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April 2012 Blog Posts (147)

हाइकु

गुमनाम है

बड़ा बदनाम है

हाँ गुलाम है.

....................

रिश्ते नाते हैं

बड़ा ही रुलाते हैं.

टूट जाते हैं.

..................

वृक्ष रोते हैं

जनता हंसती है,

कैसी बस्ती है.

.......................

सुखा कंठ है,

मनवा उदास है,

कैसी प्यास है.

.......................

 तू ही जीत है

तुझसे ही प्रीत है,

तू ही मीत है.

.....................

 भ्रष्टाचार है,

ठोस जनाधार है,

 सरकार है.…

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Added by Ashok Kumar Raktale on April 30, 2012 at 6:30pm — 18 Comments

प्रश्न

मेरा विचार है,

डाक्टरी करके 
दवाखाना खोलने का
किन्तु सोचती हूँ 
जो किसी दिन 
आ पहुंचा इमांन 
अपने कटे हाथ को, 
रिसते खून  के साथ लेकर,
जो आ पहुँची इंसानीयत, 
अपने बांझपन के इलाज  के लिए
या सत्य,
 अपने शरीर पर कुंठा से बनी 
केंसर गाठे लिये,
सोचती हूँ तब क्या मैं सक्षम  हो पाऊँगी ?
बदलती दुनिया मैं उन्हें दवा दे पाऊँगी?

Added by Iti Sharma on April 30, 2012 at 4:30pm — 8 Comments

मायाजाल

  मैंने अपने अंदर बना डाले हैं

अजीब से दायरे 

अनेक बंधन 

अनेक विचार 

मैंने पाल रखे हैं…

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Added by MAHIMA SHREE on April 29, 2012 at 5:00pm — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
भक्षक (लघु कथा )

भक्षक (लघु कथा )

 साहब मेरी बेटी कहाँ है ?हरिया ने हाथ जोड़कर स्थानीय   थाने में बैठे दरोगा से गिड़ गिडाते हुए पूछा |अब होश आया तुझे दो दिन हो गये तेरी बेटी को नहर से निकाला था,हाँ आत्महत्या का प्रयास करने से पहले तेरे पास भी तो आई थी अपनी  ससुराल वालो के अत्याचार का दुखड़ा रोने करी थी क्या तूने उसकी  मदद ,अब आया बेटी वाला |आत्म हत्या भी जुर्म है केस चलेगा अभी लाकअप में बंद है कल आना वकील के साथ लिखत पढ़त करके छोड़ देंगे|पर साहब इन कोठरियों में तो दिखाई नहीं !!!उसकी बात पूरी होने से…

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Added by rajesh kumari on April 29, 2012 at 12:30pm — 16 Comments

जिजीविषा

वसंत का मधुरस टिकता नहीं

पीयूष सावन का क्षणिक है
समय का प्रवाह रुकता नहीं
सुख का सागर  भी तनिक है ।
दिवसावसान की रक्तिमा देखो
जीवन का गूढ़ तत्व बतलाता है
एक - एक क्षण  पकड़ कर रखो
पर रेत सा मुट्ठी से फिसल जाता है ।
जिजीविषा बनी रहे चंद साँसों में
जिंदगी गुजर रही मेरे सामने से
उन्माद कम न हो देदीप्यमान आसों में
कुछ और…
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Added by kavita vikas on April 29, 2012 at 12:00pm — 3 Comments

लघु कथा :- गिरगिट

आंदोलित विभिन्न कर्मचारी संगठनों ने अपनी मांगे सरकार से मनवाने हेतु व्यस्ततम  चौराहे को मानव श्रृंखला बना कर घेर दिये थे, मेरे नेर्तित्व में भी एक संगठन नारेबाजी और रास्ता अवरुद्ध करने मे संलग्न था, भीड़ में कुछ मरीजों के परिजन  अपनी गाड़ियों को आगे जाने देने के लिए गिड़गिड़ा रहे थे, राधे बाबू जोर जोर से सभी को निर्देशित कर रहे थे कि एक व्यक्ति को भी आगे नहीं जाने देना है, चाहे कुछ हों जाए | एकाएक राधे बाबू का स्वर बदला और कहने लगे कि जाने दो भाई मरीजों की गाड़ियों…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 28, 2012 at 4:03pm — 18 Comments

उद्वेलित मानस

अरुणिम सूरज जिस दिन  मुझसे शर्त लगा झुक जाएगा,

जिस दिन सपनों के कानों में कोई सर्द आह भर जाएगा,

उस दिन भारत को  भेंट करेंगे  कफन एक सो जाने को,

जिस दिन बहता शोणित अपना  क्षार क्षार  हो जाएगा।।

 

तब तक चुप  कैसे हम हों  जब तक  छाती में गर्मी है,

जब  तक  स्वप्न  बाँध  पैरों में  भावों में  सरगर्मी है,

तब  तक  बेकल  इंतजार  करता…

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Added by Neeraj Dwivedi on April 28, 2012 at 8:30am — 6 Comments

याद तुम्हारी....

स्नेही मित्रों,  सुना है, 8 मई को मदर्स ' डे मनाया जाता है...यानि कि साल का एक दिन माँ के नाम...इस की शुरुआत कब और क्यूँ हुई, ये मुझे नहीं पता , न जानना चाहती हूँ..बस अचम्भा इस बात का होता है कि मदर्स ' डे की शुरुआत करने वाले ने यह नहीं बताया कि साल के बाकी दिनों में माँ के लिए कौन से जज़्बात रखने हैं...

अगर किसी और दिन माँ को याद करना हो या अपने उद्गार व्यक्त करने हों तो कही उस के लिए कोई सज़ा तो निर्धारित नहीं है...फिलहाल मुझे…

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Added by Sarita Sinha on April 27, 2012 at 8:00pm — 18 Comments

मैं कौन हूँ ?

मैं कौन हूँ ?

अनंत आकाश या अन्तरिक्ष का मौन हूँ 

धरती का श्रृंगार हूँ पाताल का आधार हूँ 

पर्वतों  में   हूँ   शिखर  पाषाण में  भगवान  हूँ

नदियों का पाट हूँ  निर्बाध उसका बहाव हूँ 

झरने सा पतन मेरा   झर झर  आवाज  हूँ…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 27, 2012 at 6:29pm — 11 Comments

बाद मेरे

बाद मेरे तेरी तकदीर बदल जाएगी
है यकीं मुझको मेरी याद भी न आएगी
बाद मेरे तेरी तकदीर बदल--------
छोडो मुझको मेरी यादों को कुछ नहीं इनमें 
ज़िन्दगी यूँ ही बाकी भी गुज़र…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on April 27, 2012 at 5:30pm — 10 Comments

कैसी तकदीर

कैसी तकदीर ले के दुनियां में हम आए हैं
ज़ख्म-ए-दिल पे ही तो  इल्ज़ाम  उनके खाए हैं
कैसी तकदीर ले के दुनियां -------------…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on April 27, 2012 at 5:30pm — 2 Comments

दुखी आत्मा (लघुकथा)

एक भजन लेखक,शायर का देहांत हो गया इसलिए दाहसंस्कार के लिए कुछ एक जानने पहचानने वाले  लोग दोस्त मित्र,रिश्तेदार उनके घर पर एकत्रित हो गए I सब लोग अपने अपने ढँग से उनकी विधवा  पत्नी से संवेदनाएँ व्यक्त कर रहे थे उनकी लेखनी की तारीफ कर रहे थे.... उन्हें  कुछ अवार्ड भी मिले थे उसकी चर्चा भी हो रही थी Iकुछ देर बाद एक मित्र नें उनकी विधवा पत्नी से  कहा .....भाभी जी दाहसंस्कार के लिए लकड़ी व अन्य सामग्री की ज़रुरत पडेगी इसलिए लगभग दस हज़ार रुपये दे दीजिए ....दस…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on April 27, 2012 at 5:00pm — 12 Comments

प्रियवर मै क्या गीत सुनाऊँ

प्रियवर मै क्या गीत सुनाऊँ
मरुस्थल सी सपाट ज़िन्दगी
तन्हा तन्हा वीरान ज़िन्दगी
यादों की अमराइयो में
किसे दूँ पींगें, किसे झुलाऊँ
प्रियवर मै क्या गीत सुनाऊँ-------
.
सूने मन के आँगन में
न कोई हलचल, न कोई राग
अतृप्त सपनों के महल में
क्या उकेरूँ और क्या भुलाऊँ   
प्रियवर मै क्या गीत सुनाऊँ

Added by kavita sinha gupta on April 27, 2012 at 4:30pm — 4 Comments

क्षणिकाएँ

माधुर्य

(वाणी का माधुर्य)

वाणी का माधुर्य-

देता है जीवन को विस्तार 

जहाँ प्रेम है

वहां लेन-देन नहीं है

देना ही देना है

कोई व्यापार नहीं है |

.…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 27, 2012 at 4:00pm — 6 Comments

'गज़ल'



'ग़ज़ल'

दुआओं से किसी की फल रहा हूँ

निगाहों में तुम्हारी खल रहा हूँ

 

किसी को भी नहीं मैं छल रहा हूँ

न तो रहमोकरम पर पल रहा…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on April 27, 2012 at 1:00pm — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कुछ खरी-खरी

कुछ खरी-खरी 

(१)
घर के बीच खिंच रही दीवार 
बुजुर्गों के दिलों में पड़ी दरार  
कैसा दर्दनाक मंजर है किसे देखूं |
(२)
तेरे इस गूंगे घर से तो 
खंडहर  ही बेहतर हैं 
वहां कम से कम पत्थर तो बाते करते हैं |
(३)
तुम लाये हो इक बवंडर छिपा के अपने सीने में 
एक बार तो ये सोचा होता 
ताश के पत्तों से बना है मेरा…
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Added by rajesh kumari on April 27, 2012 at 12:00pm — 14 Comments


प्रधान संपादक
आतंकवाद (लघुकथा)

आखिर पुलिस ने उस दुर्दांत आतंकवादी को मार गिराया, उसे मार गिराने वाले पुलिस अफ़सर की बहादुरी की भूरि भूरि प्रशंसा हो रही थी तथा उसके लिए बड़े बड़े सम्मान देने की घोषणाएं भी हो रहीं थी. मीडिया का एक बड़ा दल भी आज उसका साक्षात्कार लेने आ रहा था. इसी सिलसिले में वह बहादुर अफ़सर तैयारियों का जायजा लेने पहुँचा.



"सब तैयारियां हो गईं?" उसने एक अधीनस्थ से पूछा

"जी सर !"

"क्या किसी ने लाश की शिनाख्त की:"

"नहीं सर, चेहरा इतनी बुरी तरह से…

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Added by योगराज प्रभाकर on April 26, 2012 at 12:13pm — 39 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आज की नारी

मैं हूँ स्वछन्द ,नीर की बदरी, जहां चाहे बरस जाऊँगी …

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Added by rajesh kumari on April 26, 2012 at 9:00am — 13 Comments

क्यों

गंग नहाये जात हैं,दूर करै तन पाप।

जौ उनका पापी कहौं,क्योंकर हो संताप॥



माँ पत्नी भगिनी चहौं,ममता सेवा प्यार।

बेटी जनकर दुखी क्यों,हो जाते सरकार॥



आशा मन अच्छा करैं,लोग बाग बर्ताव।

क्यों रखते कुछ एक से,निज मन में दुर्भाव॥



अनुशासन जन में रहे,बना देश कानून।

क्यों होता है तब यहां,रोज कत्ल कानून॥



अंधे से नहि पूछते,बुरे भले की बात।

अंधा तो कानून भी,शरण चले क्यों जात॥



ललचाइ अंखियां लखै,तिरिया बेटी आन।

जौ कोई इनकै… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 26, 2012 at 7:00am — 20 Comments

पेश है हाइकु....

पेश है हाइकु....

१.लाल हथेली
   शगुन के बहाने
   मेहंदी खिली.
२.मिली बधाई
   सपना सच हुआ
   बेटी पराई.
३.सु-संस्कार
   दफना दिये मूल्य
   बंगला-कार
४.करेला है
   नीम के झाड़ पर
   खूब खेला है.
५.धोबी बेचारा
    घर का न घाट का
    गधा सहारा.
६.ये घटनाएँ
   …
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Added by AVINASH S BAGDE on April 25, 2012 at 1:12pm — 13 Comments

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