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आज फिर ... क्या हुआ

थरथरा रहा

दुखात्मक भावों का

तकलीफ़ भरा, गंभीर

भयानक चेहरा

आज फिर

दुख के आरोह-अवरोह की

अंधेरी खोह से

गहरी शिकायतें लिए

गहराया आसमान

आज फिर 

ढलते सूरज ने संवलाई लाली में रंगी

कुछ खोती कुछ ढूँढ्ती

एक और मटमैली

उलझी-सी शाम

आज फिर

सिमटी हुई कुछ डरी-डरी

उदास लटकती शाम

डूबने को है ...

डूबने दो 

मन में हलचल गहरी

मरूस्थल-सा सूखापन

एक और "आज" को जाते-जाते

इस आज की व्यथा-कथा

कहने दो

भटक गई हवायों को  पलटने दो

आज फिर प्यार के दर्द के पन्ने

प्यार जो पागल-सा

तैर-तैर दीप्त आँखों में तुम्हारी

गया था नभ को छूने

आज फिर ...

ठहरता नहीं है "आज" मुठ्ठी में

रुकी है अभी गई-गुज़री कुछ रोशनी

अन्धेरा होने को है

सहने दो

           --------

-- विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by vijay nikore on July 10, 2019 at 4:45pm

सरहाना के लिए हार्दिक आभार,आदरणीया रचना जी। हुआ शब्द का सुधार कर लूंगा। अच्छा है कि आपने नोटिस किया। आभार।

Comment by vijay nikore on July 10, 2019 at 4:43pm

सरहाना के लिए हार्दिक आभार, भाई गोपाल नारायन जी।

Comment by Ajay Tiwari on July 6, 2019 at 11:06am

आदरणीय विजय जी, एक और अच्छी कविता के लिए हार्दिक बधाई.

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 4, 2019 at 5:52am

आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बेहतरीन कविता हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on July 3, 2019 at 2:56pm

जनाब भाई विजय निकोर जी आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 3, 2019 at 9:07am

हार्दिक बधाई आदरणीय विजय निकोरे जी।लाज़वाब प्रस्तुति।

Comment by Rachna Bhatia on July 2, 2019 at 10:37am
आदरणिय विजय निकोर जी
अच्छी कविता
हुआ. शायद हुया लिखा गया है।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on July 1, 2019 at 9:14pm

आज फिर

एक कविता 

जो किसी कोने में 

सिमटी पड़ी थी 

स्मृतियों के जरिये 

पीड़ाओं का नया

आलम्बन तलाश 

जन्म ले चुकी है 

धीरे धीरे ---इस प्रकार 

जैसा हमने पढ़ा ------------------------------------सादर आ० निकोर जी 

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