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हमेशा तो नहीं होती बुरी तकरार की बातें(ग़ज़ल)

1222 1222 1222 1222


हमेशा तो नहीं होती बुरी तकरार की बातें
इसी तकरार से अक्सर निकलतीं  प्यार की बातें।

नज़र मंजिल पे रक्खो तुम बढ़ाओ फिर कदम आगे
नहीं अच्छी लगा करतीं हमेेशा हार की बातें।

अँधेरे में चरागों-सा उजाला इनसे मिल जाता
गुनी जाएं तज्रिबे  के  सही गर सार की बातें।

अलग हैं रास्ते चाहे है मंजिल एक पर सबकी
जो ढूंढें खोट औरों में करे वो रार की बातें।

सँभलने का, समझने का, सलीका आ यूँ जाता है
कि खुद की गलतियों के जो करें इकरार की बातें।

समझना चाहते हो मोल खुशबू का कहीं दिलबर
सुनो तुम ध्यान से पहले वहाँ के ख़ार की बातें।

तज्रिबा:अनुभव

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by नाथ सोनांचली on November 11, 2018 at 5:08pm

आद0 सतविंदर भाई जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने। बहुत बहुत बधाई स्वीकार कीजिये।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 11, 2018 at 12:08am

आदरणीय अजय तिवारी जी, आदरणीय बृजेश भाई जी सादर आभार सह नमन उत्साहवर्धन के लिए

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 9, 2018 at 10:06am

वाह आदरणीय सतविंद्र जी उम्दा ग़ज़ल कही..

Comment by Ajay Tiwari on November 8, 2018 at 8:35pm

आदरणीय सतविन्द्र जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई.

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 7, 2018 at 6:12pm

आदरणीय समर कबीर जी सादर वन्दे। मार्गदर्शन के लिए सादर आभार। यथोचित परिष्कार कर लिया गया है।

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 7, 2018 at 6:11pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सादर नमन! हौसलाफ़ज़ाई के लिए तहे दिल शुक्रिया

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 7, 2018 at 6:10pm

आदरणीय राज़ नदादवी जी सादर नमन, हौसलाफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on November 7, 2018 at 11:55am

// माननीय मद्दाह अपने शब्दकोश में मूल शब्द /तज्रिब:/ तज्रिबा बताते हैं व् इसका बहुवचन तज्रिबात ही लेेकीन साथ ही / तजुुर्बा या तज्रबा/ को भी //

सहीह तज्रिबा/तज्रिबात ही है ।

'इसी तकरार से अक्सर निकलती प्यार की बातें।'

"निकलतीं" ।

' नहीं अच्छी लगा करती हमेशा हार की बातें'

"करतीं" ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 7, 2018 at 10:48am

आ. भाई सतविंद्र जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by राज़ नवादवी on November 7, 2018 at 10:32am

आदरणीय सतविंदर कुमार राणा जी, आदाब. अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ. सादर 

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