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Vijay nikore's Blog (203)

अनजाना उन्माद

अनजाना  उन्माद

 

मिलते ही तुमसे हर बार

नीलाकाश सारा

मुझको अपना-सा लगे

बढ़ जाए फैलाव चेतना के द्वार

कण-कण मेरा पल्लवित हो उठे

कि जैसे नए वसन्त की नई बारिश

दूर उन खेतों के उस पार से ले आती

भीगी मिट्टी की नई सुगन्ध

कि जैसे कह रही झकझोर कर मुझसे ....

मानो मेरी बात, तुम जागो फिर एक बार    

सुनो, आज प्यार यह इस बार कुछ और है

 

और तुम ...…

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Added by vijay nikore on May 9, 2021 at 2:30pm — 1 Comment

विदा की वह शाम ...

विदा  की  वह  शाम

 

प्रबल  झंझावात  के  बाद  मानो

दिशा-दिशा   आकुल अकथ  सुनसान

निस्तब्ध   शांत ... और  इस  पर

दिन  से सम्बन्ध  तोड़  रही

वैभव-विहीन  शाम…

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Added by vijay nikore on April 27, 2021 at 2:30pm — 1 Comment

यह रास्ते ... यह मोड़

यह रास्ते … यह मोड़
 
मुद्दतें  हो  चुकी  हैं रास्तों  को
रास्तों  से अलग  हुए
फिर  भी  कोई  उमीद  लिए
रात से  भोर  तक और  फिर
एक और  रात  तक  
लैम्पपोस्ट  के कांपते  प्रकाश  तले
समर्पण  भाव  से  यह  रास्ते
चट्टानी  चुप्पी  की  चादर  ओढ़े
यह  उसी  मोड़  पर जुड़े  रहे
 
जमी  रही  है  उस  मोड़  पर
अनोखी  इमानदारी  से
हमारी  विरह  की…
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Added by vijay nikore on April 24, 2021 at 11:30pm — 2 Comments

आँखों के द्वार बंद होने से पहले

झुक आई है एक और शाम

ग्रभ में गहरी-भूरी स्तब्धता लिए

कुछ फ़ासले, कुछ फ़ैसले

लगते थे जो कभी

थे हमारे लिए नहीं

हर किसी और के लिए

खड़े हैं अब वही फ़ासले

वही फ़ैसले 

घूर रहे हैं सवाल बने बड़े-बड़े

सवालों के उत्तर की प्रत्याशा

ले आती एक और गंभीर शाम

और फिर एक और   ...

मंज़िल तो लगती ही थी हमेशा

पकड़ के बाहर, पहुँच से दूर बहुतं

लेकिन उस आखरी शाम

कुछ तुमने कहा, जो मैंने सुना

"मेरे…

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Added by vijay nikore on February 16, 2021 at 7:00am — 5 Comments

अजीब था यह अनमोल नाता ... अमृता प्रीतम जी

अजीब था यह अनमोल नाता ... अमृता प्रीतम जी

 

कई दशक पहले मैं जब भी प्रिय अमृता प्रीतम जी के उपन्यास पढ़ता था, पुस्तक को रखते एक कसक-सी होती थी, यह इसलिए कि एक बार आरम्भ करके उनकी पुसत्क को रखना कठिन होता था। आज भी ऐसा ही होता है। जब से एक प्रिय मित्र पिंकी केशवानी जी ने अमृता जी की पुस्तक “मन मंथन की गाथा” मुझको भेंट में भेजी, जब भी ज़रा-सा अवकाश मिलता है, यह पुस्तक मुझको झट पास बुलाती है।

मित्र पिंकी ने पुस्तक में लिखा, “एक छोटी-सी भेंट,…

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Added by vijay nikore on September 25, 2020 at 10:51pm — 1 Comment

आत्मबोध

खालीपन का भारीपन

नहीं मालूम, नहीं मालूम मुझको

मेरा यह अनुभव केवल मेरा ही है

या है यह हर किसी का

कहीं कुछ खो देने की पीड़ा से निवर्त होने  का

अनवरत  प्रारम्भिक  प्रयास…

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Added by vijay nikore on August 24, 2020 at 7:30am — 4 Comments

बदलाव !

बदलाव !

तड़के प्रात:

स्वच्छ धूप की नरम दूब से

मिलने की उत्सुक्ता ...

 

कुछ इसी तरह कोई लोग

कितनी उत्सुक्ता से अपने बनते

निज को समर्पित…

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Added by vijay nikore on May 14, 2020 at 5:00am — 6 Comments

तृप्ति

तृप्ति

चहुँ ओर उलझा कटा-पिटा सत्य

कितना आसान है हर किसी का

स्वयं को क्षमा कर देना

हो चाहे जीवन की डूबती संध्या

आन्तरिक द्वंद्व और आंदोलन

मानसिक सरहदें लाँघते अशक्ति, विरोध

स्वयं से टकराहट

व्यक्तित्व .. यंत्रबद्ध खंड-खंड

जब देखो जहाँ देखो हर किसी में

पलायन की ही प्रवृत्ति

एक रिश्ते से दूसरे ...

एक कदम इस नाव

एक ... उस…

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Added by vijay nikore on May 13, 2020 at 5:30am — 4 Comments

चेतना का द्वार

चेतना का द्वार

उठते ही सवेरे-सवेरे

चिड़ियों की चहचहाट नहीं

आकुल क्रन्दन... चंय-चंय-चंय

शायद किसी चिड़िया का बीमार बच्चा

साँसे गिनता घोंसले से नीचे गिरा था

वह तड़पा, काँपा…

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Added by vijay nikore on May 4, 2020 at 1:00pm — 7 Comments

आत्मावलंबन

आत्मावलंबन

बाहरी दबाव और आंतरिक आदर्श 

असीम उलझन और तीव्रतम संघर्ष

ऐसा भी तो होता है कभी

कि मन का सारा संघर्ष मानो

किसी एक बिंदु पर केंद्रित हो उठा हो

और पीड़ा ... जहाँ कहीं से भी उभरी

सारी की सारी द्रवित हो कर

उस एक बिंदु के इर्द-गिर्द

ठहर-सी गई हो

बह कर कहीं और चले जाने का

उस पीड़ा का

कोई साधन न हो

वाष्प-सा उसका उड़…

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Added by vijay nikore on April 28, 2020 at 6:52am — 6 Comments

न सीखी होशियारी

न  सीखी  होशियारी

सर्वसामान्य का संवाग रचाते

मानव में है मानो चिरकाल से

उथल-पुथल गहरी भीतर

पग-पग पर टकराहट बाहर

आदर्श, व्यवहार और विवेक में

असामंजस्य…

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Added by vijay nikore on April 13, 2020 at 10:00am — 2 Comments

असाधारण सवाल

असाधारण सवाल

यह असाधारण नहीं है क्या

कि डूबती संध्या में

ज़िन्दगी को राह में रोक कर

हार कर, रुक कर

पूछना उससे

मानव-मुक्ति के साधन

या पथहीन दिशा की परिभाषा

असाधारण यह भी नहीं है कि

ज़िन्दगी के पाँच-एक वर्ष छिपाते

भीगते-से लोचन में अभी भी हो अवशेष

नूतन आशा का संचार

चिर-साध हो जीवन की

सच्चे स्नेह की सुकुमार अभिलाषा

पर असाधारण है,…

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Added by vijay nikore on April 10, 2020 at 5:00am — 2 Comments

मृदु-भाव

मृदु-भाव

प्रात की शीतल शान्त वेला

हवा की लहर-सी तुम्हारी मेरे प्रति

मृदु मोह-ममता

मैं बैठा सोचता मेरे अन्तर में अटका

कोलाहल था बहुत

क्यूँ किस वातायन से किस द्वार से कैसे

चुपके से आकर मेरे जीवन में

घोल दिए सरलता से तुमने मुझमें

प्रणय के पावन गीत

किसी सपने की मधुरिमा-सी

सच, प्यारी है मुझको तुम्हारी यह प्रीत

नए प्यार के नवजात गीत की नई प्रात

तुम आई,…

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Added by vijay nikore on April 4, 2020 at 4:31pm — 4 Comments

स्नेह-धारा

स्नेह-धारा

कल्पना-मात्र नहीं है यह स्नेह का बंधन ...

उस स्वप्निल प्रथम मिलन में, प्रिय

कुछ इस तरह लिख दी थीं तुमने

मेरे वसन्त की रातें

मेरी समस्याओं ने

अव्यव्स्थाओं ने, अभिलाषाओं…

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Added by vijay nikore on March 29, 2020 at 8:00am — 3 Comments

प्रणय-परीक्षा

प्रणय-परीक्षा

सुना है कुछ ऐसा केवल

स्वप्न-लोक में 

या परियों की कहानी में होता है

सात समुद्र पार से आता है

घोड़े पर सवार

सात युगों का प्यार

पर हवा-सी झूमती

शैतानी-भरी हँसी हँसती

भरे आँखों में खुमारी की लालिमा

ऐसी गुड़िया से मिलना

मेरे जीवन के रंग-मंच पर

यह कोई सपना नहीं था

काट रही थी कब से मुझको

समय की तेज़ धार

मिला हवा की लहर-सा…

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Added by vijay nikore on March 23, 2020 at 12:30pm — 2 Comments

बाँधा जो साँसों ने साँसों से धागा

बाँधा जो साँसों ने साँसों से धागा

आँसू में, कुछ मुस्कानों में

मिलन की वेला के सुख में मिश्रित

बिछोह की घड़ी की व्यथा अपार

डरते-मुस्कुराते चेहरे पर पाईं हमने

ढुलक आई थीं बूँदें जो भीगी पलकों से

मिला था उनमें प्राणों को प्रीति का दान

ऐसे में हृदय ने सुनी हृदय की मधुर धड़कन

मधुमय मूक स्वर उस अद्वितीय आलिंगन में

आच्छादित हुए ऐसे में ज्यों भीगे गालों पर गाल

मुझको लगा उस पावन…

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Added by vijay nikore on March 16, 2020 at 2:00pm — 6 Comments

सम्मोहन

सम्मोहन 

सम्मोहन !

जानता था मन, शायद न लौटेंगे हम

वह प्रथम-मिलन की वेला ही होगी 

शायद हमारा अंतिम मिलन

अंतिम मुग्ध आलिंगन

उस परस्पर-गुँथन में थी लहराती

चिन्तनशील यह उलझन गहरी

जी में फिर भी था अतुल उत्साह

कि रहेंगे जहाँ भी, खुले रहेंगे हमारे

सुन्दरतम मन-मंदिर के वातायन

खुले रहेंगे पूरम्पूर परस्पर प्राणों के द्वार

कि तड़पती भागती दिशाओं के पार भी

अजाने…

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Added by vijay nikore on March 8, 2020 at 12:30am — 6 Comments

सौन्दर्य-अनुभूति

सौन्दर्य-अनुभूति

नई जगह नई हवा नया आकाश

न जाने कितने बँधनों को तोड़

अनेक बाहरी दबावों को ठेल

सैकड़ों मीलों की दूरी को तय कर

मुझसे मिलने तुम्हारा चले आना

मानसिक प्रष्ठभूमि में होगी ज़रूर

पावन स्नेह के प्रति तुम्हारी साधना

और इस प्रष्ठभूमि में तुमसे मिलना

था मेरे लिए भी उस स्वर्णिम क्षण

सौन्दर्य का आकर्षण

हमारा वह प्रथम मिलन

सुखद सरल भाव-विनिमय

खुल गए थे…

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Added by vijay nikore on March 7, 2020 at 5:46am — 2 Comments

झोल खाई हुई खुशी

झोल खाई हुई खुशी

तारों भरी रात, फैल रही चाँदनी

इठलाता पवन, मतवाला पवन

तरू-तरु के पात-पात पर

उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास

मेरा मन क्यूँ उन्मन

क्यूँ इतना उदास…

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Added by vijay nikore on March 2, 2020 at 4:30am — 4 Comments

मुझे आज तुमसे कुछ कहना है

प्रिय, मुझे आज तुमसे कुछ कहना है ...

जानता है उल्लसित मन, मानता है मन

तुम बहुत, बहुत प्यार करती हो मुझसे

गोधूली-संध्या समय तुम्हारा अक्सर चले आना, 

गलें में बाहें, गालों पर चुम्बन, अपनत्व जताना

झंकृत हो उठता है मधुरतम पुरस्कृत मन-प्राण

मैं बैठा सोचता, सपने में भी कोई इतना अपना

आत्म-मंदिर में अपरिसीम मधुर संगीत बना

निज का साक्षात प्रतिबिम्ब बन सकता है कैसे

पलता है मेरी आँखों में प्रिय, यह प्यार…

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Added by vijay nikore on February 26, 2020 at 6:30pm — 4 Comments

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