दोहा सप्तक. . . . विरह शृंगार
दृगजल से लोचन भरे, व्यथित हृदय उद्गार ।
बाट जोहते दिन कटा, रैन लगे अंगार ।।
तन में धड़कन प्रेम की, नैनन बरसे नीर ।
बैरी मन को दे गया, अनबोली वह पीर ।।
जग क्या जाने प्रेम के, कितने गहरे घाव ।
अंतस की हर पीर को, जीवित करते स्राव ।।
विरही मन में मीत की, हरदम आती याद ।
हर करवट पर मीत से, मन करता संवाद ।।
बैठ अनमनी द्वार पर, विरहन देखे राह ।
मन में उठती हूक सी , पिया मिलन की चाह ।
नैन पिया की याद…
ContinueAdded by Sushil Sarna on March 20, 2025 at 8:48pm — No Comments
दोहा पंचक. . . . . होली
अलहड़ यौवन रंग में, ऐसा डूबा आज ।
मनचलों की टोलियाँ, खूब करें आवाज ।।
हमजोली के संग में, खेले सजनी रंग ।
चुपके-चुपके चल रहा, यौवन का हुड़दंग ।।
पिचकारी की धार से, ऐसे बरसे रंग ।
जीजा की गुस्ताखियाँ, देख हुए सब दंग ।।
कंचन काया का किया, पति ने ऐसा हाल ।
अंग- अंग रंग में ढला, यौवन लगे कमाल ।।
पारदर्शिता देख कर, दिलवाले हैरान ।
पिचकारी के रंग से , डोल उठा ईमान ।।
सुशील सरना / 13-3-25
मौलिक एवं…
ContinueAdded by Sushil Sarna on March 13, 2025 at 8:44pm — No Comments
दोहा सप्तक. . . . . रिश्ते
तार- तार रिश्ते हुए, मैला हुआ अबीर ।
प्रेम शब्द को ढूँढता, दर -दर एक फकीर ।1।
सपने टूटें आस के , खंडित हो विश्वास ।
मुरझाते रिश्ते वहाँ, जहाँ स्वार्थ का वास ।2।
देख रहा संसार में, अकस्मात अवसान ।
फिर भी बन्दा जोड़ता, विपुल व्यर्थ सामान ।3।
ऐसे टूटें आजकल, रिश्ते जैसे काँच ।
पहले जैसे प्रेम की, नहीं रही अब आँच ।4।
रिश्तों के माधुर्य में, झूठी हुई मिठास ।
मन से तो सब दूर हैं , तन से चाहे पास…
Added by Sushil Sarna on March 3, 2025 at 4:32pm — No Comments
दोहा पंचक. . . . . उमर
बहुत छुपाया हो गई, व्यक्त उमर की पीर ।
झुर्री में रुक- रुक चला, व्यथित नयन का नीर ।।
साथ उमर के काल का, साया चलता साथ ।
अकस्मात ही छोड़ती, साँस देह का हाथ ।।
बैठे-बैठे सोचती, उमर पुरातन काल ।
शैशव यौवन सब गया, बदली जीवन चाल ।।
दौड़ी जाती जिंदगी, ओझल है ठहराव ।
यादें बीती उम्र की, आँखों में दें स्राव ।।
साथ उमर के हो गए, क्षीण सभी संबंध ।
विचलित करती है बहुत, बीते युग की गंध ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 28, 2025 at 6:02pm — No Comments
कुंडलिया. . . .
जीना है तो सीख ले ,विष पीने का ढंग ।
बड़े कसैले प्रीति के,अब लगते हैं रंग ।।
अब लगते हैं रंग , जगत् में छलिया सारे ।
पल - पल बदलें रूप, स्वयं का साँझ सकारे ।।
बड़ा कठिन है सोम, भरोसे का यों पीना ।
विष को जीवन मान , पड़ेगा यों ही जीना ।।
सुशील सरना / 27-2-25
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on February 27, 2025 at 8:52pm — No Comments
दोहा पंचक. . . . नवयुग
प्रीति दुर्ग में वासना, फैलाती दुर्गन्ध ।
चूनर उतरी लाज की, बंध हुए निर्बंध ।।
पानी सूखा आँख का, न्यून हुए परिधान ।
बेशर्मी हावी हुई, भूले देना मान ।।
सार्वजनिक अश्लीलता, फैली पैर पसार ।
पश्चिम की यह सभ्यता, लील रही संस्कार ।।
पश्चिम के परिधान का, फैला ऐसा रोग ।
नवयुग ने बस प्यार को, समझा केवल भोग ।।
अवनत जीवन के हुए, पावन सब प्रतिमान ।
भोग पिपासा आज के, नवयुग की पहचान ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 21, 2025 at 8:29pm — No Comments
दोहा सप्तक. . . . . . अभिसार
पलक झपकते हो गया, निष्ठुर मौन प्रभात ।
करनी थी उनसे अभी, पागल दिल की बात ।।
विभावरी ढलने लगी, बढ़े मिलन के ज्वार ।
मौन चाँद तकने लगा, लाज भरे अभिसार ।।
लगा लीलने मौन को, दो साँसों का शोर ।
रही तिमिर में रेंगती, हौले-हौले भोर ।।
अद्भुत होता प्यार का, अनबोला संवाद ।
अभिसारों में करवटें, लेता फिर उन्माद ।।
प्रतिबंधों की तोड़ता, साँकल मौन प्रभात ।
रुखसारों पर लाज की, रह जाती सौगात ।।
कुसुमित मन…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 17, 2025 at 3:58pm — No Comments
दोहा दशम - ..... उल्फत
अश्कों से जब धो लिए, हमने दिल के दाग ।
तारीकी में जल उठे, बुझते हुए चिराग ।।
ख्वाब अधूरे कह गए, उल्फत के सब राज ।
अनसुनी वो कर गए, इस दिल की आवाज ।।
आँसू, आहें, हिचकियाँ, उल्फत के ईनाम ।
नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।
माना उनकी बात का, दिल को नहीं यकीन ।
आयें अगर न ख्वाब है, उल्फत की तौहीन ।।
यादों से हों यारियाँ , तनहाई से प्यार ।
उल्फत का अंजाम बस , इतना सा है यार ।।
मिला इश्क को हुस्न से,…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 10, 2025 at 1:04pm — 2 Comments
दोहा पंचक. . . . . शृंगार
रैन स्वप्न की उर्वशी, मौन प्रणय की प्यास ।
नैन ढूँढते नैन में, तृषित हृदय मधुमास ।।
वातायन की ओट से, हुए नैन संवाद ।
अरुणिम नजरों में हुए, लक्षित फिर उन्माद ।
मृग शावक सी चाल है, अरुणोदय से गाल ।
सर्वोत्तम यह सृष्टि की, रचना बड़ी कमाल ।।
गौर वर्ण झीने वसन, मादकता भरपूर ।
जैसे हो यह सृष्टि का, अलबेला दस्तूर ।।
जब-जब दमके दामिनी, उठे मिलन की प्यास।
अन्तस में व्याकुल रहा, बांहों का मधुमास…
Added by Sushil Sarna on February 4, 2025 at 9:56pm — No Comments
कुंडलिया. . .
मन से मन का हो गया, मन ही मन अभिसार ।
मन में मन के प्रेम का, सृजित हुआ संसार ।
सृजित हुआ संसार , हाथ की चूड़ी खनकी ।
मुखर हुआ शृंगार , बात फिर निकली मन की ।
बंध हुए निर्बंध ,भाव सब निकले तन से ।
मन ने दी सौगात , प्रीति को सच्चे मन से ।
सुशील सरना / 2-2-25
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on February 2, 2025 at 5:05pm — No Comments
दोहा पंचक. . . . संबंध
अर्थ लोभ की रार में, मिटा खून का प्यार ।
रिश्ते सब आहत हुए, शेष रही तकरार ।।
वाणी कर्कश हो गई, मिटी नैन से लाज ।
संबंधों में स्वार्थ की, मुखर हुई आवाज ।।
प्यार मिटा पैदा हुई, रिश्तों में तकरार ।
फीके - फीके हो गए, जीवन के त्योहार ।।
दिखने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।
वक्त पड़े तो छोड़ता, खून, खून का हाथ ।।
आपस में ऐसे मिलें, जैसे हों मजबूर ।
निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।…
Added by Sushil Sarna on February 1, 2025 at 2:24pm — No Comments
दोहा सप्तक. . . धर्म
धर्म बताता जीव को, पाप- पुण्य का भेद ।
कैसे जीना चाहिए, हमें सिखाते वेद ।।
दया धर्म का मूल है, यही सत्य अभिलेख ।
करे अनुसरण जीव जो, बदले जीवन रेख ।।
सदकर्मों से है भरा, हर मजहब का ज्ञान।
चलता जो इस राह पर, वो पाता पहचान ।।
पंथ हमें संसार में, सिखलाते यह मर्म ।
जीवन में इन्सानियत, सबसे उत्तम कर्म ।।
चलते जो संसार में, सदा धर्म की राह ।
नहीं निकलती कष्ट में, उनके मुख…
Added by Sushil Sarna on January 18, 2025 at 1:00pm — 2 Comments
दोहा सप्तक. . . जीत -हार
माना जीवन को नहीं, अच्छी लगती हार ।
संग जीत के हार से, जीवन का शृंगार ।।
हार सदा ही जीत का, करती मार्ग प्रशस्त ।
डरा हार से जो हुआ, उसका सूरज अस्त ।।
जीत हार के राग में, उलझा जीवन गीत ।
दूर -दूर तक जिंदगी, ढूँढे सच्चा मीत ।।
कभी हार है जिंदगी, कभी जिंदगी जीत ।
जीवन भर होता ध्वनित, इसमें गूँथा गीत ।।
मतलब होता हार का, फिर से एक प्रयास ।
हर कोशिश में जीत की,…
Added by Sushil Sarna on January 16, 2025 at 3:00pm — 2 Comments
शर्मिन्दगी ....
"मैने कहा, सुनती हो ।"रामधन ने अपनी पत्नी को आवाज देते हुए कहा ।
"क्या हुआ, कुछ कहो तो सही ।"
"अरे होना क्या है । अपने पड़ोसी रावत जी की बेटी संजना ने अपने ब्वाय फ्रेंड के साथ भाग कर कोर्ट मैरिज करके इस उम्र में अपने माँ-बाप को शर्मसार कर दिया ।बेचारे! अच्छा हुआ, अपनी कोई बेटी नही केवल एक बेटा राहुल है ।" रामधन ने कहा।
इतने में डोर बेल बजी टननन ।
"कौन? " रामधन जी दरवाजे खोलते हुए बोले ।
" रामधन जी, अपने संस्कारवान बेटे को…
ContinueAdded by Sushil Sarna on January 15, 2025 at 1:12pm — 6 Comments
दोहा सप्तक . . . . पतंग
आवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग ।
बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।।
बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।
आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।
कभी उलझ कर लाल से, लेती वो प्रतिशोध ।
डोर- डोर की रार का, मन्द न होता क्रोध ।।
नीले अम्बर में सजे, हर मजहब के रंग ।
जात- पात को भूलकर, अम्बर उड़े पतंग ।।
जैसे ही आकाश में, कोई कटे पतंग ।
उसे लूटने के लिए, आते कई दबंग…
Added by Sushil Sarna on January 14, 2025 at 8:30pm — 2 Comments
दोहा पंचक. . . . जीवन
पीपल बूढ़ा हो गया, झड़े पीत सब पात ।
अपनों से मिलने लगे, घाव हीन आघात ।।
ठहरी- ठहरी जिन्दगी, देखे बीते मोड़ ।
टीस छलकती आँख से,पल जो आए छोड़ ।।
विचलित करता है सदा, सुख का बीता काल ।
टूटे से जुड़ती नहीं, कभी वृक्ष से डाल ।।
अपने ही देने लगे, अब अपनों को मात ।
मिलती है संसार में, आँसू की सौग़ात ।।
पल - पल ढलती जिंदगी, ढूँढे अपना छोर ।
क्या जाने किस साँस की, अन्तिम होगी भोर ।।
सुशील सरना / 3-1-25
मौलिक एवं…
ContinueAdded by Sushil Sarna on January 3, 2025 at 8:30pm — No Comments
दोहा पंचक. . . संघर्ष
आज पुराना हो गया, कल का नूतन वर्ष ।
फिर रोटी के चक्र में, डूबा सारा हर्ष ।।
नया पुराना एक सा, निर्धन का हर वर्ष ।
उसके माथे तो लिखा, रोटी का संघर्ष ।।
ढल जाता है साँझ को, भोर जनित उत्साह ।
लेकिन रहती एक सी, दो रोटी की चाह ।।
किसने जाना काल का, कल क्या होगा रूप ।
सुख की होगी छाँव या, दुख की होगी धूप ।।
चार घड़ी का हर्ष फिर , बीता नूतन वर्ष ।
अविरल चलता है मगर, जीवन का संघर्ष ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on January 2, 2025 at 2:52pm — No Comments
दोहा पंचक. . . रोटी
सूझ-बूझ ईमान सब, कहने की है बात ।
क्षुधित उदर के सामने , फीके सब जज्बात ।।
मुफलिस को हरदम लगे, लम्बी भूखी रात ।
रोटी हो जो सामने, लगता मधुर प्रभात ।।
जब तक तन में साँस है, चले क्षुधा से जंग ।
बिन रोटी फीके लगें, जीवन के सब रंग ।।
मान-प्रतिष्ठा से बड़ी, उदर क्षुधा की बात ।
रोटी के मोहताज हैं, जीवन के हालात ।।
स्वप्न देखता रात -दिन, रोटी के ही दीन ।
इसी जुगत में दीन यह , हरदम रहता लीन…
Added by Sushil Sarna on December 25, 2024 at 2:37pm — 2 Comments
दोहा पंचक. . .
बाण न आये लौट कर, लौटें कभी न प्राण ।
काल गर्भ में है छुपा, साँसों का निर्वाण ।।
नफरत पीड़ा दायिनी, बैर भाव का मूल ।
जीना चाहो चैन से, नष्ट करो यह शूल ।।
आभासी संसार में, दौलत बड़ी महान ।
हर कीमत पर बेचता , बन्दा अब ईमान ।।
अन्तर्घट के तीर पर, सुख - दुख करते वास ।
सूक्ष्म सत्य है देह में, वाह्य जगत आभास ।।
जीवन मे होता नहीं, जीव कभी संतुष्ट ।
सब कुछ पा कर भी सदा, रहे ईश से रुष्ट ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on December 23, 2024 at 2:42pm — 2 Comments
दोहा पंचक. . . व्यवहार
हमदर्दी तो आजकल, भूल गया इंसान ।
शून्य भाव के खोल में, सिमटा है नादान ।।
मुँह बोली संवेदना, मुँह बोला व्यवहार ।
मुँह बोले संसार में, मुँह बोला है प्यार ।।
भूले से तकरार में, करो न ऐसी बात ।
जीवन भर देती रहे, वही बात आघात ।।
अन्तस में कुछ और है, बाहर है कुछ और ।
उलझन में यह जिंदगी, कहाँ सत्य का ठौर ।।
दो मुख का यह आदमी, क्या इसका विश्वास ।
इसके अंतर में सदा, छल करता है वास ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on December 21, 2024 at 3:36pm — No Comments
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