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Chetan Prakash
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Chetan Prakash commented on Chetan Prakash's blog post ग़ज़ल
"आदाब, आदरणीय, आप सही कह रहै है अवकाश मिलते ही आपके संकेतानुसार पुनः सही स्वरूप में ग़ज़ल  पोस्ट करूँगा ।"
5 hours ago
Chetan Prakash commented on Chetan Prakash's blog post रोटी
"मोहतरम जनाब, समर कबीर साहब, आदाब, आप कविता, रोटी .तक पहुँचने की ज़हमत की, इसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया ! लघु कथा को आपने सराहा, अच्छा लगा। कृपा बनाएँ रखे, आदरणीय !"
6 hours ago
Samar kabeer commented on Chetan Prakash's blog post ग़ज़ल
"'हलचल भी नहीं है' तो रदीफ़ है, क़वाफ़ी मतले में 'वो' और 'तो' हैं, बाक़ी अशआर बिना क़ाफ़िये के हैं, ग़ौर करें ।"
6 hours ago
Chetan Prakash commented on Chetan Prakash's blog post दौड़ अपनी-अपनी (लघु- कथा)
" मोहतरम जनाब, समर कबीर साहब, आदाब, आपने लघुकथा " दौड़ अपनी अपनी" तक पहुँचने की ज़हमत की, इसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। लघु कथा को आपने सराहा, अच्छा लगा। कृपा बनाएँ रखे, आदरणीय !"
6 hours ago
Chetan Prakash commented on Chetan Prakash's blog post ग़ज़ल
"आदाब आदरणीय, समर कबीर साहब ,  उक्त ग़ज़ल के मतले के दोनों मिसरों में चूँकि एक ही काफिया ( हलचल ) है, अतः उसे अंत तक निभाने प्रयास मैंने किया है। साभार   "
7 hours ago
Samar kabeer commented on Chetan Prakash's blog post ग़ज़ल
"जनाब चेतन प्रकाश जी आदाब, क़ाफ़िये क्या हैं इस ग़ज़ल के?"
9 hours ago
Samar kabeer commented on Chetan Prakash's blog post रोटी
"जनाब चेतन प्रकाश जी आदाब, सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
9 hours ago
Samar kabeer commented on Chetan Prakash's blog post दौड़ अपनी-अपनी (लघु- कथा)
"जनाब चेतन प्रकाश जी आदाब, अच्छी लघुकथा हुई है, बधाई स्वीकार करें | "
10 hours ago
Chetan Prakash posted a blog post

ग़ज़ल

2 2 1 1 2 2 1 1 2 2 1 1 2 2आग़ाज़ मुहब्बत का वो हलचल भी नहीं है आँखों में इज़ाज़त है तो हलचल भी नही हैंक्या हिन्दू मुसलमाँ बना फिरता है, ज़माने ऐसी तो खुदाया यहाँ हलचल भी नहीं हैआसान नहीं होता जहाँ  रोटी का कमाना इस ओर तो तेरी कहीं हलचल भी नहीं हैक़मज़र्फ बने मत कि कमाना नहीं आताऔलाद ने उस ओर की हलचल भी नहीं हैहै एक मुसीबत वो निभाने हैं, मरासिम सुन वक़्त बचा क़म है वो हलचल भी नहीं हैआवाज़ लगाऊँ तो कोई भी नहीं आता वो कान जो सुनता है तो हलचल भी नहीं हैअब वक़्त बदलना तो वो आसान रहा कब है चक्र समय…See More
16 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Chetan Prakash's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई चेतन जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
yesterday
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yesterday
Chetan Prakash added the App Status
Wednesday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-68 (विषय: संकटकाल)
"मोहतरम भाई, Sheikh Shahzad Usmani साहब, प्रस्तुति आपको अच्छी लगी, इसके निए आपका वहुत शुक्रिया ! लघु - कथा अथवा लघु कहानी पर चर्चा, दोस्त, ऐसी है, जैसे प्याज पर पहली दो पर्तें । सो, भाई, जुनून, कहे या पागलपन स्रोत और लक्षण समान है। वैसे भी अन्य…"
Monday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-68 (विषय: संकटकाल)
"लघु- कथा कल मानव और विभा की शादी के दस वर्ष पूरे हो रहे थे। सो इस बार की मैरिज एनीवर्सरी विशेष थी। दाम्पत्य जीवन में कोई अभाव प्रकटतः तो विभा को नहीं था। दो बच्चे, बेटी मानसी और बेटा विशेष प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे थे। विभा एम, ए. बी. एड. थी,…"
Sunday
Samar kabeer and Chetan Prakash are now friends
Sunday
Chetan Prakash replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-125
"आदरणीय, Dandpani nahak आदाब ! ग़जल आपको अच्छी लगी, इसके लिए आपका बहुत शुक्रिया। कृपया उत्साह-वर्धन करते रहें! साभार !"
Nov 28

Profile Information

Gender
Male
City State
Baraut
Native Place
Hapur
Profession
Teaching
About me
I'm a poet rather born than made or trained since my childhood

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ग़ज़ल

2 2 1 1 2 2 1 1 2 2 1 1 2 2

आग़ाज़ मुहब्बत का वो हलचल भी नहीं है

आँखों में इज़ाज़त है तो हलचल भी नही हैं

क्या हिन्दू मुसलमाँ बना फिरता है, ज़माने

ऐसी तो खुदाया यहाँ हलचल भी नहीं है

आसान नहीं होता जहाँ  रोटी का कमाना

इस ओर तो तेरी कहीं हलचल भी नहीं है

क़मज़र्फ बने मत कि कमाना नहीं आता

औलाद ने उस ओर की हलचल भी नहीं है

है एक मुसीबत वो निभाने हैं, मरासिम

सुन वक़्त बचा क़म है वो हलचल भी…

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Posted on December 3, 2020 at 7:00pm — 4 Comments

रोटी

गोल -गोल होती है रोटी

 गाँव-गाँव से शहर आता

आकर अपना खून बेचता

वो गँवार आदमी देखो तुम

रोटी खातिर महल बनाता |

गोल- गोल होती है रोटी...!

सच्चा कर्म-योगी वही है

प्याज-हरी धर खाता रोटी,

धरती माँ का पुत्र वही है

मोटी- मोटी उसकी रोटी |

गोल-गोल होती है रोटी..!

दुनिया बनी ये काज रोटी

बाल-ग्वाल कमा रहे रोटी

सारा शहर रचा हे, रोटी,

गाँव- गाँव बना है रोटी |

गोल-गोल होती है…

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Posted on December 3, 2020 at 7:26am — 2 Comments

दौड़ अपनी-अपनी (लघु- कथा)

कल मानव और विभा की शादी के दस वर्ष पूरे हो रहे थे। सो इस बार की मैरिज एनीवर्सरी विशेष थी। दाम्पत्य जीवन में कोई अभाव प्रकटतः तो विभा को नहीं था। दो बच्चे, बेटी मानसी और बेटा विशेष प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे थे। विभा एम, ए. बी. एड. थी, मिजाज़ से हाउस वाइफ थी। सारा दिन चौका बर्तन, सफाई, बच्चों की सुख-सविधा में कोई कमी न रहे इसमें निकल जाता था । हाँ मानव से ज़रूर उसे शिकायत थी। मानव एक कस्बे के महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्रवक्ता थे। उनका ज्यादातर समय अध्ययन और अध्यापन में ही निकल जाता और बचता…

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Posted on November 29, 2020 at 6:00am — 2 Comments

ग़ज़ल

212 212 212 2

राज़ आशिक़ के पलने लगे हैं

फूल लुक-छिप के छलने लगे है

उनके आने से जलने लगे हैं

मुँह-लगे दिल तो मलने लगे हैं

कोई आता है खिड़की पे उसकी

रात में गुल वो खिलने लगे हैं

चल रही है मुआफिक हवा भी

बागवाँ फूल फलने लगे हैं

आज पूनम दुखी है बहुत सुन !

आँख में ख्वाब खलने लगे हैं

रंग सावन ग़जल आ घुले फिर

अब तो चेतन बदलने लगे हैं

मौलिक एवं…

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Posted on November 23, 2020 at 6:30pm — 2 Comments

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At 11:46pm on November 22, 2020, DR ARUN KUMAR SHASTRI said…

भाई चेतन जी
नमन -
इस्लाह का
सलीका आ जायेगा
मैंने आज तलक
मुकम्मल तो कोई देखा नहीं
गलतियां निकालोगे-
तो सीखूंगा ही ।।
मैं तो अधूरा था
अधूरा रहा
और हूँ अब तलक
आज आया हूँ आपकी बज्म में
कुछ सिखा दोगे -
तो सीखूंगा भी ।।

At 11:59am on June 27, 2020, Samar kabeer said…

जनाब चेतन प्रकाश जी,ये टिप्पणी आप मुशाइर: में दें,तो मुझे जवाब देने में आसानी होगी ।

 
 
 

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"आदरणीय  Samar kabeer जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार।"
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"आदरणीय  Samar kabeer जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार।"
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" मोहतरम जनाब, समर कबीर साहब, आदाब, आपने लघुकथा " दौड़ अपनी अपनी" तक पहुँचने की…"
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"आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व प्रशंसा के लिए आभार।"
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"आ. भाई विजय शंकर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए धन्यवाद ।"
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Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post केवल ऐसी चाह
"आ0 समर कबीर साहेब, आदाब हार्दिक धन्यवाद,आपका"
8 hours ago
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