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व्यथा - एक पेड़ की

 तनहा खड़ा एक पेड़ हूँ मैं 

मन ही मन खड़ा  छटपटाता हूँ 

अतीत की धुंद में खो जाता हूँ 

कभी था बाग़ ए बहार यहाँ 

उजड़ा गुलशन बिखरा ये चमन 

लगता अब जैसे शमशान यहाँ 

आज न वो आँगन है 

न ही वे संगी साथी …

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 10, 2012 at 1:17pm — 6 Comments

एक आश्वासन भक्त का

मुझे सुनाई दी, बोली

मुझसे मेरी आत्मा बोली

पढ़ले पहले तू वेद, पुराण

या कुरान कलमां|

मै बैठा हूँ –

गिरजाघर और मंदिरों में, 

मिल जाएँगी परछाई-

गुरुद्वारों औ मस्जिदों में: 

कण कण में, ख्वाईशो में,

इश्क की फरमाईशो मे

प्यार दिल से करों तो –

मै मिलूंगा सोहणी-महिवाल में 

सच मानो मै मिलूँगा –

हीर-राँझा…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on April 10, 2012 at 11:30am — 2 Comments

'दरख़्त'



ताबूत  बनाते  हैं  दरख्तों  से   

या  'दरख़्त' को  कब्र  हैं देते ..

किसी  का  तो  जनाज़ा  है …

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Added by Lata R.Ojha on April 10, 2012 at 1:30am — 2 Comments

हारे ना - दृढ निश्चय जब हो !

दूर क्षितिज छाये है लाली

पक्षी-पर -ना रुकता देखो कैसे उड़ता जाता !!

नीचे -सागर विस्तृत कितना पानी -पानी

माझी-नौका -तूफाँ -लड़ते फिर पतवार चलाता !!

मंजिल कितनी दूर -न जाने -पीता पानी

राही पल -पल जोश बढ़ाये डग तो भरता जाता !!

पर्वत नाले पार किये बढ़ जाती धरती

कहीं छुएगी आसमान को साहस बढ़ता जाता !!

बीज दबा है बोझ से फिर भी

टेढ़ी - मेढ़ी राह धरे दम भरते निकला आता !!

अपनी मंजिल सब पाए जब आस बंधी

हारे ना - दृढ निश्चय जब हो !

एक आँख…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 9, 2012 at 5:49pm — 4 Comments

बुलंदी

ना कर  खुदी  को  बुलंद  इतना

कि अपनो का साथ छूट  जाएँ

और खुदा  भी  ना  पूछे,

बता  तेरी  रजा  क्या  हे

गर बढ़ना हे आगे 

तो अपनों को साथ 

लेकर चल

मंजिल पर पहुच कर

कही अकेला ना रह जाये

हर ख़ुशी बेमानी हे

गर अपनों से ना बांटी जाये

Added by Sanjeev Kulshreshtha on April 9, 2012 at 11:55am — 1 Comment

तनहा सफ़र

तनहा कट गया जिन्दगी का सफ़र कई साल का

चंद अल्फाज कह भी डालिए अजी मेरे हाल पर

मौसम है बादलों की बरसात हो ही…

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Added by RAJEEV KUMAR JHA on April 9, 2012 at 8:30am — 7 Comments

सपने

तम में अपनी तुणीर बाँध कर जब ये चलते हैं,

मेरे ह्रदय मन आँगन से रोज निकलते हैं,

एक बाण और कई लक्ष्य दें मन को छलते हैं,

मानव मन के इक कोने में सपने पलते हैं,

सुप्त पड़ी काया में तो निशदिन खेल ये करते हैं,

श्वेतश्याम से आकर मन में रंग ये भरते हैं,

कई बार मुरझाये मन में यह उजियारा करते हैं,

और मानव के जगने तक नैनों में ठहरते हैं,

कभी पूर्णता पा जाएँ सोच कर मन में टहलते हैं,

मानव मन के इक कोने में सपने पलते हैं,

छूकर मानव के मन…

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Added by Ashok Kumar Raktale on April 9, 2012 at 6:43am — 2 Comments

भारत का भविष्य बनाना है.

जहाँ में फैली भूख गरीबी 
भ्रष्टाचार  एक  महामारी है 
फलता फूलता था धर्म  जहाँ  
वहां आन बसे व्यभिचारी  हैं 
सरे बाजार लुटती अस्मत अब 
लूट  घसीट  के ये बड़े…
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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 8, 2012 at 2:56pm — 4 Comments

महंगाई और मंत्री जी!

चीनी के दाम बढने पर

पत्रकारों ने खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री से सवाल पूछा.-

मंत्री जी ने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया.

चीनी कम खाइए, डायबिटीज को दूर भगाइए.

मैं तो चाय भी बिना चीनी के पीता हूँ,

कहिये तो आपलोगों के लिए भी मँगा दूँ.

पत्रकारों का अगला सवाल था -

सर, दाल बहुत महंगा है,

मंत्री जी फिर बोले,

आपने सुना नहीं, अमरीका ने क्या कहा है?

वे कहते हैं, भारतीय दाल ज्यादा खाते हैं,

इसीलिये गाल भी ज्यादा बजाते हैं.

अब मेरी सलाह मानिए,

गरम पानी में…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on April 8, 2012 at 6:31am — 8 Comments

वाणी वंदना

वाणी वंदना

\

रसना पर अम्ब निवास करो,

माँ हंसवाहिनी नमन करूँ.

सेवक चरणों का बना रहूँ,

नित उठ बस तेरा ध्यान धरूँ.

 

छंदों का नवल स्वरुप लिखूँ,

लेखनी मातु रसधार बने.

हो प्रबल काव्य उर वास करो,

हर छंद मेरा असिधार बने.

 

मन…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 7, 2012 at 11:00pm — 12 Comments

अहसास

 अहसास

श्वेत वसन में लिपटा जीवन

जन गण का सम्मान लिए !

चूसें रक्त सदा वे विचरें

कानून न उन पर हाथ धरे !!

 

भले दीखते ऊपर ही चंगे

जब मन को साफ रखे ना !…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 6, 2012 at 10:00pm — 12 Comments

खाली हाथ

आज वह (मानव )
पंचभूत में विलीन हो गया
कुछ भी तो नहीं ले जा सका
सबकुछ
जहाँ का तहां विद्यमान हैं
जब जीवन था
तब उसे फुर्सत था कहाँ ?
न संतुष्टि थी
न खुशिया
नित नए खोज में उलझे
वह प्राणी
भाग रहा था
परन्तु आज सबकुछ
ख़त्म हो गया
खाली हाथ आया था
खाली हाथ ही चला गया l

Added by Rita Singh 'Sarjana" on April 6, 2012 at 9:30pm — 20 Comments

मन मंथन

(गणबद्ध)                  मोतिया दाम छंद

सूत्र = चार जगण (१६ मात्रा) यानि  जगण-जगण-जगण-जगण (१२१ १२१ १२१ १२१)

************************************************************************************

दिखी  जब  देश  विदेश  अरीत.

दिखा शिशु भी हमको भयभीत .

तजें हम  द्वैष  बनें  मनमीत.

लिखूँ कुछ काव्य अमोघ…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 6, 2012 at 5:30pm — 12 Comments

अब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं आयेगा..

मसीहा मर गया कब का लटक के सूली पे ,
कि छूटी जान इस जहाँ के चालबाजों से,
कोई पागल नहीं है वो कि फिर से आयेगा  ,
कम अज़ कम कब्र में तो चैन से सोने दो उसे ...
.…
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Added by Sarita Sinha on April 6, 2012 at 2:30pm — 9 Comments

'हनुमान जयन्ती पर विशेष'

“हनुमान जयन्ती पर विशेष”

'दोहे'

 

खिली…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on April 6, 2012 at 1:13pm — 14 Comments

परिदृश्य

परिदृश्य

  

(1)

फर्क 

दो लड़कियां दोनों ही सुन्दर , 

उम्र थी सत्रह से…

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Added by Mukesh Kumar Saxena on April 6, 2012 at 1:00pm — 8 Comments

कितना अच्छा लगता है

कितना अच्छा लगता है

यूँ अनायास मिलना

दुनियाँ के गलियारों में

साथ-साथ फिरना…

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Added by RAJEEV KUMAR JHA on April 6, 2012 at 10:30am — 16 Comments

हम पंछी एक डाल के

हम पंछी एक डाल के

Disclaimer:यह कहानी किसी भी धर्म या जाती को उंचा या नीचा दिखाने के लिए नहीं लिखी है, यह बस विषम परिस्थितियों में मानवी भूलों एवं संदेहों को उजागर करने के उद्देश्य से लिखा है. धन्यवाद.…

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Added by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on April 6, 2012 at 10:00am — 19 Comments

ये झुग्गियां ......!

ये झुग्गियां

बांस और फूस से बनी,

चटाई से घिरी

गंदे स्थान पर,

शहर के कोढ़ की तरह

दिखती हैं.

ये झुग्गियां

बड़ी अट्टालिकाओं के

आजू-बाजू,

जैसे ये

उनका मुंह चिढ़ा रही हों!

इन झुग्गियों में रहने वाले

मिहनत-कश इंसान होते हैं

महलों को बनाने वाले

कारीगर होते हैं

सपनो के बाजीगर होते हैं

ये सजाते है

सेहरे, डोलियाँ,सेज

ये सजाते हैं

मंच, आयोजन स्थल, प्रवचनशाला

ये बिखेरते है खुशबू, फूलों की

करते है इत्र से…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on April 6, 2012 at 8:37am — 16 Comments

कैसी गंगा?अब अवजल है|

कुछ नहीं बिगाड़ सकी,

मेरा,

सिकंदर की तलवार|

हाँ,झेला है मैंने –

सेल्युकस की रार|

नादिरशाही तलवारों की…

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Added by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on April 5, 2012 at 9:30pm — 9 Comments

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"आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। चित्रानुरूप उत्तम छंद हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
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