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दिनेश कुमार's Blog (83)

ग़ज़ल -- मेहनत से कमाता हूँ मैं ...

२२१-१२२१-१२२१-१२२



तलवार से तीरों से न ख़ंज़र से लड़ा हूँ

ख़ुद अपनी अना ही के मुक़ाबिल मैं खड़ा हूँ



मेहमान नवाज़ी मैं दिलो जान से करता

दौलत तो नहीं पास मेरे, दिल का बड़ा हूँ



मेहनत से कमाता हूँ मैं हर अपना निवाला

ईमाँ की कसौटी पे मैं कुन्दन का कड़ा हूँ



घर के लिए राशन लूँ या बच्चों की किताबें

मँहगाई के इस दौर में, मुश्किल में पड़ा हूँ



कहते हैं मुझे लोग मुहब्बत का मसीहा

दुनिया से मैं नफ़रत को मिटाने पे अड़ा हूँ



ये… Continue

Added by दिनेश कुमार on June 2, 2015 at 11:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल -- मुझको सुकून-ए-दिल किसी दर पर नहीं मिला ( बराए इस्लाह )

२२१-२१२१-१२२१-२१२



दिल जिस से आशना हो वो मन्ज़र नहीं मिला

मैं तिश्नालब ही रह गया, सागर नहीं मिला



पथरीले रास्तों पे ही चलता रहा हूँ मैं

सफ़रे हयात में मुझे रहबर नहीं मिला



अपनी बुराइयों से यूँ अन्जान हूँ अभी

मैं खुद से एक बार भी खुलकर नहीं मिला



बुझते दियों को शब्दों से रोशन जो कर सके

महफ़िल में ऐसा कोई सुखनवर नहीं मिला



साहिल पे ही तू बैठ के क्या सोचे ए बशर

मेहनत बिना किसी को भी गौहर नहीं मिला



इसकी तलाश में… Continue

Added by दिनेश कुमार on May 17, 2015 at 9:34pm — 22 Comments

ग़ज़ल -- हर काम यूँ करो कि हुनर बोलने लगे

221-2121-1221-212



हर काम यूँ करो कि हुनर बोलने लगे

मेहनत दिखे सभी को, समर बोलने लगे



उस बेवफ़ा से बोलना तौहीन थी मेरी

लेकिन ये मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर बोलने लगे



तहज़ीब चुप है इल्मो-अदब आज शर्मसार

देखो पिता के मुँह पे पिसर बोलने लगे



आँखों से मैं ज़बान का ऐसे भी काम लूँ

जो भी मैं कहना चाहूँ नज़र बोलने लगे



सब हमको बुतपरस्त समझते रहे मगर

ऐसे तराशे हमने , हजर बोलने लगे



दैरो हरम के नाम पे जब शह्र बँट गया

दोनों तरफ़… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 21, 2015 at 8:30pm — 24 Comments

ग़ज़ल -- मेरी बरबाद तमन्ना का जनाज़ा उठ्ठे

अरकान : २१२२-११२२-११२२-२२



मेरी बरबाद तमन्ना का जनाज़ा उठ्ठे

दिल-ए-रेज़ा से शबो रोज़ धुआँ सा उठ्ठे



ये तो मैं हूँ जो ग़मे जाँ से अभी वाबस्ता

मेरे हालात में तो कोई भी घबरा उठ्ठे



झूठ ही झूठ अदालत में दिखाई देता

सच की जानिब से भी तो कोई जियाला उठ्ठे



भूख से मौत के आगोश में जो पहुँचा है

अब न मुफ़लिस का वो सोया हुआ बच्चा उठ्ठे



दुख़्तरे रज़ के तलबगार सभी हैं साक़ी

बस तेरी बज़्म में इक ज़िक्र-ए-पियाला उठ्ठे



लोग दाँतों तले… Continue

Added by दिनेश कुमार on April 14, 2015 at 10:39am — 22 Comments

ग़ज़ल -- मुसीबत में ही याद आते हैं राम

122-122-122-121

ये महँगाई जो बढ़ रही बेलगाम
हमारा तो जीना हुआ है हराम

तिज़ारत में हासिल महारत जिसे
उसे गुठलियों के भी मिलते हैं दाम

न जाने सभी की ये फितरत है क्यूँ
मुसीबत में ही याद आते हैं राम

रखे जो सदा हौसला और उमीद
उसी के ही दुनिया में बनते हैं काम

इसे सिर्फ़ वोटों से मतलब 'दिनेश'
सियासत कहाँ करती फ़िक्रे अवाम

मौलिक व अप्रकाशित

Added by दिनेश कुमार on April 6, 2015 at 8:20am — 23 Comments

ग़ज़ल -- " कहूँ कुछ और कुछ निकले ज़ुबाँ से "

1222-1222-122



'कहूँ कुछ और कुछ निकले ज़ुबाँ से'

बहुत आजिज़ मैं अपने जिस्म-ओ-जाँ से



उठी आवाज़ शब की रूह-ए-खाँ से

दिनेश अब झाँक बामे आसमाँ से



निखरती शख़्सियत है इम्तिहाँ से

कहे ये रहगुज़र हर कारवाँ से



मुक़र्रर आपका जब फ़ैसला है

तो फिर क्या फ़ाइदा मेरे बयाँ से



सरे महफ़िल तुम्हें रुसवा करेगा

नहीं करना अदावत राज़दाँ से



सितारे चाँद सूरज और जुगनू

सभी का नूर उस नूरेजहाँ से



अँधेरा फिर न टिकता एक पल… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 24, 2015 at 8:03pm — 9 Comments

ग़ज़ल -- हमसफ़र निकलते हैं .. (बराए इस्लाह)

212-1222-212-1222



ख़्वाब मेरी आँखों से रात भर निकलते हैं

रहगुज़र नहीं आसाँ बा ख़बर निकलते हैं



बेचने ज़मीर अपना हम चले हैं गलियों में

देखो खिड़कियों से अब कितने सर निकलते हैं



नातवाँ बहादुर को दे रहा चुनौती है

चींटियों के भी अब तो बाल-ओ-पर निकलते हैं



दिल हमारा आईना आप हैं खरे पत्थर

बज़्म आपकी और हम टूट कर निकलते हैं



मैक़दे कहाँ करते, फ़र्क रिन्दो-वाइज़ का

जो भी पीते हैं मदिरा झूम कर निकलते हैं



बिन किसी विभीषण के… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 22, 2015 at 8:00pm — 23 Comments

ग़ज़ल -- हर इक रिश्ता यहाँ झूठा बहुत है। ( बराए इस्लाह )

1222-1222-122



सफ़र सच का अगर लम्बा बहुत है

मुझे भी हौसला थोड़ा बहुत है



सभी के सामने जो मुस्कुराता

वही छुप छुप के क्यूँ रोता बहुत है



पड़ी है ईद दीवाली इकठ्ठा

नगर में आज़ सन्नाटा बहुत है



गया परदेस बूढ़ी माँ का बेटा

बहाना जो भी हो थोथा बहुत है



कमा कर भेजता वो माँ को पैसे

मगर इक माँ को क्या इतना बहुत है



भँवर में जो फँसा हो उससे पूछो

सहारे के लिए तिनका बहुत है



चले ही जाना सबको इस जहाँ से

हर… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 19, 2015 at 5:00pm — 16 Comments

ग़ज़ल -- आरज़ू दिल की दिल में दबी रह गई ....

212-212-212-212



आरज़ू दिल की दिल में दबी रह गई

ज़िन्दगी में मेरी कुछ कमी रह गई



ज़ख़्म नासूर मेरे सभी बन गए

दिल में अब आँसुओं की नदी रह गई



ज़ेहन के आईनों पर था पर्दा पड़ा

मुझ से कमज़ोरी मेरी छुपी रह गई



आस्तीनों में ख़ंजर छुपाए हुए

दोस्ती तो फ़क़त नाम की रह गई



बागबाँ ही चमन का है दुश्मन बना

सहमी सहमी यहाँ हर कली रह गई



अब न चिड़ियों का घर में बसेरा रहा

चहचहाहट की पीछे सदी रह गई



अब के बेमौसमी जो हुईं… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 15, 2015 at 3:59pm — 12 Comments

ग़ज़ल -- मैंने ग़ज़लों में उतारी ज़िन्दगी...

2122-2122-212



'इम्तिहानों में गुज़ारी ज़िन्दगी'

इस तरह हमने सँवारी ज़िन्दगी



सर्दियों की धूप थी पहले मगर

फ़स्ल-ए-बाराँ अब हमारी ज़िन्दगी



बाज के पंजों ने मसला देर तक

एक चिड़िया आज हारी ज़िन्दगी



मैकदे की राह दिखलाई इसे

बाम-ए-ग़म से यूँ उतारी ज़िन्दगी



सर पे चढ़ कर बोलता इसका नशा

सबको अपनी जाँ से प्यारी ज़िन्दगी



जो बनाते दूसरों का आशियाँ

वो रहें सड़कों पे सारी ज़िन्दगी



इसके मजमे की कोई सीमा… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 15, 2015 at 1:19pm — 10 Comments

तरही ग़ज़ल -- "फानी है ये जहान यहाँ कुछ न लाजवाल"

221-2121-1221-212



चेहरे सभी ड़रे ड़रे आवाज़ पुर-मलाल

दहशत में आया शह्र ये, जब से हुआ बवाल



दुनिया की इस बिसात पे सपनों का दांव है

हर आदमी के ख़ू में छुपी इक अजीब चाल



मौला हो पादरी हो कोई संत हो यहाँ

दिखता न मुझको एक भी महबूब-ए-ज़ुल-जलाल



लीडर हमारे देश के बहरूपिये हुए

अन्दर से सारे भेड़िये, बाहर हो कोई खाल



रस्मो रिवाज़ ही रहे रिश्तों के दरमियाँ

अब कौन पूछता है यहाँ दिल से हाल-चाल



हर 'आम' ज़िन्दगी का लगे बोझ ढ़ो… Continue

Added by दिनेश कुमार on March 5, 2015 at 10:00am — 2 Comments

ग़ज़ल -- सब कुछ न आज आदमी किस्मत पे छोड़ तू

सब कुछ न आज आदमी किस्मत पे छोड़ तू

दरिया की तेज धार को हिम्मत से मोड़ तू



इस जिन्दगी की राह में दुश्वारियाँ बहुत

रहबर का हाथ छोड़ न रिश्तों को तोड़ तू



मेहनत के दम पे आदमी क्या कुछ नहीं करे

अपने लहू का आखिरी कतरा निचोड़ तू



जो कुछ है तेरे पास वही काम आएगा

बारिश की आस में कभी मटकी न फोड़ तू



मन की खुशी मिलेगी, तू यह नेक काम कर

टूटे हुए दिलों को किसी तर्ह जोड़ तू



दो गज कफन ही अंत में सबका नसीब है

अब छोड़ भी 'दिनेश'…

Continue

Added by दिनेश कुमार on March 1, 2015 at 1:00am — 12 Comments

ग़ज़ल -- तू मेरे लिए है न अजनबी ( बराए इस्लाह )

न तो मंज़िलों की तलाश है, न ही रास्तों की तलाश है

जो सँवार दें मेरी रहगुज़र , उन्हीं रहबरों की तलाश है



तू मुआफ़ करना मुझे ख़ुदा, मुझे मस्जिदों से न वास्ता

मेरे ज़ेहन में तो हैं तितलियाँ, मुझे ख़ुशबुओं की तलाश है



मेरी ख़्वाहिशें हैं दबी दबी, मेरी ज़िन्दगी है बुझी बुझी

मेरा इश्क़ आब-ए-हयात अब, मुझे जन्नतों की तलाश है



तू मेरे लिए है न अजनबी, मैं तेरे लिए हूँ न अजनबी

है हमारे बीच जो राब्ता, उसे क़ुर्बतों की तलाश है



कोई पास मेरे भी बैठता, मेरे… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 23, 2015 at 6:30am — 17 Comments

ग़ज़ल -- आया था जो भी ज़ेहन में काग़ज़ पे लिख दिया ( बराए इस्लाह )

तरतीब से सजे दर-ओ- दीवार घर नहीं

सुख दुख में जब कि साथ तेरे हमसफ़र नहीं



ऐसा नहीं कि राहे सफ़र में शजर नहीं

आसान फिर भी जिन्दगी की रहगुज़र नहीं



उपदेश दूसरों को सभी लोग दे रहे

खुद उन पे जो अमल करे ऐसा बशर नहीं



रिश्तों की भीड़ में कहीं गुम हो गये सभी

अब रौनकें वो पहले सी, चौपाल पर नहीं



जीवन की भागदौड़, चकाचौंध में बशर

खोया है इस कदर उसे खुद की खबर नहीं



गुटका शराब पीते हैं अब सब के सामने

आया अजीब दौर है बच्चों को ड़र… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 22, 2015 at 12:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल -- सुब्ह से शाम हम कमाते हैं

सुब्ह से शाम हम कमाते हैं

तब भी मुश्किल से घर चलाते हैं



ये विरासत में हमको सीख मिली

हम तो मेहनत की रोटी खाते हैं



शाम होते ही हम परिन्दों से

लौट कर अपने घर को आते हैं



जिनके सर पर खुदा का हाथ है वो

आँधियों में दिये जलाते हैं



रोज़-ए-महशर की छोड़ कर चिन्ता

रिन्द मयखाने रोज़ जाते हैं



मुझको दुनिया सराय लगती है

लोग आते हैं लोग जाते हैं



हम तो फुरसत में दिल के छालों को

शे'र के पर्दों में छुपाते… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 20, 2015 at 7:04am — 27 Comments

ग़ज़ल -- राम नहीं रावण देखा है

राम नहीं रावण देखा है

कलियुग का सज्जन देखा है



माली के ही हाथों उजड़ा

ऐसा भी उपवन देखा है.



काँप गया हूँ भीतर तक मैं

जबसे ये दर्पण देखा है



ढूँढ़ रही है बूढ़ी आँखें

क्या तुमने बचपन देखा है ?



हमने घर के बँटवारे में

रोता ये आँगन देखा है.



दिल का मोर खुशी को तरसे

इसने कब सावन देखा है



दूर कहीं अब धरती के संग

हम ने नील गगन देखा है



धनवानों का अक्सर मैंने

निर्धन अन्तर्मन देखा… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 15, 2015 at 7:47pm — 17 Comments

ग़ज़ल -- दिल है सीने से लापता शायद

दिल है सीने से लापता शायद

इश्क़ मुझको भी हो गया शायद



जिन्दगी उलझनों का नाम हुई

ले रहा इम्तिहाँ ख़ुदा शायद



बिन कहे वो मिरी करे इमदाद

ज़ेह्न में उसके कुछ पका शायद



हर घड़ी वो जो मुस्कुराता है.

जख़्म उसका कोई हरा शायद



झूठ को झूठ अब भी कहता मैं

मुझ में बाक़ी है बचपना शायद



रात भर करवटें बदलता हूँ

बोझ पापों का बढ़ गया शायद



कौन करता लिहाज़ अपनों का

जह्र रिश्तों में अब घुला शायद



नर्म लहज़े में आप… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 9, 2015 at 12:40pm — 33 Comments

ग़ज़ल -- कहानियों में हक़ीक़त नहीं हुआ करती

जो दिल कहे वो ज़रूरत नहीं हुआ करती

कहानियों में हक़ीक़त नहीं हुआ करती



तुम्हें गुरेज़ नहीं है यही सबब तो नहीं

बिना फरेब सियासत नहीं हुआ करती



ज़बान दे के पलटना उन्हें मुबारक हो

मैं ख़ुश हूँ, मुझसे तिज़ारत नहीं हुआ करती



मैं कैसे झूठ को सच और सच को झूठ कहूँ

कि एक दिन में ये आदत नहीं हुआ करती



जो चंद पैसों में ईमान बेच देते हैं

उन्हें किसी से रिफ़ाक़त नहीं हुआ करती



वो नामचीन हुए कल जो तिफ्ले-मकतब थे

कभी फ़ुज़ूल मशक़्क़त नहीं हुआ… Continue

Added by दिनेश कुमार on January 28, 2015 at 7:30pm — 15 Comments

ग़ज़ल -- नफ़रत नहीं तो उस से मुझे प्यार भी नहीं। ( इस्लाह हेतु )

221-2121-1221-212



नफ़रत नहीं तो उस से मुझे प्यार भी नहीं.

मेरे लिए वो शख़्श मगर अजनबी नहीं।



दुनिया में बुतपरस्त फ़क़त मैं नहीं ख़ुदा.

तेरे जहाँ में आशिक़ों की कुछ कमी नहीं।



कुछ तो मेरा नसीब ही सहरा की धूप है.

उस पर तुम्हारे प्यार की बौछार भी नहीं।



सहरानवर्द दिल है मिरा आप के बग़ैर.

जब से गए हैं आप मेरी ज़िन्दगी नहीं।



प्यालों को तोड़ कर दिल ए बेज़ार कह उठा.

जामे अजल नहीं तो कोई मयकशी नहीं।



इतना न ग़ौर से मुझे… Continue

Added by दिनेश कुमार on January 9, 2015 at 7:00pm — 20 Comments

तरही गजल

1212-1122-1212-112

" ये सच है काम हमारा तो बेमिसाल नहीं "

मिला सुकून जो दिल को तो अब मलाल नहीं



बिना क़सूर ही मैं बज़्म से निकाला गया

गज़ब के पूछा किसी ने कोई सवाल नहीं



मैं अपने खुद के ही दम पर जहाँ में जी लूँगाा

जो हौंसला हो अगर कुछ भी फिर मुहाल नहीं



वफ़ा की राह पे चल कर किसी को कुछ न मिला

मगर मैं ज़िन्दा हूँ अब तक ये क्या कमाल नहीं



तमाम रात अंधेरे से वो मुकाबिल था

थका थका सा लगे है, दिया निढ़ाल नहीं…



Continue

Added by दिनेश कुमार on January 2, 2015 at 8:22pm — 20 Comments

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