहा

मेरा शहर कितना बदल -----

अब तो अजनवी सा लगे शहर

रिश्तों में घुल चुका ज़हर

कहने को सब अपनें हैं

अपनापन अब… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 18, 2010 at 12:41pm — 4 Comments

अफ़सोस

अफ़सोस

किनारों पे चलाना मुमकिन नहीं था
डूब जाएंगे हम यह डर था हमें
खुद हमनें किनारों पे मारी थी ठोकर
आज तलक रास्ता मिला ना हमें
हम अपनीं तवाही के कसूरबार खुद हैं
संभल ही सके ना यह ग़म है हमें
यादों के नश्तर तीखे बहुत हें
यह अपनें ही ग़म हैं मंज़ूर है हमें
देखते हैं आइना जब फुर्सत में हम
सोचते हैं अक्सर हुआ क्या हमें
जलाते रहो यूँ भी 'दीपक' हैं हम
और आपकी फ़ितरत का ईल्म है हमें

दीपक शर्मा कुल्लुवी

09136211486

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 18, 2010 at 12:26pm — 2 Comments

NA JAAO

हमारी हंसी पे न जाओ यारो
दर्द तो मेरे भी दिल में होता है
लेकिन उनके ग़म की मीठी सी चुभन
रोने भी नहीं देती हमें

DEEPAK KULUVI

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 18, 2010 at 12:25pm — 1 Comment

ना करेंगे & आओ

نا کارنگه



ना करेंगे



हम दर्द अपना बाँट कर

कुच्छ कम ना करेंगे

जो लिखा है किस्मत में

उसका ग़म ना करेंगे

मिट जाएँगे हंसते हुए

यह जानते हैं हम

बेरुखी पे आपकी

शिकवा ना करेंगे

आपको भी याद तो

आएगी एक दिन

जब ना लगेगा दिल आपका

'दीपक कुल्लुवी' के बिन

आपको हो ना हो

कोई ग़म नहीं

हम तो आपकी मुहब्बत पे

एतवार करेंगे





दीपक शर्मा कुल्लुवी

داپاک شارما… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 18, 2010 at 12:22pm — 2 Comments

"लखपति भिखारी"

सुबह-शाम - वह रोज दिखता । देह पर उसके गन्दे फटे चीथड़े जैसे कपड़े होते । कन्धे से एक झोला नुमा लटक रहा होता । शहर की मुख्य सड़क के बड़े चौराहे पर, जहाँ से सबसे अधिक गाड़ियाँ गुजरतीं अल्ल-सुबह से आधी रात तक वह वहीं दिखता । जैसे ही सिग्नल की बत्ती लाल होती, अपनी इकलौती टांग पर कूद-कूद कर हर रुकने वाली गाड़ी की खिड़की पर हाथ से ठोकता, दयनीय भाव से गिड़गिड़ाता, पेट पर हाथ फिराता और भूखा होने का भाव जताता हुआ गाड़ी वालों से पैसे मांगता । उसकी पसन्द लेकिन बड़ी सेलेक्टेड होती । उसके 'आर्डर आफ… Continue

Added by Neelam Upadhyaya on August 18, 2010 at 11:51am — 7 Comments

क्या होगा

क्या होगा

जहाँ सैक्स स्कैंडल हाकी में
इंजेक्शन लगता लौकी में
अस देश का यारो क्या होगा
वहां पड़ता सबको ही रोना
ओ-ओ-ओ-ओ-ओ-ओ-ओ
जहाँ चौड़ी छाती चोरों की
मौज है रिश्वत खोरों की
अस देश का यारो क्या होगा
वहां पड़ता सबको ही रोना
ओ-ओ-ओ-ओ-ओ-ओ-ओ
जहाँ मिलता सबकुछ नकली है
और गरीब की हालत पतली है
अस देश का यारो क्या होगा
वहां पड़ता सबको ही रोना
ओ-ओ-ओ-ओ-ओ-ओ-ओ

दीपक शर्मा कुल्लुवी
09136211486

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 18, 2010 at 10:48am — 2 Comments

हद

ग़ज़ल
حد

हद


ले लो कुछ मेरे भी गम दोस्तों
कब तलक आपके ग़म उठाऊंगा मैं
बह न जाएँ कभी अश्क डर है मुझे
कब तलक अपनें आसूं छुपाऊंगा मैं
आपकी याद जीने ना देगी मुझे
मोत से खुद को कब तक बचाऊंगा मैं
खुदा तो नहीं मैं भी इन्सान हूँ
ज़ख्म सीने में कब तक दबाऊंगा मैं
ना पीने की हमनें कसम तोड़ दी
आपके ख्यालों से कब तक बहलाऊंगा मैं

दीपक शर्मा कुल्लुवी

دبك شارما كلف

09136211486

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 18, 2010 at 10:45am — No Comments

कब तलक

ए ग़म कब तलक साथ चलता रहेगा

छोड़ दे मेरा साथ अब खुदा के लिए

ज़र्रा ज़र्रा टूट चुका है मेरा नाजुक सा दिल

माँ ले मेरी बात अब खुदा केलिए

दीपक कुल्लुवी

إ جم كاب طلاق ثاث شلت رهج
شهد د مرة سطح أب خودا ك لي
زارا زارا توت شوكة مرة نازك سى ديل
مان ل مري بات أب خودا ك لي
دبك شارما كلف

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 18, 2010 at 10:44am — No Comments

सामयिक गीत: आज़ादी की साल-गिरह / संजीव 'सलिल'

सामयिक गीत:



आज़ादी की साल-गिरह



संजीव 'सलिल'

*

*

आयी, आकर चली गयी

आज़ादी की साल-गिरह....

*

चमक-दमक, उल्लास-खुशी,

कुछ चेहरों पर तनिक दिखी.

सत्ता-पद-धनवालों की-

किस्मत किसने कहो लिखी?

आम आदमी पूछ रहा

क्या उसकी है कहीं जगह?

आयी, आकर चली गयी

आज़ादी की साल-गिरह....

*

'पट्टी बाँधे आँखों पर,

अंधा तौल रहा है न्याय.

संसद धृतराष्ट्री दरबार

कौरव मिल करते अन्याय.

दु:शासन… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on August 17, 2010 at 8:00pm — 5 Comments

मुक्तिका: कब किसको फांसे संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:



कब किसको फांसे



संजीव 'सलिल'

*

*

सदा आ रही प्यार की है जहाँ से.

हैं वासी वहीं के, न पूछो कहाँ से?



लगी आग दिल में, कहें हम तो कैसे?

न तुम जान पाये हवा से, धुआँ से..



सियासत के महलों में जाकर न आयी

सचाई की बेटी, तभी हो रुआँसे..



बसे गाँव में जब से मुल्ला औ' पंडित.

हैं चेलों के हाथों में फरसे-गंडांसे..



अदालत का क्या है, करे न्याय अंधा.

चलें सिक्कों जैसे वकीलों के झाँसे..



बहू… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on August 17, 2010 at 7:36pm — 2 Comments

जय भारत-जय भारती

एक लकडहारा था..बेहद गरीब और मासूम.जबतक जंगल में कड़ी मेहनत कर लकड़ी न काटता था और उसे बेच कर कुछ पैसे न कमाता था उसके घर में चूल्हा नहीं जलता था .एकबार कई दिनों तक लगातार मूसलाधार बारिश हुई, लकडहारा जंगल नहीं जा पाया फलस्वरूप उसके घर भुखमरी की नौबत आ गयी ....खैर ..बारिश तो एक दिन थमना था सो थमी ...लकडहारा कुल्हाड़ी लेकर जंगल भागा.संयोग से उसे एक पेड़ सूखा मिल गया..उसने मेहनत से ढेर सारी लकड़ी काटी...किन्तु एक भूल हो गयी थी ..घर से वह रस्सी लाना तो भूल ही गया था ..अब क्या हो ?लकड़ी का ढेर… Continue

Added by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on August 17, 2010 at 6:28am — 2 Comments

..तुम्हारा साया था..

अपने दिल को तब धड़कते पाया था

गो कि तुम नहीं... तुम्हारा साया था --



तुम अय्यार थे जो संभल गए जल्दी

मैं अब तलक तुम्हे भूल ना पाया था --



जुल्फों की तारीकियों में गुज़रे वो लम्हे

औ कल तुम दिखीं, जब जूड़ा बनाया था --



बहुत सिकुड़ी शब-ए-वस्ल इन बाहों में

जो हुई सहर तो कोई सपना पराया था --



तेरे दर से लौटा तो फ़कीर सा खुश था मैं

नाउम्मीदियों का पोटला भी भर आया था --



लो अश्क बन गए अब दोस्त मिरे 'ताहिर'

ख़याल-ए-इश्क जो… Continue

Added by विवेक मिश्र on August 17, 2010 at 1:30am — 7 Comments

आखरी पन्नें

AAKHARI PANNEN
आखरी पन्नें
آخر بن

मेरे आंसुओं के
कद्रदान हैं बहुत
हम रोना नहीं चाहते
वोह बहुत रुलाते हैं

दीपक शर्मा कुल्लुवी
دبك شارما كلف

हमनें किसी के वास्ते
कुछ भी नहीं किया
अब किसको क्या बतलाएं
किस हाल में मैं जिया

दीपक शर्मा कुल्लुवी
دبك شارما كلف

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 16, 2010 at 4:23pm — 4 Comments

मैं और मेरी शायरी

मैं और मेरी शायरी


मुझे अपनी खता मालूम नहीं
पर तेरी खता पर हैराँ हूँ
तकदीर के हाथों बेबस हूँ
अफ़सोस है फिर भी तेरा हूँ

दीपक शर्मा कुल्लुवी

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 16, 2010 at 4:21pm — 2 Comments

कातिल हैं

قتل حین



कातिल हैं



तेरी बेरुखी तेरा ग़म

मेरी तकदीर में शामिल है

कभी तो करते हमपे यकीं

के हम भी तेरे काबिल हैं

तेरी बेरुखी तेरा ग़म----

लाख जुदाई हो तो क्या

यादों में कभी हो ना कमीं

बचा लेंगे मंझधार से भी

हम ही तेरे साहिल हैं

तेरी बेरुखी तेरा ग़म----

क़त्ल भी कर दो उफ़ ना करें

हँसते हँसते मर जाएंगे

ना ज़िक्र करेंगे दुनियां से

कि आप ही मेरे कातिल हैं

तेरी बेरुखी तेरा ग़म----

हम 'दीपक' थे जल जाते… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 16, 2010 at 2:10pm — 5 Comments

प्राकृति से खिलवाड़

प्राकृति से खिलवाड़



प्राकृति से खिलवाड़ होगा तो प्राकृतिक आपदा आएगी ही I



कहीं बाढ़ कहीं आग कहीं सूखे की मार कहीं बादल फटने की घटनाएँ कहीं भूकंप आज एक आम सी बात हो गई है I कारण केवल एक ही है प्राकृति से खिलवाड़ I पहाड़ों जंगलों खेत खलिहानों को काट काटकर बड़े बड़े भवन,होटल बन गए I भूमाफिया जंगल माफिया राज कर रहे हैं I गरीब लोग परेशान हैं I वृक्ष कटते जा रहे हैं I धीरे धीरे हम प्रलय की और जाते जा रहे हैं I समय रहते हम लोगों में जागरूकता नहीं आई तो वो दिन दूर नहीं जब इस धरा का… Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 16, 2010 at 12:10pm — No Comments

MERI SHAYARI

आपकी यादों का खज़ाना लिए

इक रोज़ चले जाएँगे हम

याद तो करोगे ज़रूर

पर कहाँ आ पाएँगे हम

दीपक कुलुवी



दो कतरा-ए-शराब पास न होती

तो क़यामत होती

तमाम रात बीत जाती

तेरी याद ही न जाती
DEEAP SHARMA KULUVI

09136211486

Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 16, 2010 at 12:08pm — 3 Comments

Monthly Archives

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (मौत की दस्तक है क्या...)
"मुहतरम जनाब रवि भसीन शाहिद साहिब आदाब।हक़ीर की ग़ज़ल पर आपकी आमद, सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के…"
3 hours ago
Madhu Passi 'महक' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post झूलों पर भी रोक लगी -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'( गजल )
"आदरणीय लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी नमस्कार ।वर्तमान की मुख्य समस्या करोना पर एक प्रेयसी की…"
5 hours ago
Madhu Passi 'महक' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post ग़ज़ल -दौर वह यारो गया और उसके दीवाने गए
"आदरणीय सुरेंद्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' सादर नमस्कार! आज की राजनीति पर कटाक्ष करती सुंदर…"
5 hours ago
Madhu Passi 'महक' commented on सालिक गणवीर's blog post लोग घर के हों या कि बाहर के...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)
"आदरणीय सालिक गणवीर जी सादर नमस्कार। बहुत ही भावपूर्ण व सुन्दर ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद।"
5 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post वो भी नहीं रही (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीया Madhu Passi 'महक' साहिबा, नमस्कार! आपकी नवाज़िश और प्रोत्साहन के लिए…"
8 hours ago
Madhu Passi 'महक' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post वो भी नहीं रही (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी नमस्कार । ग़ज़ल बहुत अच्छी हुई है। हर शैर दिल को छू गया। इसके…"
10 hours ago
Madhu Passi 'महक' commented on Madhu Passi 'महक''s blog post राखी
"आदरणीय सुरेंद्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी सादर अभिवादन। प्रोत्साहित करने के लिए आपका…"
10 hours ago
Madhu Passi 'महक' commented on Madhu Passi 'महक''s blog post राखी
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी सादर नमस्कार ।आपकी हौसला अफ़ज़ाई के लिए तह -ए -दिल से शुक्रिया…"
10 hours ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post वो भी नहीं रही (ग़ज़ल - शाहिद फ़िरोज़पुरी)
"आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' साहिब, आपकी भरपूर दाद-ओ-तहसीन और…"
10 hours ago
सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post लोग घर के हों या कि बाहर के...(ग़ज़ल : सालिक गणवीर)
"भाई सुरेश नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप'सादर अभिवादनग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हृदयतल से…"
12 hours ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Madhu Passi 'महक''s blog post राखी
"आद0 Madhu Passi जी सादर अभिवादन अच्छी भावपूर्ण और सन्देश देती लघुकथा पर आपको बधाई देता हूँ"
12 hours ago
आशीष यादव commented on आशीष यादव's blog post पानी गिर रहा है
"आदरणीय श्री लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' बहुत बहुत धन्यवाद।"
12 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service