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मौत के साथ आशिकी होगी (अरुन 'अनन्त')

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
2122 1212 22

मौत के साथ आशिकी होगी,
अब मुकम्मल ये जिंदगी होगी,

उम्र का ये पड़ाव अंतिम है,
सांस कोई भी आखिरी होगी,

आज छोड़ेगा दर्द भी दामन,
आज हासिल मुझे ख़ुशी होगी,

नीर नैनों में मत खुदा देना,
सब्र होगा अगर हँसी होगी,

आखिरी वक्त है अमावस का,
कल से हर रात चाँदनी होगी.

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by अरुन 'अनन्त' on December 25, 2013 at 12:30pm — 25 Comments

चुपके से

कल तक थी जाने कहाँ

आज आ रही है पास वो

देख नहीं पाये जो

जीवन के रंगों को

ले रही उन्‍हें भी

अपने आगेाश में वो

ना सुना नाम कभी

ना जाना पहचान ही

चुपके से चली आयी वो

तोड़ने उनकी सॉसे को

इल्‍जाम कभी लेती नहीं

अपने दामन पर वो कभी

है इल्‍जाम उनहीं पे

खत्‍म करती जिसका

जीवन वो

जीवन में नहीं रंग उतने

नाम उनका उतना हैं

आ जाती है चुपके से वो

जाने कब जीवन…

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Added by Akhand Gahmari on December 25, 2013 at 11:00am — 14 Comments

"अश्क गजलों से भी तो झरते हैं"

प्यार जिससे भी आप करते है
जिसकी खातिर सदा संवरते हैं

ख़्वाब में सामने भी आये तो
कुछ भी कहने में आप डरते हैं

जितना ज्यादा हैं सोचते उनको
वैसे वैसे ही वो निखरते हैं

इस सियासत के दांव पेंचों में
कितने मासूम हैं जो मरते हैं

आशिकी का यही उसूल रहा,
करती नजरें है आप भरते हैं

आँख रोने को जरूरी तो नही
अश्क गजलों से भी तो झरते हैं

अनुराग सिंह "ऋषी"

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Anurag Singh "rishi" on December 25, 2013 at 9:38am — 9 Comments

गरीब का पेट ( अतुकांत )

गरीब का पेट



बड़ा जालिम होता है

गरीब का पेट

नहीं देता देखने

सुन्दर-सुन्दर सपने

गरीबी के दिनों में

छीन लेता है वह

सपना देखने का हक

जब कभी

देखना चाहती है आंख

सुंदर सा सपना

मागने लगता है पेट

एक अदद सूखी रोटी

आंख ढूंढ ने लगती है तब

इधर उधर बिखरी जूठन

और फैल जाते हैं हाथ

मागने को निवाला

गरीबी के दिनों में

दूसरों के सम्मुख फैले हुए हाथ

सपना देखती आंख के

मददगार नहीं होते…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 25, 2013 at 6:30am — 10 Comments

यह मोरपंखी मन !

यह मोरपंखी मन !

न जाने क्यूँ प्रिये पागल –

हुआ जाता तुम्हारी याद मे यह मोरपंखी मन !

पहाड़ों पर कभी भटके

ढलानों पर कभी घूमे

कभी यह चीड़ के वन से –

घटाओं को बढ़े चूमे ।

यहाँ ठंडी हवाओं मे बढा जाता बहुत सिहरन

न जाने क्यूँ प्रिये पागल अरे यह मोरपंखी मन !

नदी , निर्झर , पहाड़ों पर

भ्रमण करता हुआ जाता

फिज़ाओं मे भटकना अब प्रिये !

पलभर नहीं भाता ।

तुम्हारे बिन हुआ जाता बड़ा सूना मेरा उपवन -

न जाने क्यूँ प्रिये ! पागल अरे यह…

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Added by S. C. Brahmachari on December 24, 2013 at 6:57pm — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पोता (लघुकथा )

“एक पोता भी  नही दे सकी कलमुंही”  वार्ड में सास की आवाज़ गूँजी,

इतने में अंदर आते हुये डॉक्टर ने जब ये सुना तो कहा- “पति के शरीर में एक्स- वाई(X-Y) क्रोमोसोम्स होते हैं, पत्नि के शरीर में एक्स-एक्स(X-X) क्रोमोसोम्स होते हैं, पति का वाई(Y) क्रोमोसोम पत्नि के एक्स(X) क्रोमोसोम से मिलता है तो बेटा होता है, पति का एक्स(X) क्रोमोसोम पत्नि के एक्स(X) क्रोमोसोम से मिलता है तो बेटी होती है l

पता नही आपके क्या समझ में आया?  लेकिन इतना सच जान लीजिये आपको पोता नही मिला उसका पूरा…

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Added by शिज्जु "शकूर" on December 24, 2013 at 10:30am — 38 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : चलन (गणेश जी बागी)

स्कूल के कुछ दोस्त मिलकर घर में पड़े पुराने कम्बल गरीबों में बाँटने को निकले। कम्बल बाँट कर वे ज्यों ही वापस चलने को हुए, एक बुजुर्ग ने आवाज़ लगाई ………

"बबुआ जी तनिक सुनो"

"जी बाबा, आपको तो कम्बल दे दिया न ?"

"जी बबुआ जी, कम्बल तो दिया और फिर आप लोग ऐसे ही चल दिए"

"ऐसे ही चल दिए मतलब ?"

"बबुआ जी, पिछले तीन दिन से चमचमाती गाड़ियों में साहब लोग आते हैं, कम्बल बाँट कर फ़ोटो खिचवाते हैं और फिर २०-२० रूपया…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 23, 2013 at 8:39pm — 46 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
"दाग" अतुकांत ( गिरिराज भंडारी )

“दाग“ 

********

मूर्खता है ,

होली में रंगे कपड़ों से

दाग छुड़ाने की कोशिश ।

कोई कहता भी नहीं उसे

दाग दार ।

वो अलग हैं , दागियों…

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Added by गिरिराज भंडारी on December 23, 2013 at 7:30pm — 33 Comments

अश्क का दरिया भी रुख पे आ गया

अब्रे गम जब दिल पे मेरे छा गया

अश्क का दरिया भी रुख पे आ गया

आइना देखा है जब भी दोस्तों

सामने मेरे मेरा सच  आ गया

यूं तो गुल लाखों थे बगिया में मगर

दिल को लेकिन कोई कांटा  भा गया

वो हसीं गुल आने वाला है इधर

चूम झोंका खुशबू का बतला गया

हाल उनसे कहते दिल का जब तलक

यार नजरों से ही सब जतला गया

जिसने भर दी खार से ये जिन्दगी

फूल नकली दे के फिर बहला…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on December 23, 2013 at 7:30pm — 18 Comments

लाड़ली चली.. (अन्नपूर्णा बाजपेई)

बाबा की दहलीज लांघ चली

वो पिया के गाँव चली

बचपन बीता माँ के आंचल

सुनहरे दिन पिता का आँगन

छूटे संगी सहेली बहना भैया

मिले दुलारी को अब सईंया

मीत चुनरिया ओढ़ चली  

बाबा की ................

माँ की सीख पिता की शिक्षा

दुलार भैया का भाभी की दीक्षा

सखियों का स्नेह लाड़ बहना का

वो रूठना मनाना खेल बचपन का

भूल सब मुंह मोड चली

वो पिया के ...............

परब त्योहार हमको  बुलाना

कभी तुम न मुझको…

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Added by annapurna bajpai on December 23, 2013 at 5:30pm — 32 Comments

आजादी आखिर कितनी ?

स्त्री को आजादी वैदिक काल से ही मिली हुई है फर्क सिर्फ इतना है कि आज उस आजादी में कुछ निजी स्वार्थ समा गया है | वर्षों पहले से स्त्री को हर तरह की आजादी मिली हुई है अपने मन मुताबिक़ कपड़े पहनने की आजादी.अपने मन मुताबिक़ पति चुनने की आजादी,अपने मर्जी से शिक्षा क्षेत्र चुनने की आजादी यहाँ तक कि वो रण क्षेत्र में भी अपनी मर्जी से जाती थी | उन्हें कोई रोक-टोक नही थी इसके बावजूद वो अपनी पारिवारिक जिम्मदारियां भी बखूबी निभाती थीं और अपने पति के पीछे उनकी प्रेरणा बन के खड़ी रहती थी तो आज ऐसा क्यों नही…

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Added by Meena Pathak on December 23, 2013 at 2:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बहर-।ऽऽ ।ऽऽ ।ऽऽ ।ऽऽ

...

कभी चाँदनी छूने आया करेगी।

सितारों की ज़ीनत बुलाया करेगी॥

...

बदन की मुलायम तहों में समेटे,

नदी पत्थरों को सुलाया करेगी।

...

भटकता फिरेगा कहीं पे अँधेरा,

कहीं रोशनी गीत गाया करेगी।

...

परिंदों की परवाज़ क्या खूब होगी,

हवा जब उन्हें आज़माया करेगी।

...

नई चूड़ियों से खनकती कलाई,

सवेरे-सवेरे जगाया करेगी।

...

ज़रा सी किसी बात पे रो पड़ूँगा,

कभी ज़िंदगानी हँसाया करेगी।

...

कहूँगा…

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Added by Ravi Prakash on December 23, 2013 at 1:00pm — 26 Comments

वही मै दे पाया ! … नवगीत !

वही मै दे पाया !   … नवगीत !
----------------------------------
जो था मेरे पास 
वही मै दे पाया…
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Added by AVINASH S BAGDE on December 23, 2013 at 11:31am — 30 Comments

ये दुनिया धर्मशाला है (ग़ज़ल )

हैं  कपड़े  साफ  सुथरे  से , पड़ा  काँधे  दुशाला  है

शहर  में भेडि़यों  ने आ, बदल  अब  रूप  डाला है



कहानी  रोज  पापों की, उघड़  कर  सामने  आती

किसी ने  झूठ  बोला था, ये  दुनिया  धर्मशाला है



समझ के आम जैसे ही, आमजन चूसे जाते नित

बनी ये सियासत अब, महज भ्रष्टों  की  खाला है



मथोगे गर मिलेगा नित, यहाँ अमृत भी पीने को

है सिन्धु सम जीवन, कहो मत विष का प्याला है

किया सुबह  शाम झगड़ा , रखी वाणी  में दुत्कारें

'मुसाफिर'…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 23, 2013 at 7:30am — 13 Comments

शुभारंभ है नए साल का//नवगीत//कल्पना रामानी

फिर से नई कोपलें फूटीं,

खिला  गाँव का बूढ़ा  बरगद।

शुभारंभ है नए साल का,

सोच, सोच है मन में गदगद।

 

आज सामने, घर की मलिका

को उसने मुस्काते देखा।

बंद खिड़कियाँ खुलीं अचानक,

चुग्गा पाकर पाखी चहका।

 

खिसियाकर चुपचाप हो गया,

कोहरा जाने कहाँ नदारद।

  

खबर सुनी है,फिर अपनों के

उस  देहरी पर कदम पड़ेंगे।

नन्हीं सी मुस्कानों के भी,

कोने कोने बोल घुलेंगे।

 

स्वागत करने डटे…

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Added by कल्पना रामानी on December 22, 2013 at 10:00am — 31 Comments

कुछ ऐसे पुकारा तुमने (अन्नपूर्णा बाजपेई)

कुछ इस तरह पुकारा तुमने

कदम भी मेरे लगे बहकने 

कुछ इस .........

दामिनी दमक उठी नैनो मे

सरगम छनक उठी साँसों मे

हृद वीणा सी  झंकृत कर दी

जागे से लगने लगे सपने 

कुछ .......................

अन्तर्भावों की सुरवलियों मे

उद्गारों की हारावलियों मे

शब्द सुशोभित सज्जित कर दी

मन-कानन सब लगे महकने 

कुछ .....................

अप्रकाशित एवं…

Continue

Added by annapurna bajpai on December 21, 2013 at 9:00pm — 22 Comments

मेरे ख्वाब ....

जाओ तुम और दूर चले जाओ... 

जहां चाहो वहाँ चले जाओ 

मगर जी लो न मन भर 

एक बार मेरे साथ ....

मेरे ख्वाब...  मेरे ख्वाब ... मेरे ख्वाब ....

धीरे से जाना ... 

आहट भी न करना 

नींद न टूटने पाये मेरी 

काँच से नाजुक हैं ये ... 

मेरे ख्वाब .... मेरे ख्वाब ... मेरे ख्वाब .... 

कुछ तुम भी ले जाना 

बहुत हसीन हैं ये 

दुःख में हँसा देंगे ये 

मुझसे भी प्यारे हैं ये ...

मेरे ख्वाब .... मेरे ख्वाब .... मेरे…

Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on December 21, 2013 at 8:25pm — 8 Comments

दो अक्षरो का *शक'

दो हमसफर

एक छत

रहे अजनबी की तरह

लब खुले तो टकरार

ना साँसे टकराती

ना बिन्‍दीयाँ भाती

ना विदाई

ना स्‍वागत

नजर चुराते

बीती राते

कभी

तन मन साथ

हँसी उमंग चाहत प्‍यार

लगी नजर

बने नदी के

दो किनारे

बीच में

शक

केवल शक

बाँट दिया प्‍यार

एक ना सुनते

एक दूजे की बाते

स्‍वाभिमान

विद्रोह

गुस्‍से की

ज्‍वाला जला रही

प्‍यार…

Continue

Added by Akhand Gahmari on December 21, 2013 at 7:55pm — 12 Comments

नवगीत -- सियासती दावत

नूतन वर्ष में
नये -पुराने ,सपने
सियासती दावत में
फिर परसे जायेंगे  .
 
वह मन को भरमायेंगे
अतीत भुलायेंगे

नये कपडे ,पुराने
तन को पहनाएंगे
 
शक्कर में पगे हुये
शब्द शब्द बनावटी
ललना से फिसलकर 

प्रजा लुभायेंगे 
 
विजय कुरसी मिलेगी
अधर ,मुस्कान खिलेगी 
सिर पर नेताओं के 
श्वेत कलगी…
Continue

Added by shashi purwar on December 21, 2013 at 2:00pm — 15 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
नवगीत - नये साल की धूप // --सौरभ



आँखों के गमलों में

गेंदे आने को हैं

नये साल की धूप तनिक

तुम लेते आना.. .



ये आये तब

प्रीत पलों में जब करवट है

धुआँ भरा है अहसासों में

गुम आहट है

फिर भी देखो

एक झिझकती कोशिश तो की !

भले अधिक मत खुलना

तुम, पर

कुछ सुन जाना.. .

नये साल की धूप तनिक

तुम लेते आना.. .



संवादों में--

यहाँ-वहाँ की, मौसम, नारे..

निभते हैं

टेबुल-मैनर में रिश्ते…
Continue

Added by Saurabh Pandey on December 20, 2013 at 11:30pm — 58 Comments

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