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धनाक्षरी

भोर को निशा बना दे, अंधकार ही घना दे।
हो सके तो श्वांस ना दे, आदमी को आदमी।

लोभ के गुणों को जापे, हर्ष के लिए विलापे।
स्वार्थ में कठोर शापे, आदमी को आदमी।

भाग में रहा बदा है, जोड़ता यदा कदा है।
बांटता चला  सदा है, आदमी को आदमी।

शर्म ही बचा सकेगा, धर्म ही उठा सकेगा।
कर्म ही बना सकेगा, आदमी को आदमी।

_____मौलिक/अप्रकाशित______

Added by Sanjay Mishra 'Habib' on December 18, 2013 at 6:39pm — 10 Comments


प्रधान संपादक
मुख्यधारा (लघुकथा)

एक रात अचानक पुलिस वाले उसे उग्रवादी बता कर घर से उठा कर ले गए. क्या क्या ज़ुल्म नहीं किये गए थे उस पर. वह चीख चीख कर खुद को बेनुगाह बताता रहा लेकिन सब कुछ सुनते हुए भी सरकारी जल्लाद बहरे बने रहे. यातनाएं सहते सहते तक़रीबन छह महीने बीत गए थे. तभी एक दिन सरकार ने अपनी नई नीति के अनुसार उसे रिहा कर दिया ताकि वह भी राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल हो सके. उसके वापिस लौटने से घर में ख़ुशी का वातावरण था, लेकिन वह जड़वत बैठा न जाने कहाँ खोया रहता. वृद्ध पिता ने एक दिन उसके कंधे पर हाथ रखकर…

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Added by योगराज प्रभाकर on December 18, 2013 at 3:00pm — 38 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
रात (अतुकांत)

दिन भर के सफर का

थका हुआ सूरज, मानो..

ज़मीं की सेज़ पर,

लहरों के झूले में,

चाँदनी की चादर ओढ़े

सबकुछ भूल के,

सोने जा रहा हो,

लहराते हुये लहरो में,

मानो,

कह रहा है

मेरे दोस्तो

विदा, फिर मिलेंगे सुबह...

मैं चला

 

होती है रात विश्राम को,

थकान मिटाने को,

चलें सफर में

रात के साथ...

पिछला ग़म भुलाने को

चलो

सुबह एक नई शुरूआत करेंगे

 

 -मौलिक व…

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Added by शिज्जु "शकूर" on December 18, 2013 at 10:30am — 17 Comments

गजल-खोलकर खिडकी तेरा अहसास करती हूँ--उमेश कटारा

वो तेरे नखरे तुझे कुछ खास करते हैं

आज भी हम तो मिलन की आस करते हैं

इन हवाओं में महकती है तेरी खुशबू
खोलकर खिडकी तेरा अहसास करते हैं

बन गयी नासूर मुझको खामुशी मेरी

ये जुबां वाले मेरा उपहास करते हैं

बेवफाई कर नहीं सकता सनम मेरा
लोग यूँ ही आजकल बकवास करते हैं

कौन आगे बोलता है अब सितमगर के
बैठते हैं साथ में और लाश करते हैं

उमेश कटारा

मौलिक एंव अप्रकाशित 

Added by umesh katara on December 18, 2013 at 9:30am — 16 Comments

ग़ज़ल-- सलीम रज़ा

२२१ २१२१ १२२१ २१२

रिश्ते वफ़ा सब से निभाकर तो  देखिए 
सारे जहाँ को अपना बनाकर तो देखिए
 
इसका मिलेगे अज़्र खुदा  से  बहुत  बड़ा 
भूखे  को एक रोटी  खिलाकर तो देखिए …
Continue

Added by SALIM RAZA REWA on December 18, 2013 at 9:30am — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अतुकांत -- " कुरेदिये नही " ( गिरिराज भंडारी )

समय के ,

सूर्य के ताप से

सूखता हुआ मल,

स्वयम ही,

स्वाभाविक रूप से ,

हो जायेगा

दुर्गन्ध हीन |

और फिर

वातावरण स्वयम…

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Added by गिरिराज भंडारी on December 18, 2013 at 6:30am — 18 Comments

राउंड फिगर..( लघुकथा )

"अंकल, इस बार सामान के बिल में सौ-दो सौ रूपये जरा बढाकर लिख देना, आगे मैं समझ लूँगा"  रोहन ने दुकानदार से कहा.

"ऐसा ?.. पर बेटा, यह तो तुम्हारे घर की ही लिस्ट है न ?" दुकानदार को बहुत आश्चर्य हुआ.

"हाँ है तो. पर क्या है कि पापा आजकल पॉकेटमनी देने में बहुत आना-कानी करने लगे हैं.. " रोहन ने अपनी परेशानी बतायी.

(संशोधित)

जितेन्द्र ' गीत '

( मौलिक व् अप्रकाशित )

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on December 18, 2013 at 12:00am — 43 Comments

प्याज के पकौड़े (हास्य-व्यंग्य) // -- शुभ्रांशु पाण्डेय

वापसी में मेरे मकान के बाहर ही मुझे लालाभाई मिल गये. मेरे हाथों मे सब्जियों से भरा थैला देखते ही चौंक पड़े, "क्यों भाई, कहाँ से ये सब्जियाँ लूट कर ला रहे हो?" 

मैने उन्हें ऊपर से नीचे तक निहारा, "लूट कर.. ? खरीद के ला रहा हूँ भाई.."

मेरे कहते ही लाला भाई ने तुरंत बनावटी गंभीरता ओढ़ते हुए कहा, "हुम्म्म.. तब तो इन्कम टैक्स वालों को बताना ही पड़ेगा .. और सीबीआई वालों को भी..!  कि भाई, तुम आजकल भी सब्जियाँ झोला भर-भर के खरीद पा…

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Added by Shubhranshu Pandey on December 17, 2013 at 8:30pm — 26 Comments

प्यार अमर कर जाएगें (गीत)

खाकर इक दूजे की कसम

हम प्यार अमर कर जाएँगे

कोई रोक सके तो रोक ले हमको

हम न जुदा हो पाएँगे

हम बगिया के फूल नहीं

जो हमको कोई ऊज़ाडेगा

हम ने की नही भूल कोई

जो हम को कोई सुधारेगा

लैला मजनूं के बाद अब हम

इतिहास में नाम लिखाएगें

कोई रोक........................

पतझड़ सावन बसंत बहार

ऋीतुएँ होती हैं ये चार

एक भी मौसम नही है ऐसा

जिसमें हम कर सकें न प्यार

बुरी नज़र जो डालेगा उसका

मुह काला कर…

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Added by NEERAJ KHARE on December 17, 2013 at 7:32pm — 4 Comments

काश !!.... मीना

सोचती हूँ होती मेरी भी एक बिटिया
पढ़ती वो भी बिन कहे दिल की पतिया
भीगती जब असुअन से मेरी अखियाँ
पूछती माँ क्यूँ भीगी तेरी अखिंयाँ
बनाती बहाना चुभ गया कुछ बिटिया
कहती,समझती हूँ माँ तेरे दिल की बतियाँ !!
 

काश होती मेरी भी एक बिटिया
वो पढ़ लेती मेरे दिल की पतियाँ
होती मेरी हमसाया,हमराज,सखी
कहती ना कभी ऐसी बतियाँ
उड़ा देती जो मेरी रातों की निंदियाँ
माँ तुममे भी है कुछ कमियाँ !!

मीना पाठक 
मौलिक/अप्रकाशित 

Added by Meena Pathak on December 17, 2013 at 5:15pm — 19 Comments

धूप उतर आयी

धूप उतर आयी

झरोखे से झांक

आज़ सुबह मेरे कमरे मे

जब धूप उतर आयी

बढ़ गई थोड़ी सी

चंचल तरुणाई ।

यह धूप आज़ महंगी है, पर –

कल तक आवारा थी

शांति मुझे देती अब

गंगा की धारा सी ।

कैसे बताऊँ क्या है ?

जल्द फिसल जाती है

तन ठिठुर जाता

हर छाँव सिहर जाती है ।

अब तक अनदेखी है

तेरी गोराई !

ऐसे मे अनजानी

याद तेरी आयी ।

आज़ मेरे कमरे मे –

धीरे से

धूप उतर आयी

बढ़ गयी थोड़ी सी

चंचल तरुणाई ।

-…

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Added by S. C. Brahmachari on December 17, 2013 at 4:59pm — 15 Comments

लघुकथाः कौआ (रवि प्रभाकर)

कौआ आज फिर प्यासा था। लेकिन अब उसे हर हर रोज़ कंकड़ पत्थर इकट्ठे करते हुए बहुत कष्ट होने लगा था. वह इस रोज़ रोज़ के संघर्ष से मुक्ति चाहता था। फिर एक दिन अचानक ही उसने भगवे वस्त्र धारण कर लिए, माथे पर लंबा सा तिलक लगाया एक बड़ी सी स्टेज सजा कर ‘कांव-कांव’ करने लगा। देखते ही देखते अनगिनत लोग उसके अनुयायी बन उसकी जय जयकार करने लगे । अब वह सयाना कौआ बड़े आराम से दिन भर ‘कांव-कांव’ करता, क्योंकि उसकी ‘भूख’ व ‘प्यास’ का जीवन भर के लिए जुगाड़ हो चुका था।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Ravi Prabhakar on December 17, 2013 at 4:48pm — 12 Comments

अनंग शॆखर छन्द

अनंग शॆखर छन्द =

===============

कभी डरॆ नहीं कभी मरॆ नहीं सपूत वॊ, प्रचंड  वृष्टि बर्फ और ताप मॆं खड़ॆ रहॆ ॥

हिमाद्रि-तुंग बैठ शीत संग तंग हाल मॆं, सपूत एकता अखण्डता लियॆ अड़ॆ रहॆ ॥

प्रहार रॊज झॆलतॆ अशांति कॆ कुचाल कॆ, सदा निशंक काल-भाल वक्ष पै चढ़ॆ रहॆ ॥

अखंड भारती सुहासिनीं सुभाषिणीं कहॆ, सभी अघॊष युद्ध वीर शान सॆ लड़ॆ रहॆ ॥

 

 

कवि-"राज बुन्दॆली"

17/12/2013

पूर्णत: मौलिक एवं अप्रकाशित रचना,,,,…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on December 17, 2013 at 4:30pm — 16 Comments

तुमसे

तुम ही कहो अब

क्या मैं सुनाऊँ

सरगम के सुर

ताल हैं तुम से

सारी घटाएँ

बहकी हवाएँ

फागुन की हर

डाल है तुमसे

तुम ही कहो .......

तुम बिन अँखियन

सरसों फूलें

रीते सावन

साल हैं तुमसे

तेरी छुअन से

फूली चमेली

शारद की हर

चाल है तुमसे

तुम ही कहो .......

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by राजेश 'मृदु' on December 17, 2013 at 4:11pm — 14 Comments

रिश्तों की ताप

रिश्तों की ताप

बर्फ सी ठंडी हथेली में, सूरज का ताप चाहिए

फिर बँध जाए मुट्ठी, ऐसे जज्बात चाहिए ।

बाँध सर पे कफन, कुछ करने की चाह चाहिए

मर कर भी मिट न सके, ऐसे बेपरवाह चाहिए।

मन में उमड़ते भावों को,शब्दों का विस्तार चाहिए

शब्द भाव बन छलक उठे,ऐसे शब्दों का सार चाहिए।

पथरा गई संवेदनाएं जहाँ , रिश्तों की ताप चाहिए

चीख कर दर्द बोल उठे,अहसासों की ऐसी थाप चाहिए।

चीर कर छाती चट्टानों…

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Added by Maheshwari Kaneri on December 17, 2013 at 12:30pm — 15 Comments

नवगीत

बर्फ देखो 
पिघलने लगी 
 
साँस पानी की 
जैसे थमी थी 
पत्थरों की  तरह 
जो जमी थी   … 
 
स्थितियाँ अब 
बदलने लगी   … बर्फ देखो। 
 
वो जो उम्मीद-
-जैसे खिला है 
साथ सूरज का 
हमको मिला है 
 
दूरियां पास 
चलने लगी     …बर्फ देखो। 
 
मौसम ने 
बदली है करवट 
पायी…
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Added by AVINASH S BAGDE on December 17, 2013 at 10:30am — 26 Comments

कटाक्ष -हे ईश्वर ...

हे ईश्वर

.

जूते का फीता बांधकर जैसे ही उठा, सामने किसी अपरचित को खड़ा देख मै चौक गया. लगा की मै सालों से उसे जानता हूँ पर पहचान नहीं पा रहा हूँ. बड़े संकोच से मैंने पूछा-" आप--", मै अपना प्रश्न पूरा करता इस-से पहले ही उन्होंने बड़ी गंभीर आवाज़ में कहा -" मै ईश्वर हूँ".

उन की गंभीर वाणी में कुछ ऐसा जादू था की मुझे तुरंत विश्वास हो गया की मै इस पूरी कायनात के मालिक से रूबरू हूँ. मैंने खुद को संभाला और अपे स्वभाव के अनुरूप उन पर प्रश्नों की झड़ी लगा दी.…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on December 17, 2013 at 8:30am — 9 Comments

क्यों चले आए शहर (नवगीत) - कल्पना रामानी

क्यों चले आए शहर, बोलो 

श्रमिक क्यों गाँव छोड़ा?

 

पालने की नेह डोरी,  

को भुलाकर आ गए।

रेशमी ऋतुओं की लोरी,

को रुलाकर आ गए।

 

छान-छप्पर छोड़ आए,

गेह का दिल तोड़ आए,

सोच लो क्या पा लिया है,

और  क्या सामान जोड़ा?

 

छोडकर पगडंडियाँ

पाषाण पथ अपना लिया।

गंध माटी भूलकर,

साँसों भरी दूषित हवा।

 

प्रीत सपनों से लगाकर,

पीठ अपनों को दिखाकर,

नूर जिन नयनों के थे,…

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Added by कल्पना रामानी on December 16, 2013 at 11:00pm — 38 Comments

''अक्सर''

समृद्ध अतीत के माथे पर
अक्सर खिंच जाती हैं लकीरें

चिंतित भविष्य की

फैसलों की फर्श पर

क्यूं अक्सर

बिखर जाते हैं

बदलाव के मोती

खुशियों के आंगन में

टंगे मुस्कुराते गुब्बारों

पर अक्सर कोई चलाता है

गमों की गोलियां

बेवक्त पर काम आने वाला वक्त

अक्सर बदल जाता है आदमी की तरह

जब मौज मौसम की लेने निकलें तो

थम जाती हैं सुहानी हवाएं अक्सर

समझ आती है जब तलक…
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Added by atul kushwah on December 16, 2013 at 10:30pm — 9 Comments

ये कैसी आधुनिकता है ….

ये कैसी आधुनिकता है …. …..

.

उफ्फ !

ये कैसी आधुनिकता है ….

जिसमें हर पल …..

संस्कारों का दम घुट रहा है //

हर तरफ एक क्रंदन है ….

सभ्यता आज ….

कितनी असभ्य हो गयी है //

आज हर गली हर चौराहे पर ….

शालीनता अपनी सभी …..

मर्यादाओं की सीमाएं तोड़कर हर ……

शिष्टाचार की धज्जियां उड़ा रही है //

बदन का सार्वजनिक प्रदर्शन …..

आधुनिकता का अंग बन गया…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 16, 2013 at 7:30pm — 17 Comments

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