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ग़ज़ल / बह्र -22/22/22/22

जीने में अब मजा कहाँ है,
खुशियों का सिलसिला कहाँ है ।
बारिश कोसों दूर हुई अब
जल का बादल गया कहाँ है ।
जो हैं हिंसा के सौदागर
उनको मिलती सज़ा कहाँ है ।
रहबर करते वादे बेहद ,
कोई पूरा हुआ कहाँ है ।
माँ है उनकी जीवित अब तक
घर का हिस्सा हुआ कहाँ है
भूल चुका है वो तो ये भी,
भाई उसका बसा कहाँ है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on July 14, 2017 at 12:04am
आदरणीय वीजय निकोर जी ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का शुक्रिया । लेखन सार्थक हुआ ।
Comment by vijay nikore on July 13, 2017 at 7:44pm

आपकी गज़ल पढ़ कर दिल खुश हुआ... बहुत-बहुत बधाई, आरिफ़ भाई

Comment by Mohammed Arif on July 12, 2017 at 10:20pm
बहुत-बहुत आभार आदरणीय महेंद्र कुमार जी । सुख़न नवाज़ी का शुक्रिया ।
Comment by Mahendra Kumar on July 12, 2017 at 7:24pm

आ. मोहम्मद आरिफ़ जी, बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Mohammed Arif on July 11, 2017 at 6:24pm
आदरणीय रवि शुक्ला जी ग़ज़ल पर प्रतिक्रिया देने और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत-बहुत आभार । ओबीओ के मंच पर मैं एक पाठक की हैसियत से ही नहीं अपितु अपनी रचनाधर्मिता का भी परिचय देता हूँ ।
Comment by Mohammed Arif on July 11, 2017 at 6:19pm
आदरणीय बृजेश कुमार जी ग़ज़ल पर प्रतिक्रिया देने और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत-बहुत आभार ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 11, 2017 at 3:35pm
बड़ी ही खूबसूरत ग़ज़ल कही आदरणीय आरिफ..सादर
Comment by Ravi Shukla on July 11, 2017 at 2:42pm

आदरणीय मोहम्‍मद आरिफ साहब आपने अच्‍छी गजल कही बधाई कुबूल करे  । एक पाठक होने से आगे बढ़ कर एक शाइर के रूप में भी आपकी पहचान बन रही है अच्‍छा है । सादर

Comment by Mohammed Arif on July 11, 2017 at 12:18pm
आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ग़ज़ल की सराहना और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत-बहुत शुक्रिया । सुधार कर लिया है ।
Comment by Samar kabeer on July 10, 2017 at 2:44pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
चौथे शैर के ऊला मिसरे में 'वादें' को "वादे" कर लें ।

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