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पीला माहताब ...

ठहरो न !

बस
इक लम्हा
रुक जाओ

मेरे शानों पे
जरा झुक जाओ

मेरे अहसासों की गठरी को
जरा खोलकर देखो
जज्बातों के ज़जीरों पे
हम दोनों की सांसें
किस क़दर
इक दूसरे में समाई हैं
मेरे नाज़ार जिस्म के
हर मोड़ पर
तुम्हारी पोरों के लम्स
मुझे
तुम्हारे और करीब ले आते हैं
थमती साँसों में भी
मैं तुम्हारी नज़रों की नमी से
नम हुई जाती हूँ
देखो
वो अर्श के माहताब को
हिज़्र में चांदनी के
शायद पीला हो गया है
मगर
मेरे फ़ना होने के बाद भी
तुम्हारी उल्फ़त
तुम्हारे इस माहताब को
कभी
अपने ज़हन में
पीला
न होने देगी

(नाज़ार=कमजोर)

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on November 15, 2017 at 4:47pm

आदरणीय सुरेन्दर नाथ सिंह जी प्रस्तुति आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on November 15, 2017 at 4:47pm

आदरणीय विजय निकोर साहिब, सादर प्रणाम ... प्रस्तुति के भावों को अपनी मनोहारी प्रतिक्रिया से मान देने का दिल से आभार।

Comment by नाथ सोनांचली on November 15, 2017 at 1:55pm
आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन, हर बार की तरहः बेहद उम्दा सृजन, पढ़ते पढ़ते पाठक खो जाता है, और आँखो के सामने एक बिम्ब बन जाता है आपकी अतुकांत रचनाओं में, हार्दिक बधाई स्वीकार करें। सादर
Comment by vijay nikore on November 14, 2017 at 7:04pm

//थमती साँसों में भी 
मैं तुम्हारी नज़रों की नमी से 
नम हुई जाती हूँ //.................  वाह, वाह, वाह!

सदैव समान आपने एक और सुन्दर रचना प्रस्तुत की है। हार्दिक बधाई, आदरणीय सुशील जी।

Comment by Sushil Sarna on November 13, 2017 at 8:25pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सृजन आपकी मनोहारी प्रतिक्रिया एवं सुझाव का दिल से आभारी है।

Comment by Sushil Sarna on November 13, 2017 at 8:25pm

आदरणीय डॉ आशुतोष जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार। 

Comment by Sushil Sarna on November 13, 2017 at 8:25pm

आदरणीय बृजेश जी सृजन को आत्मीय स्नेह देने का दिल से आभार।

Comment by Samar kabeer on November 13, 2017 at 3:13pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
'ज़जीरों' को "जज़ीरों" कर लें ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 13, 2017 at 2:50pm

आदरणीय सुशील जी प्रेम की शानदार अभिव्यक्ति करती इस शसक्त रचना पर हार्दिक बधाई सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 12, 2017 at 11:03pm
एक और बेहतरीन कविता आपकी समर्थ लेखनी से आदरणीय हार्दिक बधाई

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