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दोहा सलिला: दोहा का रंग यमक के संग ---संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
दोहा का रंग यमक के संग
-- संजीव 'सलिल'
*
ठाकुर जी को सर झुका, ठाकुर करें प्रणाम. 
कारिंदे मुस्का रहे, पड़ा आज फिर काम.. 
*
नम न हुए कर नमन तो, समझो होती भूल.
न मन न तन हों समन्वित, तो चुभता है शूल..
*
बख्शी को बख्शी गयी, जैसे ही जागीर.
थे फ़कीर कहला रहे, खुद को  खुदी अमीर..
*
गये दवाखाना तभी, पाया यह सन्देश.
'भूल दवा खाना गये', झट खा लें आदेश..
*

नाहक हक ना त्याग तू, ना हक-पीछे  भाग.
ना ज्यादा अनुराग रख, ना ज्यादा वैराग..
*

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 5, 2011 at 11:30am

नाहक हक ना त्याग तू, ना हक-पीछे  भाग.
ना ज्यादा अनुराग रख, ना ज्यादा वैराग..

 

वाह वाह, गाठ बाधने योग्य दोहा, बहुत बहुत आभार आचार्य जी |

Comment by sanjiv verma 'salil' on August 29, 2011 at 8:11am

abhar.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 27, 2011 at 1:06pm

//बख्शी को बख्शी गयी, जैसे ही जागीर.

थे फ़कीर कहला रहे, खुद को  खुदी अमीर..//

इस तंज भरे दोहे पर साधुवाद.

 

//नाहक हक ना त्याग तू, ना हक-पीछे  भाग.
ना ज्यादा अनुराग रख, ना ज्यादा वैराग..//

वैदान्तिक निचोड़ का सामान्य शब्दों में सफल प्रस्तुतिकरण हुआ है.

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