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मानव सभ्यता का इतिहास (लघुकथा)

“कितने हसीन थे वो दिन जब पूरे आसमान पर अकेले मेरा राज हुआ करता था।” अपनी पतंग को माँझे से बाँधते हुए छोटा सा वह लड़का अपने सुनहरे अतीत में खो गया। 

अपने मोहल्ले में तब वो अकेले ही पतंग उड़ाने वाला हुआ करता था। न तो उसे कोई रोकने वाला था और न ही टोकने वाला। वह पूरी तरह से स्वतंत्र था। उस वक़्त उसकी बस एक ही हसरत होती, “एक दिन अपनी पतंग चाँद तक ले जाऊँगा।”

मगर यह ज़्यादा दिन चला नहीं। धीरे-धीरे उसके मोहल्ले में दूसरे पतंगबाज़ भी आने लगे। उनके आते ही आसमान में वर्चस्व की जंग शुरू हो गयी। “अबे ओ गुटके, कट गयी न तेरी पतंग!” बड़ी उम्र के नये लड़कों ने अपनी बड़ी-बड़ी पतंगों के साथ उस पर धौंस जमानी शुरू कर दी।

वह जब भी पतंग उड़ाता पीछे से कोई न कोई बड़ी पतंग आ कर उसकी छोटी सी पतंग को काट देती। अब उसके सामने मूल प्रश्न अपनी पतंग को ऊँचे उड़ाने का नहीं बल्कि उसके अस्तित्त्व को बचाने का था।

उसकी पतंग माँझे से बँध चुकी थी। उसने लटाई को उठाया और उसे ढील दी। थोड़ी ही देर में उसकी पतंग हवा से बातें करने लगी और फिर देखते ही देखते उसने ढेरों पतंगों को काट कर चित्त कर दिया।

अपनी इस जीत पर वह काफ़ी ख़ुश था। “मुझे पता चल गया है कि किस पतंग को काटना है और किस पतंग को नहीं।” उसने उपाय ढूँढ लिया था। अब वह सिर्फ़ छोटी पतंगों से ही उलझता था। बड़ी पतंगों से उसने दोस्ती कर ली थी। 

आसमान पतंगबाज़ों में बँट चुका था और इस बँटे हुए आसमान में उसको मिले हिस्से का अब वो अकेला राजा था। उधर छोटी और कमज़ोर पतंगें उसकी पतंग को देखते ही भय के मारे दूर भाग रही थीं जिसे देख कर उसके मासूम चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गयी।   

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 25, 2018 at 5:29pm

आदरणीय महेंद्र जी बहुत ही बढ़िया लघुकथा लिखी है...आज के राजनीतिक परिदृश्य की बिलकुल सही झांकी नजर आती है कथा....जहाँ 

एक दूसरे की पतंग काटी जा रही है।

Comment by Sushil Sarna on June 25, 2018 at 2:48pm

वाह आदरणीय एक प्रभावशाली और भावपूर्ण लघु कथा। हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on June 25, 2018 at 11:16am

जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,उम्दा लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Neelam Upadhyaya on June 24, 2018 at 5:05pm


यही नियम है । कमजोर को अपना अस्तित्व बचने के लिए मजबूत का साथ संघर्ष करना ही पड़ता और एक बार विजयी होने पर उसे स्वतः ही अपने लिए स्थान मिल जाता है। बच्ची संदेशपरक रचना। हार्दिक बधाई।

Comment by babitagupta on June 24, 2018 at 3:46pm

अपने अस्तित्व ओ बचाने के लिए कुटनीति भी करनी पडती हैं उर समझौते भी ,फिर चाहे परिवेश राजनीति का हो या सामाजिकता का.बेहतरीन रचना बधाई स्वीकार कीजिएगा आदरणीय सरजी.

Comment by Shyam Narain Verma on June 23, 2018 at 10:32am
 प्रभापूर्ण सुंदर लघु कथा के  लिए बधाई 
Comment by TEJ VEER SINGH on June 23, 2018 at 7:58am

हार्दिक बधाई आदरणीय महेंद्र कुमार जी।बेहतरीन संदेश देती सुंदर लघुकथा।कहीं ना कहीं, आज के राजनैतिक परिवेश को भी उजागर करती है।

Comment by Mohammed Arif on June 22, 2018 at 8:55pm

कभी-कभी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए समझौतें भी खरने होते हैं । फिर उन समझौतों में स्वयं का वजूद बरकरार रहता है । शानदार पेशकश पर हार्दिक आदरणीय महेंद्र कुमार जी ।

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