For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

September 2012 Blog Posts (200)

द्रौपदी के हिय की व्यथा सुनेगा कौन यहाँ ,,,,,,,,,

छोटी छोटी बातें बने आस्था के प्रश्न जब ,

बातें बड़ी बड़ी जाने क्यों बिसा र जाते है

अन्नदाता को तो है पिलाते दूध हम किन्तु ,

नौनिहाल देश की प्यासे मर जाते है

द्रौपदी के हिय की व्यथा सुनेगा कौन यहाँ

कृष्ण की चरित्र जब सत्ता की निमित्त हों

कैसे होंगे सीमित दु:शासनों के आचरण

कुंती पुत्र जब आत्मदाह को प्रवत्त हों

कैसे राष्ट्रगान राष्ट्र चिंतन करेगा कोई

पेट को भूख को अंगारे छलते हो मित्र

कैसे होगा देश का भविष्य खुशहाल भला

सड़कों पे जब वर्त्तमान…

Continue

Added by ajay sharma on September 30, 2012 at 11:30pm — 2 Comments

जब वचन निभाने राम चले ....

जब वचन  निभाने राम चले ....
जब वचन  निभाने राम चले ,
संग सिया चली और लखन चले,
दशरथ के प्राणाधार चले ,
कौशल्या के अरमान चले 
जब वचन ......
 
जिस आँगन में खेले राघव ,
घुटनों के…
Continue

Added by shikha kaushik on September 30, 2012 at 9:49pm — 3 Comments

शर्मिंदा हूँ

मनाना तो चाहता हूँ ईद

मगर बंद है

मेरे दिल के दरवाज़े

और ईद का चाँद

मुझे दिखाई नहीं पड़ता

 

दिवाली,दशहरा कैसे मनाऊँ

मेरे अन्दर का रावण

नहीं मरता मुझसे

 

बापू की जयंती है

पर मै

उनसे भी शर्मिंदा हूँ  

मेरे अन्दर हिंसा है

लालच है

मै नहीं मिला पाता

अपनी नज़रें

उनकी तस्वीर से

 

जिन शहीदों ने

जान तक दे दी

हमारी आज़ादी के लिए

हमने उनका सब कुछ लूट…

Continue

Added by नादिर ख़ान on September 30, 2012 at 7:00pm — 5 Comments

लघुकथा :- मोम

“रोहन! अब ये आदत कहाँ से सीख रहा है! रोमी आंटी को नमस्ते क्यों नही किया?” रमेश गुस्से में बोला!

“थॉरी पापा!” रुआंसा आवाज थी रोहन की!

“ह्वाट सॉरी...गलती फिर सॉरी..कोई सॉरी नही मिलेगी!”

“अरे बेटा! अब जाने भी दो! पाँच साल का भी तो नही है ये....” कमरे में बैठे बुज़ुर्ग बोले ही थे कि रमेश बीच में ही बोल पड़ा, “पिताजी, आपको पता है न, मुझे टोक पसंद नही, फिर भी? शांत रहिए!” बुज़ुर्ग चुप हो गए! रमेश बोलता रहा!

अगले दिन! स्कूल में!

“रोहन! बातें नही, इधर ध्यान दो!” टीचर… Continue

Added by पीयूष द्विवेदी भारत on September 29, 2012 at 10:34pm — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३७ (बन्दिश में आके शाइरी कुम्हलाके रह गई )

 

दर पे हमारे शाम इक इठला के रह गई

हमको तुम्हारी दास्ताँ याद आके रह गई

 

बहरोवज़न के खेल भी हमने समझ लिए

बन्दिश में आके शाइरी कुम्हलाके रह गई

 

होना था दिल के टूटने के बाद और क्या

ज़िदमें ही ज़ीस्त ख्वाबको झुठलाके रह गई

 

बेबस हुए कुछ इस तरह किस्मतके हाथ हम

तेरी निगाहेनाज़ भी समझा के रह गई

 

मुझको तिरी बेजारियों का कुछ गिला नहीं

मेरी भी ज़िंदगी अना दिखला के रह गई  

 

गुंचे शगुफ्ता…

Continue

Added by राज़ नवादवी on September 29, 2012 at 10:00pm — 6 Comments

ग़ज़ब था तेरा मिलाना नैना

कभी जो मैंने गुजारे थे पल

तुम्हारे दामन में दिन-ओ-रैना

हसीं वो मंजर भुला न पाया

ग़ज़ब था तेरा मिलाना नैना



दिवानापन ले भुला के खुद को

तुम्हारी चाहत को फिरता दरदर

भटकता राहों में तन्हा ऐसे

मिले न राहत मिले न चैना



जुदाई दे के चले हो मुझको

सुनो ये ताने ज़माना कसता

उड़े थे चाहत…
Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 29, 2012 at 6:56pm — 2 Comments

तू मेरा अभिमान है ....



पेड़ -

सुनो पेड़ -

छीन ली बैसाखी ,

मोनू आया तेरे दर

पैंया पैंया !

तुमने जो कहा -

मैंने क्या सही सुना -

बहन बड़ा न भैया

सबसे बड़ा रुपैया !



पेड़ पर तूफ़ान उठा है

सुनामी बस्ती उजाडेगी ,

बवंडर तो मचाएगी

डेंगू का डंक मौनू को डसेगा

एलोपैथी ने जबाव दिया टका सा

खून चढाना है एकमात्र उपाय

खून और कोयले की नहीं…
Continue

Added by DR. SAROJ GUPTA on September 29, 2012 at 2:49pm — 2 Comments

मन एक सागर

मन एक सागर

जहाँ ;

भावनाओं की जलपरियाँ

करती हैं अठखेलियाँ

विचारों के राजकुमारों के साथ ;

घात लगाये छुपे रहते

क्रोध के मगरमच्छ ;

लालच की व्हेल भयंकर मुँह फाड़े आतुर

निगल जाने को सबकुछ ;

घूमते रहते ऑक्टोपस दिवास्वप्नों के ;

आते हैं तूफान दुविधाओं के ;

विशालता ही वरदान है

और अभिशाप भी ;

अद्भुत विचित्रता को स्वयं में समेटे

एक अनोखा सम्पूर्ण संसार है

जो सीमाओं में रहकर भी

सीमाओं से मुक्त है ;

मन एक सागर

जहाँ ;

अतीत डूब…

Continue

Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 29, 2012 at 12:41pm — 12 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३६ (साबुन की तरह इश्क भी इकरोज़ गल गया)

ऐसा लगता है कि इस ग़ज़ल की बह्र तरही मुशायरे २७ की ग़ज़ल की ही है. रदीफ़ तो वही है, पर काफिया अलग. मैंने शेर वज़न और बह्र में कहने की कोशिश तो की है, पर मेरे आलिम दोस्त ही बताएंगे कि मैं कोशिश में कितना कामयाब हुआ.

 

लम्हा-ए-दीदनी-ओ-नज़ारा-ए-पल गया

वो माह बनके अर्श पे आया निकल गया

 

गर्दूं में शब की चांदनी हौले से आ बसी

रोज़ेविसालेयार भी आखिर में ढल गया

 

मिटने लगे हैं फर्क अब दिन रात के सभी

मौसम हमारे शह्र का कितना बदल…

Continue

Added by राज़ नवादवी on September 29, 2012 at 9:43am — 2 Comments

शहर में शांति है

शहर में शांति है



आज गाँधी जी के बुत के सामने फिर दंगे भड़क गए

धर्म के नाम पर लोग भिड़ गए मेरे शहर में

कितने ही मासूमों का खून बह निकला सड़कों पर

दिनभर से शहर में कर्फ्यू लगा है 

और प्रशासन कह रहा है शहर में शांति है |



हर रोज बलात्कार होते हैं मेरे शहर में

आबरू लूटती है चोराहों पर दोपहर में

नन्ही बच्चिओं को मार देते हैं जन्म से पहले

दर्द भरी चीखें निकलती हैं अँधेरी गलियों से 

और…
Continue

Added by Er.vir parkash panchal on September 28, 2012 at 5:30pm — 4 Comments

दर्द में जो बात है वो बात राहत में कहाँ !

संघर्ष में आनंद है जो कामयाबी में कहाँ !

दर्द में जो बात है वो बात राहत में कहाँ !



मुद्दा कोई उलझा रहे चलती रहें बस अटकलें ,

जो मज़ा उलझन में है वो सुलझने में कहाँ !



ज़िंदगी की मुश्किलों से रोज़ टकराते रहें ,

ज़िंदगी के साथ है सब मौत आने पर कहाँ !



बरसो बाद दोस्त मिला दिल को मिली कितनी ख़ुशी !

ये गर्मजोशी ,शिकवे ,गिले रोज़ मिलने में कहाँ !



हमको सुकून की नहीं हमें कशमकश की चाह ,

जो…
Continue

Added by shikha kaushik on September 28, 2012 at 5:00pm — 5 Comments

ख़ुद अपनी आँच में

तुम जल रहे हो, हम जल रहे हैं

ख़ुद अपनी आँच में पिघल रहे हैं

 

नया  दौर  हैं नये हैं रस्मों-रिवाज़

अब इंसानियत के पैगाम बदल रहे हैं

 

बाज़ारों की रौनक है, जादू का खेल

किस…

Continue

Added by नादिर ख़ान on September 28, 2012 at 4:00pm — 6 Comments

पौधा रोपा परम-प्रेम का

पौधा रोपा परम-प्रेम का, पल-पल पौ पसरे पाताली |

पौ बारह काया की होती, लगी झूमने डाली डाली |

जब पादप की बढ़ी उंचाई, पर्वत ईर्ष्या से कुढ़ जाता -

टांग अडाने लगा रोज ही, बकती जिभ्या काली गाली |

लगी चाटने दीमक वह जड़, जिसने थी देखी गहराई -

जड़मति करता दुरमति से जय, पीट रहा आनंदित ताली |

सूख गया जब प्रेम वृक्ष तो, काट रहा जालिम सौदाई -

आज ताकता नंगा पर्वत, बिगड़ चुकी जब हालत-माली |

लगी खिसकने चट्टानें अब , भूमि स्खलित होती हरदम -

पर्वत की…

Continue

Added by रविकर on September 28, 2012 at 2:00pm — 4 Comments

ये जिंदगानी

फूलों का सफर या

कांटों की कहानी

क्‍या कहूं कैसी है

ये जिंदगानी

कभी तो इसी ने

आंखों से पिलाया

बड़ी बेरूखी से

कभी मुंह फिराया

गम की इबारत या

जलवों की कहानी

क्‍या कहूं कैसी है

ये जिंदगानी

 

कभी सब्‍ज पत्‍तों पर

शबनम की लिखावट

कभी चांदनी में

काजल की मिलावट

 

कभी शोखियों की

गुलाबी शरारत

कभी तल्‍ख तेवर की

चुभती…

Continue

Added by राजेश 'मृदु' on September 28, 2012 at 12:46pm — 3 Comments

आँसू चाँद के....

कई दिन की बारिश के बाद,

आज बड़ी अच्छी सी धूप खिली थी,

नीला सा आसमान,

जो भरा था कई सफ़ेद बादलों से,

कई लोगों ने अपने कपड़े,

फैला दिये थे सुखाने को छ्तों पर,

जो कई दिन से नमी से सिले पड़े थे,

याद आ ही गई बचपन की वो बात बरबस,

की जब कहा करते थे की,

बारिश होती है जब ऊपर वाला कभी रोता है,

फिर जब धूप खिलती थी,

और आसमान भर जाता था सफ़ेद बादलों से,

तब कहा करते थे की,

ऊपर वाले ने भी सुखाने डाली…

Continue

Added by पियूष कुमार पंत on September 27, 2012 at 10:47pm — 4 Comments

ग़ज़ल--हंसी और भी तुमको मौसम मिलेंगे।

हंसी और भी तुमको मौसम मिलेंगे।

मगर दोस्त तुमको कहां हम मिलेंगे।।

मेरा दिल दुखाकर अगर तुम हंसोगे।

तुम्हें जिंदगी में बहुत ग़म मिलेंगे।।

अगर जिंदगी में खुशी चाहते हो।

तो इस राह कांटे भी लाज़िम मिलेंगे।।

कभी भी किसी ने ये सोचा न होगा।

कि इनसान के पेट में बम मिलेंगे।।

खुशी सबको मिलती नहीं मांगने से।

बहुत लोग दुनिया में गुमसुम मिलेंगे।।

तुम्हारी खुशी को जुदा हो गया हूँ।

अगर जिंदगी है तो फिर हम…

Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on September 27, 2012 at 10:20pm — 4 Comments

केवल शो केसों में

बदल गयी नियति दर्पण की चेहेरो को अपमान मिले है , 

निस्ठायों को वर्तमान में नित ऐसे अवसान मिले है 



शहरों को रोशन कर डाला गावों में भर कर अंधियारे 

परिवर्तन की मनमानी में पनघट लहूलूहान मिले है,



चाह कैस्तसी नागफनी के शौक़ जहाँ पलते हों केवल 

ऐसे आँगन में तुलसी को अब जीवन के वरदान मिले है ,



भाग दौड़ के इस जीवन में मतले बदल गए गज़लों के 

केवल शो केसों में…

Continue

Added by ajay sharma on September 27, 2012 at 10:00pm — 3 Comments

=====नज्म=====

=====नज्म=====



तुम्हारी भीगी पलकें

याद हैं मुझे

भीगी पलकें

झरने सी छलकीं

पिरो न पाया था

एक मोती भी

और मेरे समन्दर-ए-दिल में

बाढ़ आ गयी…



Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 27, 2012 at 4:41pm — 2 Comments

मोहब्बतों की दुनिया

मत लुटना मीठी मुसकानों पर,

ये जिस्मों की एक बनावट हैं,

कंकरीले-पथरीले रास्तों का हैं सफर,

ऊपर फूलों की बस सजावट हैं,…

Continue

Added by Vasudha Nigam on September 27, 2012 at 1:30pm — 1 Comment

चालाक खुदा

चालाक खुदा 
 

खुदा बहुत ही चालाक है

अपनें सर कुछ नहीं लेता
इंसान खुद मौत की मांगे दुआ
इतना बेबस कर देता 
जवानी में जीने की चाह
मांगता खुदा से यह इंसान 
बुढ़ापे में बस मौत ही मांगे
बन जाता दाता का काम
चक्रव्यूह सा यह कालचक्र है
बार बार फँसता इंसान
भगवान नचाता कठपुतली सा
नाचता रहता है इंसान 
नाचता…
Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on September 27, 2012 at 11:12am — 2 Comments

Monthly Archives

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Neelam Dixit commented on Neelam Dixit's blog post गीत- नेह बदरिया नीर नदी बन
"आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी सादर नमस्कार मेरे उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार।"
5 hours ago
बसंत कुमार शर्मा commented on Neelam Dixit's blog post गीत- नेह बदरिया नीर नदी बन
"आदरणीया नीलम दीक्षित जी सादर नमस्कार  अच्छा श्रंगार गीत हुआ हुआ  कहीं कहीं टंकण…"
12 hours ago
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post प्यार से भरपूर हो जाना- ग़ज़ल
"आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार , आपकी हौसलाअफजाई के लिए…"
12 hours ago
PHOOL SINGH commented on PHOOL SINGH's blog post रानी अच्छन कुमारी
"लक्ष्मण मेरा उत्साह वर्धन करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद "
13 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post तेरे ख्वाहिशों के शह्र में- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, उसका भाव यह है कि अब राम जैसा सात्विक मत बनाना।"
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on PHOOL SINGH's blog post रानी अच्छन कुमारी
"आ. भाई फूलसिंह जी, महत्वपू्ण ऐतिहासिक जानकारी की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई ।"
14 hours ago
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव posted a discussion

ओबीओ लखनऊ-चैप्टर की साहित्य-संध्या माह जून 2020–एक प्रतिवेदन  :: डॉ. गोपाल नारायन श्रीवास्तव

ओबीओ लखनऊ-चैप्टर की ऑनलाइन मासिक काव्य गोष्ठी 21 जून 2020 (रविवार) को हुई I सभी उत्साही सुधीजनों ने…See More
16 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
शिज्जु "शकूर" commented on शिज्जु "शकूर"'s blog post ज़िन्दगी गर मुझको तेरी आरज़ू होती नहीं(ग़ज़ल)
"आदरणीय बसंत कुमार शर्मा सर आपका बहुत बहुत शुक्रिया"
16 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
शिज्जु "शकूर" commented on शिज्जु "शकूर"'s blog post ज़िन्दगी गर मुझको तेरी आरज़ू होती नहीं(ग़ज़ल)
"आदरणीय सुरेंद्रनाथ जी आपका तहेदिल से शुक्रिया, प्रयास रहेगा कि दोबारा सक्रियता के साथ हिस्सा…"
16 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
शिज्जु "शकूर" commented on शिज्जु "शकूर"'s blog post ज़िन्दगी गर मुझको तेरी आरज़ू होती नहीं(ग़ज़ल)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया, कोशिश करूंगा कि नियमित रह सकूं।"
16 hours ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post ग़ज़ल- रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों पर
"आद0 लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी सादर अभिवादन ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और प्रतिक्रिया का हृदयतल से आभार…"
16 hours ago
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post ग़ज़ल- रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों पर
"आद0 तेजवीर सिंह जी सादर अभिवादन। ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार निवेदित…"
16 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service