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सतवीर वर्मा 'बिरकाळी''s Blog (14)

प्रकृति का विनाश

सोचता है मनुष्य

खुदगर्ज होकर

नहीं है बङा कोई उससे

हरा सकता है वह

अपने तिकङमबाज दिमाग से

प्रकृति को भी

भरोसा होता है उसे बहुत ज्यादा

अपने तिकङमबाज मस्तिष्क पर

समर्थन भी कर देती है

उसकी इस सोच का

शुरुआती सफलताएँ

नहीं सोचता वह ये

होते हैं प्राण प्रकृति में भी

होती हैं भावनाएँ प्रकृति में भी

करता जाता है मनुष्य

प्रकृति का विनाश

अपनी तिकङमों से

अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु।



प्रकृति होती है नारी स्वरुपा…

Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on July 4, 2013 at 2:00pm — 12 Comments

माँ

माँ होती है आदि गुरु

जीवन की दी प्राथमिक शिक्षा

बोलना सिखाया जिसने हमेँ

चलना सिखाया जिसने हमें

वो है माँ



होता है स्वर्ग का अहसास

माँ के ही आँचल में

मिलता है सुकून मन को

की जो माँ की निस्वार्थ सेवा

अपार कष्ट सहा जिसने

वेदना सही जिसने असीम

जन्म दिया फिर भी हमको

वो है माँ



परवाह नहीं की जिसने

अपनी भूख और प्यास की

अन्न पहुँचाया हमारे पेट

खुद पानी पीकर सो रही

हमको ना उसने भूखा सुलाया

वो है… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on May 16, 2013 at 6:31pm — 8 Comments

भारतीय सनातन संस्कृति का ह्रास

साँस लेता हूँ जब

उठती है कसक सीने में

ज्वार उठता है

ज्वाला धधकती है

दब जाता हूँ मैं

राख के ढेर तले

सनातन संस्कृति की राख

दिखलाई देते हैं

संस्कृति के भग्न अवशेष

अटक जाती हैं साँसें

अवसान देखकर

सनातन संस्कृति का



समृद्ध संस्कृति थी कभी

भारतीय सनातन संस्कृति

सम्भाल नहीं पाए

भारतीय भाग्य विधाता

आक्रमणकारी आए विदेशी

रौंदने लगे पैरों तले

भारतीय सनातन संस्कृति

हूण आए, कुषाण आए

यमनी भी… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on May 12, 2013 at 7:17am — 8 Comments

होली आयी खुशियां छायी

होली आयी

खुशियां छायी

रंग बिखरे

संस्कृति के

स्नेह मिलन का

पर्व है होली

रंग-गुलाल देते सन्देश

प्रकृति के

विभिन्न रंगों का

कितनी भी जतन करो

रक्षा होती सदैव

सत्य की

असत्य सदैव

सत्य से हारा

रंग प्रतीक हैं

वसंतागमन का

जिस तरह

खिलते हैं

विभिन्न रंगों के फूल

वसन्त में

उसी तरह

बिखरते हैं रंग

होली पर्व में

खेलो होली मजे से

बुरी रीतियों से बचो

शराब पीना

होली के दिन

काला… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 25, 2013 at 10:40pm — 6 Comments

मन ना कभी उदास होगा, हरदम रहेगा वहाँ सवेरा।

(मौलिक और अप्रकाशित रचना)



पूरब से उदित हुआ, दिनकर सबका जीवनदाता।

अंगङाई लेते पक्षी जागे, कोई सो न रहता।।



अरुण की लालिमा फैली, तम तज धरा भागा।

मुर्गा बोला तजो बिस्तर, कर्म प्रवृत हों सब जागा।।



गोरैया चहकी लगी फुदकने, आँगन में वो आकर।

टुकुर-टुकुर ताके वो, माँ के हाथ के दानों पर।।



रोज आना नियम उसका, नहीँ कभी वो भूलती।

इंतजार अगर करना पङे उसको, शोर मचाती हुई चीखती।।



दाना चुगती रोटी खाती, मजे से फिर वो खेलती।

पेट भर जाता… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 22, 2013 at 11:49am — No Comments

पश्चिमी राजस्थान में मीठे पानी का स्रोत- जोहङ

(मौलिक व अप्रकाशित)



राजस्थान में जोहङों और कुओं का अपना महत्त्व है। राजस्थान में ही क्यों, पूरे भारतवर्ष में जोहङ मिल जाएँगे और उनकी स्थानिय उपयोगिता भी मिल जाएगी। हाँ नाम आपको अलग अलग मिलेंगे। कहीं ये जोहङ, गिन्नाणी, ताल, तलैया के नाम से जाने जाते हैं तो कहीं इनको डैम, धरण, डेर कहा जाता है।

जोहङों का सबसे ज्यादा महत्त्व राजस्थान में है जहाँ सबसे कम वर्षा होती है और पीने का पानी बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। इसलिए बरसाती पानी को एकत्र कर पीने के काम मेँ लाने के लिए गाँव के… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 15, 2013 at 6:45pm — 6 Comments

बसन्तागमन का स्वागत

(मौलिक व अप्रकाशित रचना)



दिनकर रश्मियाँ मार्ग खोजती

चली शनैः शनैः वसुन्धरा पथ

तिमिर अकङता जकङे रहता

जोर लगाता वसुन्धरा ललाट

आलोक को विलोक तिमिर

विस्मृत करता स्वबल शक्ति

दिनकर रश्मियाँ पहुँच वसुन्धरा

मानव मानस भाव उपजाती

रमणी वसुन्धरा श्रृंगारित होती

केश मोगरा पुष्पदल सजाती

केसर मिश्रित टीका लगाती

कर्ण हरसिंगार फूल पहनती

मस्तक ओढे धानी चुनरिया

सप्तरंगी पुष्पमाल उर सुशोभित

कलाई गुलाबी कंगना डारे

हस्त गेंदा पहरे… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 14, 2013 at 12:26pm — 4 Comments

मुआवजा नहीं मिला

(मौलिक व अप्रकाशित)



आया था मैं

शहर में

खोजने

रोजगार का अवसर

नहीं था गाँव मेँ

दो जून

खाने का सहारा

पाँच बीघा जमीन थी

भेंट चढ गई

सरकारी योजना के

अमले कहकर गये

बङी सङक बनेगी

मुआवजा मिलेगा

सङक बन गई

बहुत अच्छी बनी

चमकती थी

सीसे के जैसी

इंतजार किया

मुआवजे का

नहीं आये अमले

चक्कर काटे

दफ्तरों के

चप्पलें घिस गई

मुआवजा नहीं मिला।



रोटी का सहारा छिना

जमा पूँजी खत्म… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 13, 2013 at 10:51pm — 6 Comments

शहरों की चकाचौंध

(मौलिक और अप्रकाशित रचना)



शहरों की चकाचौंध में

फीके पङे गाँव-गुवाङ

नित नये फैशन तले

पिसता युवा समाज

पक्की चौङी सङकें यहाँ

सङकों पर रौशन लाइटें

गाङियों की चिल्ल पोँ में

खोयी घोङा-गाङी आज

ऊँचे-ऊँचे मकान बने हैं

नीचे उनके दुकान बनी हैं

गाँव पलायन करता रहता

शहरों की चकाचौंध में

नहीं जानता वो ये कि

कुछ नहीं ऐसा शहरों में

आकर्षण हो जिसके प्रति

सबसे ज्यादा होता प्रदूषण

शोर-सराबा शहरों में

शान्ति ढूँढते… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 12, 2013 at 10:42pm — 6 Comments

गोधूली वेला

(मौलिक व अप्रकाशित)



गोधूली वेला है

पर

गौ की धूली नहीं

जमाने के विकास तले

खो गयी है कहीं

गौ के खुरों की

गलीयों और

गाँव के ऊपर

उङती धूल

अब तो

नजर आती है

सिर्फ और सिर्फ

मोटरगाङियों के

टायरों की धूली

और

उनका धूम्र

चूल्हों और हारों से

उठता धूम्र भी

गाँवों से

होने लगा है गायब

नजर आता है अब

रसोई में रखा

गैस सिलेण्डर

दूध की कढावणी

और

गाय के लिए

बँटा (गर्म… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 12, 2013 at 9:03pm — 10 Comments

करो कुछ नवनिर्माण

(मौलिक और अप्रकाशित)



अरुणोदय से हुआ

नील गगन लोहित सा

गिरीश्रृगों के मध्य से

ललाट उठा रहा

संदेश दे रहा

जनमानस को

उठो जागो

आलस त्यागो

करो कुछ नवीन

गत दिवस के अनुभव

अपने मानस में पिरोकर

भूलों को सुधारो

अर्द्धकार्य पूर्ण करो

बनो संकल्पवान

अर्द्धविक्षिप्त से

अपूर्ण मत बनो

पूर्ण बनकर

पूर्ण कार्य करो

भरते जैसे नयी उमंग

पक्षी हृदय में

अरुणोदय वेला

भरो निजमानस में

हे मानव!

तुम भी… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 12, 2013 at 9:00am — 10 Comments

कुरीतियों को मिटाकर परिवर्तन लाना है।

इस चराचर जगत में परिवर्तन तो होना ही है। अगर परिवर्तन नहीं होगा तो सँसार चक्र का पहिया रुक जाएगा। परिवर्तन ही संसार को गतिमान बनाए रखता है। जिस प्रकार एक जगह पङा हुआ लोहे का मजबूत सरिया जंग लगने से खत्म हो जाता है उसी प्रकार बिना परिवर्तन के संसार भी खत्म हो जाएगा। इसलिए हमें पता है कि हम बहुत कुछ नहीं कर सकते पर फिर भी घङे की एक बूँद तो जरुर बन ही सकते हैं।



परिवर्तन के लिए बहुत कुछ खोना पङता है और बहुत कम फल मिलता है। प्राचीन रुढियों को तोङकर नयी व्यवस्थाएँ अपनानी होंगी जो समय के… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 4, 2013 at 9:13pm — 2 Comments

गले में फिर कुछ अटक गया

कहनी होती है जो बात

कह नहीं पाते

संकोच उठता है

मन में डर लगता है

कहीं शब्द रचना भूल जाएँ

बाहर निकलते निकलते शब्द

अपना रास्ता भूल जाएँ

बात कोई खास नहीं होती

साधारण शब्द होते हैं

पर पेट से उठते हैं और

गले में अटक जाते हैं

फिर कोशिश होती है

बाहर निकालने की

नये शब्द निर्माण कर

फिर कोई नई अङचन

पैदा हो जाती है

बहुत बार कोशिशें होती हैं

हर बार नाकाम होता हूँ

अबकी बार दिल कङा किया

जो बात कहनी है

वो कहके… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 1, 2013 at 10:38am — 9 Comments

खास आपके लिए

खास आपके लिए

लाया मैं मिठा सपना

क्या मैं इस योग्य हूँ

मुझे अब तक नहीं पता

इस बात का कि

मैं ला सकता हूँ

आपके लिए मीठा सपना।



लोग कहते हैं मुझको

कि मैं नहीं हूँ योग्य

किसी के लिए कुछ भी

मीठा ला सकने में

ला सकता हूँ मैं सिर्फ

कङवा ही कङवा।



पहली बार लाया था मैं

बङा ही मन लगाकर

किसी अपने के लिए

एक मनपसन्द चीज

मेरे ख्याल से

नहीं पूछा था उसको

कि क्या है उसका मनपसन्द।



देखकर इतना गुस्सा… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on February 28, 2013 at 12:49pm — 10 Comments

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