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ग़ज़ल

2122  2122  212

 

कितने काँटे कितने कंकर हो गये

हर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये

 

रास्तों  पर  तीरगी  है आज भी

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये                                  

 

आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे

हुक्म आया घर से बेघर हो गये

 

जो गिरी तो साख गिरती ही गई

अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये

 

सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब  

यूँ  बड़े  भँवरों के लश्कर हो गये                                                                 

 

एक  नेता  और अफसर क्या हुए

कितने-कितने खेत  बंजर हो गए

 

डोर  ऐसी  उसके  हाथों  आ गयी

उड़ते पंछी पल में बे-पर  हो गये

#

मौलिक/ अप्रकाशित. 

अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’

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Comment

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Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on January 26, 2026 at 5:57pm

आदरणीय अशोक कुमार जी, नमस्कार। इस सुंदर ग़ज़ल पे हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

/रास्तों  पर  तीरगी  है आज भी

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये/

इस शेर में सुधार की गुंजाइश प्रतीत हो रही है। कोई सार्थक सुझाव देना भी चाहता था लेकिन दरअस्ल मैं इस शेर के भाव तक ही नहीं पहुँच पाया (कौन से रास्ते?)                   

 

/आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे/

इस शेर में "हो रहे थे ही" खटक रहा है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है:

आत्मनिर्भर होने को ही थे कि वे

 

बाक़ी पूरी ग़ज़ल पे शेर-दर-शेर दाद क़ुबूल कीजिए। सादर

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 25, 2026 at 3:56pm

आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रथम देरी से प्रतिक्रिया के लिए क्षमा चाहता हूँ. आपकी यह विस्तृत और बिन्दुवार प्रतिक्रिया मुझे कई अशआर पर रह गयी कमी को समझने में मददगार साबित हो रही है. मैं अवश्य आपके द्वारा चिन्हित अशआर में बदलाव का प्रयास करूंगा. सादर. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 9, 2026 at 4:18pm

आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता हूँ 

कितने काँटे कितने कंकर हो गये

हर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये  

बहुत ही सार्थक और प्रभावी मतला हुआ है. 

वैसे, उला के प्रवाह में सानी का होना मतले को और वजनदार कर देता. इसके लिए तुर्की-ब-तुर्की कहना था - हर गली कितने सुखनवर हो गये ... ऐसा किया जाना काँटों और कंकर की श्रेणी में तमाम बेतुके सुखनवरों को रखता हुआ उनकी जगह बता देता. . 

 

रास्तों  पर  तीरगी  है आज भी

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये                                  

इस शे’र को और समय दिया जाता तो इसकी सम्प्रेषणीयता और बढ़ जाती. 

जैसे 

रास्तों की तीरगी के अर्थ क्या 

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये   

 

आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे

हुक्म आया घर से बेघर हो गये 

पुनर्प्रतिस्थापना के लिए बार-बार प्रयासरत परिवारों की लाचारी उभर आयी है इस शे’र के माध्यम से. 

उला का विन्यास यों कर दिया जाय -  आत्मनिर्भर हो रहे ही थे कि वे

 

जो गिरी तो साख गिरती ही गई

अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये

वाह-वाह ... बहुत खूब .. आज जो मुद्रास्फीति की दशा है उस लिहाज से यह शे’र मौजूँ बन पड़ा है 

सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब  

यूँ  बड़े  भँवरों के लश्कर हो गये                                                                 

वाह वाह .. भँवरों के लश्कर का तो जवाब नहीं.  

 

एक  नेता  और अफसर क्या हुए 

कितने-कितने खेत  बंजर हो गए

यह नेता-अफसर के नेक्सस पर सशक्त कहन बन पड़ा है. बहुत खूब ..

बहरहाल, उला का विन्यास कुछ यों हो सकता था  - 

क्या मिले नेता तथा अफसर यहाँ  

कितने-कितने खेत बंजर हो गये 

डोर  ऐसी  उसके  हाथों  आ गयी

उड़ते पंछी पल में बे-पर  हो गये

इस शे’र पर और समय चाहिए होगा. भाव स्पष्ट हो रहे हैं लेकिन शे’र की पकड में नहीं आ रहे.

इस सुन्दर और सुगढ़ प्रयास के लिए हार्दिक बधाई  

जय-जय 

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 9:25pm

  आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल पर उत्साहवर्धन के लिए आपका दिल से शुक्रिया. सादर 

Comment by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 9:22pm

   आदरणीय भाई लक्षमण धामी जी सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. सादर 

Comment by Sushil Sarna on January 8, 2026 at 8:45pm

वाहहहहहह आदरणीय क्या ग़ज़ल हुई है हर शे'र पर वाह निकलती है । दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं सर 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 8, 2026 at 6:56pm

आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन।बहुत सुंदर समसामयिक गजल हुई है। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।

कृपया ध्यान दे...

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