ग़ज़ल
2122 2122 212
कितने काँटे कितने कंकर हो गये
हर गली जैसे सुख़नवर हो गये
रास्तों पर तीरगी है आज भी
शह्र-से जब गाँव के घर हो गये
आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे
हुक्म आया घर से बेघर हो गये
जो गिरी तो साख गिरती ही गई
अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये
सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब
यूँ बड़े भँवरों के लश्कर हो…
ContinueAdded by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 5:10pm — 4 Comments
दोहा पंचक. . . . क्रोध
मानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।
सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध ।।
बड़े भयानक क्रोध के, होते हैं परिणाम ।
बदले के अंगार को, मिलता नहीं विराम ।।
हर लेता इंसान का, क्रोध सदा विवेक ।
मिटते इसकी ज्वाल में, रिश्ते मधुर अनेक ।
क्रोध अनल में आदमी, कर जाता वह काम ।
घातक जिसके बाद में, अक्सर हों परिणाम ।।
पर्दे पड़ते अक्ल पर, जब आता है क्रोध ।
दावानल में क्रोध की, बस लेता प्रतिशोध ।।
सुशील…
ContinueAdded by Sushil Sarna on January 8, 2026 at 2:05pm — 1 Comment
२२१/२१२१/१२२१/२१२
*
ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी
मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं कभी।१।
*
भूले हैं सिर्फ लोग न सच को निहारना
हमने भी सच है सत्य पे सोचा नहीं कभी।२।
*
आदत पड़ी हो झूठ की जब राजनीति को
दिखता है सच, जबान पे आता नहीं कभी।३।
*
बस्ती में सच की झूठ को मिलता है ठौर पर
सच को तो झूठ आस भी देता नहीं कभी।४।
*
जनता को सत्य कैसे भला रास आएगा
सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं…
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 7, 2026 at 6:04pm — 1 Comment
तारों भरी रात, फैल रही चाँदनी
इठलाता पवन, मतवाला पवन
तरू तरु के पात-पात पर
उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास
मेरा मन क्यूँ उन्मन
क्यूँ इतना उदास
खुशी ... पिघलती हुई मोम-सी
जाने क्यूँ उसे हमेशा
होती है जाने की जल्दी
आती है, चली जाती है
आ..ती है
आलोप हो जाती है
कोई टुकड़ा स्याह बादल का आकर
रुक गया है मेरी छत पर मानो
कैसा सिलसिला है प्रकृति का यह
दर्द की अवधि समाप्त नहीं…
ContinueAdded by vijay nikore on January 5, 2026 at 9:00am — 2 Comments
सूर्य के दस्तक लगाना
देखना सोया हुआ है
व्यक्त होने की जगह
क्यों शब्द लुंठित
जिस समय जग
अर्थ ’नव’ का गोड़ता हो
कुंद होती दिख रही हो वेग की गति
और कर्कश वक्त
केंचुल छोड़ता हो
साधना जब
शौर्य का विस्तार चाहे
उग्र का पर्याय तब
खोया हुआ है
धूप के दर्शन नहीं हैं,
धुंध है बस
व्योम के उत्साह पर
कुहरा जड़ा है
जम रहा है आँख का पानी निरंतर
काल यह संक्रांति का
औंधा पड़ा है
अब प्रतीक्षा…
ContinueAdded by Saurabh Pandey on January 1, 2026 at 12:33am — 3 Comments
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