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January 2026 Blog Posts (5)

ग़ज़ल

  

 

ग़ज़ल

2122  2122  212

 

कितने काँटे कितने कंकर हो गये

हर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये

 

रास्तों  पर  तीरगी  है आज भी

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये                                  

 

आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे

हुक्म आया घर से बेघर हो गये

 

जो गिरी तो साख गिरती ही गई

अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये

 

सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब  

यूँ  बड़े  भँवरों के लश्कर हो…

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Added by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 5:10pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . क्रोध

दोहा पंचक. . . . क्रोध

मानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।

सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध ।।

बड़े भयानक क्रोध के, होते हैं परिणाम ।

बदले के अंगार को, मिलता नहीं विराम ।।

हर लेता इंसान का, क्रोध सदा विवेक ।

मिटते  इसकी ज्वाल में, रिश्ते मधुर अनेक ।

क्रोध अनल में आदमी, कर जाता वह काम ।

घातक जिसके बाद में, अक्सर हों परिणाम ।।

पर्दे पड़ते अक्ल पर, जब  आता है क्रोध ।

दावानल में क्रोध की, बस लेता प्रतिशोध ।।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on January 8, 2026 at 2:05pm — 1 Comment

सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

*

ता-उम्र जिसने सत्य को देखा नहीं कभी

मत उसको बोल पक्ष में बोला नहीं कभी।१।

*

भूले हैं सिर्फ  लोग  न  सच को निहारना

हमने भी सच है सत्य पे सोचा नहीं कभी।२।

*

आदत पड़ी हो झूठ की जब राजनीति को

दिखता है सच, जबान पे आता नहीं कभी।३।

*

बस्ती में सच की झूठ को मिलता है ठौर पर

सच को तो  झूठ  आस  भी देता नहीं कभी।४।

*

जनता को सत्य  कैसे  भला रास आएगा

सच सा हुआ है एक भी राजा नहीं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 7, 2026 at 6:04pm — 1 Comment

सुखद एकान्त है या है अकेलापन

तारों भरी रात, फैल रही चाँदनी

इठलाता पवन, मतवाला पवन

तरू तरु के पात-पात पर

उमढ़-उमढ़ रहा उल्लास

मेरा मन क्यूँ उन्मन

क्यूँ इतना उदास

 

खुशी ... पिघलती हुई मोम-सी

जाने क्यूँ उसे हमेशा

होती है जाने की जल्दी

आती है, चली जाती है

आ..ती  है 

आलोप हो जाती है

 

कोई टुकड़ा स्याह बादल का आकर

रुक गया है मेरी छत पर मानो

कैसा सिलसिला है प्रकृति का यह

दर्द की अवधि समाप्त नहीं…

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Added by vijay nikore on January 5, 2026 at 9:00am — 2 Comments


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नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ

सूर्य के दस्तक लगाना

देखना सोया हुआ है



व्यक्त होने की जगह

क्यों शब्द लुंठित

जिस समय जग

अर्थ ’नव’ का गोड़ता हो

कुंद होती दिख रही हो वेग की गति

और कर्कश वक्त

केंचुल छोड़ता हो

साधना जब

शौर्य का विस्तार चाहे

उग्र का पर्याय तब

खोया हुआ है



धूप के दर्शन नहीं हैं,

धुंध है बस

व्योम के उत्साह पर

कुहरा जड़ा है

जम रहा है आँख का पानी निरंतर

काल यह संक्रांति का

औंधा पड़ा है

अब प्रतीक्षा…

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Added by Saurabh Pandey on January 1, 2026 at 12:33am — 3 Comments

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"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन।बहुत सुंदर समसामयिक गजल हुई है। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।"
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ग़ज़ल

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