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ग़ज़ल ( पत्थर निकला)

ग़ज़ल (पत्थर निकला ) -------------------------

- 2122 ---1122 ---1122 --22

मेरि बर्बाद मुहब्बत का  ये   मंज़र    निकला  /

 जिसको उल्फत का ख़ुदा समझा वो पत्थर निकला /

दिल को तस्कीन तो हासिल हुई हमदर्दी   से

पर निगाहों  से नहीं  ग़म का समुन्दर  निकला /

ज़ुल्म ने जब भी ज़माने में उठाया है सर

लेके ख़ुद्दार क़लम अपना सुख़नवर   निकला /

नीम शब मिलने की तदबीर भी बेकार गयी

सुबह होते ही गली कूचे में महशर  निकला /

यूँ ही दीवार खड़ी तो न हुई है  शक की

जो था क़ासिद वो किसी और का मुखबर निकला /

लग रहा है ये ख़ुशी रूठ गयी है मुझ से

वक़्ते दीदार रुखे  यार भी मुज़्तर  निकला /

खुल गया वक़्ते नज़अ राज़े मुहब्बत आख़िर

लब से तस्दीक़ मेरे जैसे ही  दिलबर निकला /

(मौलिक व अप्रकाशित )    

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 3, 2016 at 12:32am

बहुत खूब 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 2, 2016 at 9:34pm

मोहतरम जनाब समर कबीर साहिब आदाब , जनाब सलीम शेख़ साहिब और जनाब जयनित कुमार साहिब , ग़ज़ल पसंद करने और हौसला अफ़ज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया / ....... अर्ज़ यह है कि महशर का मतलब क़ियामत ,आफत ,शोरो शर वग़ैरा भी होता है / निकलना का मतलब उठना भी होता है / महशर निकला का मतलब शेर 4 के सानी मिसरे में क़ियामत उठना /शोरो शर होना लिया गया है /   सलीम साहिब दुरुस्त लफ़्ज़ मुखबर (अरबी ) ही है मुखबिर नहीं। ...... महरबानी

Comment by saalim sheikh on February 2, 2016 at 7:15pm

अच्छी ग़ज़ल है तस्दीक़ साहब , दाद कुबूल करें , महशर दरअसल अरबी का लफ्ज़ है, इस्म-ए-मकां है ,महशर= हश्र होने की जगह जैसे मक़तल ( क़त्ल होने की जगह ) या मस्जिद ( सज्दा करने की जगह ) , 'महशर निकला' शायद सही नहीं होगा , साथ ही 'मुखबर' की जगह 'मुखबिर' सही लफ्ज़ होगा

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 2, 2016 at 6:41pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने आदरणीय तस्दीक जी..

पर "महशर" निकल कैसे सकता है? वो तो एक प्रक्रिया होती है!
आदरणीय समर कबीर जी की बातों से सहमत हूँ।।
Comment by Ravi Shukla on February 2, 2016 at 2:24pm

आदरणीय तसदीक अहमद जी और आदरणीय समर साहब  आप दोनो को बहुत बहुत शुक्रिया लफ्ज का विस्‍तृत मानी समझाने के लिये । जानकारी में इजाफा हुआ । ओ बी ओ में अपनी मौजूदगी को आप मार्गदर्शन देकर और हम कुछ ग्रहण करके  सार्थक  कर रहे है । सादर ।

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on February 2, 2016 at 12:27pm

gud gud

Comment by Hari Prakash Dubey on February 2, 2016 at 1:01am

आदरणीय तस्‍दीक अहमद जी, बेहतरीन रचना है हार्दिक बधाई आपको ! सादर

Comment by Samar kabeer on February 1, 2016 at 10:30pm
जनाब रवि शुक्ल जी आदाब,"नज़ा"उस कैफ़ियत को कहते हैं जो तवील बीमारी के बाद मरने से पहले मरीज़ पर तारी होती है जिससे अहबाब ये अंदाज़ा लगा लेते हैं कि मरीज़ कुछ देर का महमान है ,इस हालत को "जां कनी"भी कहते हैं !
Comment by Samar kabeer on February 1, 2016 at 10:22pm
जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल से नवाज़ा आपने मंच को,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं !
"महशर निकला"से में मुत्तफ़िक़ नहीं,महशर बपा होता है,निकलता नहीं !
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 1, 2016 at 9:28pm

जनाब रवि शुक्ल  साहिब ,ग़ज़ल पसंद करने का बहुत बहुत शुक्रिया ,मेहरबानी। ..... वक़्ते नज़अ का मतलब है दम निकलने से पहले /..... निगाह का मतलब आँख भी होता है। इस शेर को किसी एक पर टारगेट नहीं किया है बल्कि जनरल कहा है / आपने जैसा लिखा वो भी हो सकता है /  सादर

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