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Ram Awadh VIshwakarma
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  • India
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Ram Awadh VIshwakarma's Page

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सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़ज़ल - एक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाब
"आद0 राम अवध जी सादर अभिवादन। अच्छी ग़ज़ल कही गया आपने। बधाई स्वीकार कीजिये"
19 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़ज़ल - एक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाब
"हार्दिक बधाई आदरणीय  राम अवध जी। बेहतरीन गज़ल। खूबसूरत आज दुनिया बन गई है कत्लगाहजालिमों से मिल गया है अब सुना है इन्किलाब"
20 hours ago
Samar kabeer commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़ज़ल - एक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाब
"जनाब राम अवध जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । उर्दू शब्दों में नुक़्ते लगा लें तो बहतर होगा ।"
20 hours ago
Ram Awadh VIshwakarma posted a blog post

ग़ज़ल - एक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाब

बह्र - फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुनएक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाबकोई बतलाये कहाँ गायब हुआ है इन्किलाबएक वो भी वक्त था तनकर चला करता था वोएक ये भी वक्त आया है छुपा है इन्किलाबखूबसूरत आज दुनिया बन गई है कत्लगाहजालिमों से मिल गया है अब सुना है इन्किलाबहै अगर जिन्दा तो आता क्यों नहीं वो सामनेऐसा लगता है कि शायद मर चुका है इन्किलाबलोग कहते हैं गलतफहमी है ऐसा है नहींआज भी बहुतों के सीने में है जिन्दा इन्किलाबमौलिक अप्रकाशितSee More
22 hours ago
Ram Awadh VIshwakarma commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post करता रहा था जानवर रखवाली रातभर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी आदाब।  खूबसूरत ग़ज़ल के लिये बधाई। कारण से कुछ के मस्जिदें वीरान हो गईंं  इस मिसरे में ताकीदे लफ़्ज़ी का ऐब आ गया है।  इसको ऐसा किया जा सकता है कुछ कारणों से मस्जिदें वीरान हो गईंं दिखते नहीं दधीचि से…"
Sunday
Ram Awadh VIshwakarma commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"आदरणीय सालिक गणवीर जी नमस्कार। खूबसूरत ग़ज़ल के लिये बधाई मेरे विचार से ये गरीबों का ख्याल है बाबा में ख्याल की जगह "खयाल " शब्द का प्रयोग होता है आँख इतनी बरस चुकी है कि यहां " कि"  का वज़्न 2 लिया गया है शायरी में वज्न गिराया…"
Sunday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़ज़ल-आ गई फिर से मुसीबत मेरे सर पर कम्बख्त
"आदरणीय राम अवध विश्वकर्मा जी, आदाब। दमदार अश'आ़र से मुज़ैय्यन शानदार ग़ज़ल हुई है। बधाई स्वीकार करें। "सबके सीने में समाया हुआ है डर कमबख्त" और "वो भी कहता है कि पहुँचा हुआ साधू है वो"  मिसरों में आपने "हुआ"…"
May 30
Samar kabeer commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़ज़ल-आ गई फिर से मुसीबत मेरे सर पर कम्बख्त
"जनाब राम अवध जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें । कमबख्त बन के तूफान चला आया शहर के अन्दर' इस मिसरे में 'शह्र' को आपने 12 पर लिया है,जबकि उर्दू शाइरी में इसे 21 पर लेना उचित होता है,देखियेगा ।"
May 30
Ram Awadh VIshwakarma commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"आदरणीय तेजवीर सिंह जी ग़ज़ल सराहना एवं उत्साह वर्धन के लिये सादर आभार"
May 29
TEJ VEER SINGH commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"हार्दिक बधाई आदरणीय  राम अवध विश्वकर्मा जी।बेहतरीन गज़ल। खबरे बढ़ा चढ़ा के दिखाना है इनका कामतिल का बना दें ताड़ ये अखबार ख्वामखाह"
May 29
Ram Awadh VIshwakarma posted a blog post

ग़ज़ल-आ गई फिर से मुसीबत मेरे सर पर कम्बख्त

बह्र-फाइलातुन फइलातुन फइलातुन फैलुनमुँह अँधेरे वो चला आया मेरे घर कमबख्त आ गई फिर से मुसीबत मेरे सर पर कमबख्तइस समय खौफजदा लगती है दुनिया सारी सबके सीने में समाया हुआ है डर कमबख्तचाहता हूँ मैं उड़ूँ नील गगन मे लेकिन साथ देते ही नहीं अब मेरे ये पर कमबख्तबन के तूफान चला आया शहर के अन्दर कर गया कितनों को बरबाद समन्दर कमबख्तलाख चाहूँ मैं उसे मुट्ठी में कर लूँ लेकिन दो कदम दूर ही रहता है मुकद्दर कमबख्तवो भी कहता है कि पहुँचा हुआ साधू है वो हाथ में ले के जो चलता फिरे खंजर कमबख्त़मिन्नतें लाख करूँ हाथ…See More
May 29
Ram Awadh VIshwakarma commented on AMAN SINHA's blog post वो सुहाने दिन
"बचपन की यादे आपकी कविता पढ़कर ताजा हो गईंं। खूबसूरत कविता. के लिये बधाई"
May 28
Ram Awadh VIshwakarma commented on रणवीर सिंह 'अनुपम''s blog post हल हँसिया खुरपा जुआ (कुंडलिया)
"आदरणीय रणवीर सिंह अनुपम जी सादर अभिवादन बहुत सुन्दर कुनडलियां द्वरा दुर्दशा का वर्णन किया है बधाई"
May 28
Ram Awadh VIshwakarma commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"आदरणीय लक्ष्मणधामी मुसाफिर जी सादर नमस्कार ग़ज़ल सराहना एवं उत्साह वर्धन के लिए शुक्रिया"
May 28
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"आ. भाई राम अवध जी, सादर अभिवादन । अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
May 28
Ram Awadh VIshwakarma commented on Ram Awadh VIshwakarma's blog post ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई
"धन्यवाद आदरणीय समर कबीर साहब"
May 26

Profile Information

Gender
Male
City State
Gwalior Madhya pradesh
Native Place
Basti U.P.
Profession
Retired Govt. Servent
About me
Retired as Divisional Engineer BSNL book published 1.Mehman Bhi Ltkate Hain ( Gazals) 2.Chakoo khatkedar hai ab (Gazals) 3.Muft khori Jinda Bad ( Gadya Vyangya ) 4. Vishwakarma Brahmin aur unke gotra 5.Iski Topi Uske Sar Pe (Gazals)6. Bhopoo sa chillate rahiye.

Ram Awadh VIshwakarma's Blog

ग़ज़ल - एक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाब

बह्र - फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन

एक अरसे से जमीं से लापता है इन्किलाब

कोई बतलाये कहाँ गायब हुआ है इन्किलाब

एक वो भी वक्त था तनकर चला करता था वो

एक ये भी वक्त आया है छुपा है इन्किलाब

खूबसूरत आज दुनिया बन गई है कत्लगाह

जालिमों से मिल गया है अब सुना है इन्किलाब

है अगर जिन्दा तो आता क्यों नहीं वो सामने

ऐसा लगता है कि शायद मर चुका है इन्किलाब

लोग कहते हैं गलतफहमी है ऐसा है…

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Posted on June 5, 2020 at 7:46am — 3 Comments

ग़ज़ल-आ गई फिर से मुसीबत मेरे सर पर कम्बख्त

बह्र-फाइलातुन फइलातुन फइलातुन फैलुन

मुँह अँधेरे वो चला आया मेरे घर कमबख्त

आ गई फिर से मुसीबत मेरे सर पर कमबख्त

इस समय खौफजदा लगती है दुनिया सारी

सबके सीने में समाया हुआ है डर कमबख्त

चाहता हूँ मैं उड़ूँ नील गगन मे लेकिन

साथ देते ही नहीं अब मेरे ये पर कमबख्त

बन के तूफान चला आया शहर के अन्दर

कर गया कितनों को बरबाद समन्दर कमबख्त

लाख चाहूँ मैं उसे मुट्ठी में कर लूँ लेकिन

दो कदम दूर ही रहता है मुकद्दर कमबख्त

वो भी कहता है कि…

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Posted on May 29, 2020 at 8:30am — 2 Comments

ग़़ज़़ल- फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई

बह्र - मफऊल फाइलात मफाईल फाइलुन

221 2121 1221 212

अन्धों के गांव में भी कई बार ख्वामखाह

करती है रोज रोज वो ऋंगार ख्वामखाह

रिश्ता नहीं है कोई भी उससे तो दूर तक

मुजरिम का बन गया है तरफदार ख्वामखाह

फोकट में एक रोज की छुट्टी चली गई

इतवार को ही पड़ गया त्यौहार ख्वामखाह

नाटक में चाहते थे मिले राम ही का रोल

रावण का मत्थे मढ़ गया किरदार ख्वामखाह

ये बुद्ध की कबीर की चिश्ती की है जमीन

फिर आप भाँजते हैं क्यूँ तलवार ख्वामखाह

खबरे बढ़ा चढ़ा…

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Posted on May 25, 2020 at 5:07pm — 16 Comments

ग़ज़ल - इस तरफ इंसान कड़की में

बह्र - फाइलातुन फाइलातुन फा

2122 2122 2

इस तरफ इंसान कड़की में

उस तरफ भगवान कड़की में

एक पल को भी नहीं भटका

राह से ईमान कड़की में

लाक डाउन में गई रोजी

सब बिके सामान कड़की में

ज़िन्दगी रफ्तार से दौड़े

हैं नहीं आसान कड़की में

हैं बहुत बीमार हफ्तों से

घर में अम्मी जान कड़की में

भूल बैठे सब हंसी ठठ्ठा

गुम हुई मुस्कान कड़की में

क्या कहें बरसात से पहले

ढह गया…

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Posted on May 23, 2020 at 9:11am — 6 Comments

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At 9:43pm on July 30, 2011,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

Mushayra :- कमेन्ट जीस पोस्ट पर करनी हो ठीक उसके नीचे दाहिने तरफ ब्लू रंग में Reply लिखा हुआ है उसको क्लिक कर जब कमेन्ट करेंगे तो थ्रेड में आएगा, मुख्य बॉक्स में केवल नया पोस्ट करना चाहिए | ( आप नए है इसलिए जानकारी हेतु बता रहा हूँ ) 

इस कमेन्ट को पुनः बताये अनुसार लगा दे |

At 9:56am on July 9, 2011,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 7:53pm on July 3, 2011, Admin said…
At 7:18pm on July 2, 2011, PREETAM TIWARY(PREET) said…
 
 
 

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