For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम / ग़ज़ल "संदीप पटेल "दीप"

रस्म वाले देश की औलाद हैं हम
आज के बच्चे कहें सैयाद हैं हम

उनकी बीबी मायके जब से गयी है  
कहते फिरते आजकल आज़ाद हैं हम

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम

छोड़ के वो हाथ मेरा जो चले थे
गमजदा हैं देख ये आबाद हैं हम

"दीप" हरदम की मदद है दूसरों की
इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 711

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on December 8, 2013 at 12:43am

बहुत बढिया.. !

शेर दर शेर कहन हामी लेता हुआ है. बधाई ! बधाई !!

ग़ज़ल के अश’आर के बीच में ही पुछल्ला भी आ गया है .. . :-))))शुभ-शुभ

Comment by Dr Ashutosh Mishra on December 4, 2013 at 6:39am

"

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम

दीप" हरदम की मदद है दूसरों की 
इसलिए तो आज भी बर्बाद हैं हम....बेहतरीन ग़ज़ल के ये शेर मुझे बेहद पसंद आये ..सब कंगूरे की ईंट बनना चाहते है  लेकिन नीव अगर हिल जाए तो सबको समझ में आ जाईगी ......सच है लोगों के सुख दुःख में खड़े होकर हम आज की तथाकथित सफलता से कोसों दूर हो गए ....लाजबाब ग़ज़ल ..ढेरों बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 4, 2013 at 12:02am

आदरणीय संदीप जी बेहतरीन ग़ज़ल है गंभीर अशआर के बीच एक मज़ाकिया शेर भी गुदगुदा गया बधाई स्वीकार करें

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 3, 2013 at 11:01pm

अच्छी गज़ल हुई, बधाई संदीप भाई । 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 3, 2013 at 3:46pm

पटेल जी

क्या बात है  ? बहुत अच्छी  लगी i

आपको धन्यवाद i

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 3, 2013 at 12:29pm


छोड़ के वो हाथ मेरा जो चले थे
गमजदा हैं देख ये आबाद हैं हम .

   

बहुत खूब कहा 

Comment by वीनस केसरी on December 3, 2013 at 2:26am

ढँक गए हैं गर्द से तो भूलिए मत
इस महल की रीढ़ हैं बुनियाद हैं हम

वाह वा भाई जी अच्छी ग़ज़ल कही है

Comment by ram shiromani pathak on December 3, 2013 at 12:15am

 सुन्दर  ग़ज़ल बहुत बधाई आदरणीय संदीप भाई  जी  … सादर 

Comment by Sarita Bhatia on December 2, 2013 at 8:06pm

बहुत अच्छे 

Comment by विजय मिश्र on December 2, 2013 at 5:42pm
खूब

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" सादर नमस्कार आदरणीय मंच। कुछ अन्य सुझाव: 1- सदस्यों से सहयोग राशि एकत्रित कर ओबीओ की पत्रिका…"
Monday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अच्छा सुझाव"
Sunday
Gajendra shrotriya replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रतिष्ठित मंच के सभी सम्माननीय सदस्यों को सादर प्रणाम🙏ओ बी ओ परिवार के समक्ष बनी इस विषम परिस्थिति…"
Sunday
Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
Saturday
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
Saturday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)

बह्र: 22 22 22 22 22 2 रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिएजंगल का कानून है पहला, चुप रहिएमँहगाई से…See More
Saturday
रोहित डोबरियाल "मल्हार" posted a blog post

दास्तां

एक हो दास्तां तो सुनाएं,लंबी है कहानी, फिर कभी।मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,वो धुंधली सी निशानी,…See More
Saturday
Awanish Dhar Dvivedi posted a blog post

समय

समय को दोष देना क्यूँ समय जीना सिखाता है समय की गति सुनिश्चित है समय ही तो विधाता है।। समय का खेल…See More
Saturday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सौरभ जी"
Saturday
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"उम्मीद है कि इस पटल से संबंधित कोई अच्छी खबर आएगी।"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
"इस सुंदर बुनावट और कहन पर आज नजर पड़ी, आदरणीय धर्मेन्द्र जी.  हार्दिक बधाई   "
May 25

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service