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June 2013 Blog Posts (217)

एक बंजर व्योम तो हम पर तना है !

अपरिचय, संवेदना है, भावना है ,

उसे क्या जो पुष्प से पत्थर बना है !



मिले उनको हर्ष के बादल घनेरे ,

एक बंजर-व्योम तो हम पर तना है !



चित्र है उत्कीर्ण कोई चित्त पर ,

ठहर जाती जहां जाकर कल्पना है !



सूर्य की ये रश्मियाँ बंधक बनीं हैं 

एक अंधी कोठरी मे ठहरना है !



रास्ते अब स्वयं ही थकने लगे हैं 

पूछता गंतव्य मन क्यों अनमना है ?



_______________________प्रो. विश्वम्भर…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 30, 2013 at 10:57pm — 22 Comments

कैलकुलेटर

कैलकुलेटर

‘’सुनती हो बेगम! सोने का दाम मार्केट में बहुत गिर गया है’’

‘’तो मैं क्या करूँ मियाँ?’’

‘’अजी बेगम जल्दी से तैयार हो जाओ ,मार्केट चलते हैं आज तुम्हें सोने से लाद दूँगा’’

‘’क्या.....?’’ राधा मुँह बाये हाथ में करछी पकड़े पति के पास आयी जो बरामदे में बैठा अखबार पढ़ रहा था.

‘’क्या कहा आपने? मुझे सोने से लादोगे? एक जोड़े कंगन के लिये तो सारी जिंदगी तरस गयी.’’ इतना कहकर राधा अपनी नाराज़गी जताती हुई दुबारा रसोईघर में चली गयी.

महिपाल पत्नी को मनाने के लिये उसके…

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Added by coontee mukerji on June 30, 2013 at 9:24pm — 16 Comments

जुदाई

जब तू था तो सूनापन नही था

इच्छा थी पर अरमान नही था 

अश्कों में भिगो लिया दामन मैंने 

प्यासी रहूंगी फिर भी सोचा नही था...

तेरी यादों से दिन बनते थे 

और जुदाई से काली रातें

तेरे प्यार से ज़िन्दगी बनी थी

और बेवफाई से उखड़ी सांसे...

तेरे गम से मेरा गम जुदा कब था

तू नही समझा बस यही गम था

छीन लिया समय से पहले रब ने

जुदाई का गम क्या पहले कम था...

"मौलिक व…

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Added by Aarti Sharma on June 30, 2013 at 7:30pm — 16 Comments

दोहे

जल बिन सब बेजान हैं ,धरती कहे पुकार

बरखा देखो आ गई ,लेकर सुखद फुहार

घाव धरा के भर गए , ग्रीष्म हो गया लुप्त

जल फैला चहुँ ओर है ,धरा हो गई तृप्त



बरखा लेकर आ गई ,राहत और सुकून

दिल्ली भी अब बन गई ,देख देहरादून…

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Added by Sarita Bhatia on June 30, 2013 at 6:00pm — 9 Comments

तीन मुक्तक - लक्ष्मण लडीवाला

मुक्तक 
एकाकीपन सांझ का, चंचल मन भटकाय
इस पड़ाव पर उम्र के,बनता कौन सहाय 
सुन्दर हर पल वह घडी,अनुपम सा उपहार 

साँस साँस की हर लड़ी,मुग्ध मुझे करजाय |


(2)
 
बिगड़ न जावे और ये, जीवन के हालात 

वर्षा जल भूजल करे, तभी बनेगी बात |

हरियाली वसुधा रहे, नदियों में जलधार,

पनघट…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 30, 2013 at 12:30pm — 15 Comments

देखो चुपके से रात चली है [नज़्म]

चाँद सितारों संग, महकी बहारों संग,

देखो चुपके से रात चली है ।

गहरी खामोशी में, ऐसी मदहोशी में ,

दिल में फिर तेरी बात चली है ।

चाँद का जब दीदार करूँ तो ।

दिल के झरोखे से प्यार करूँ तो ।

यादों की महकी बारात चली है ।

पूछो ना काटी कैसे तनहाई ।

याद जो आये वो तेरी जुदाई ।

आँखों से मेरे बरसात चली है ।

थाम के बाहें बाहों में ऐसे ।

चले दो राही राहों में ऐसे ।

जैसे संग सारी कायनात चली है ।

प्यार…

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Added by Neeraj Mishra "प्रेम" on June 30, 2013 at 12:00pm — 15 Comments

ग़ज़ल

वेदियों सा तप्त मन अपने लिए

कर रहा सारे हवन अपने लिए



अपनेपन को छोड़ मतलब साधते

दोस्त का होता चयन अपने लिए



मूढ़ मन में मैल ले गंगा नहा

कर रहा है आचमन अपने लिए



तितलियों को हांक कर भंवरे कहें

फूल कलियाँ हैं चमन अपने लिए



देश की है फ़िक्र किस इंसान को

हर कहीं चिंतन मनन अपने लिए



हिंदियों की नाक ऊँची कर रहा

पश्चिमी का ला चलन अपने लिए



आँख दिखलाता है वो माँ बाप को

संस्कृति का कर हनन अपने लिए…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 30, 2013 at 10:30am — 6 Comments

सिर्फ तुम्हारे लिए

तेरे अधरों की मुस्कान,

भरती मेरे तन में प्राण.

जीवन की ऊर्जा हो तुम,

साँसों की सरगम की तान.

मैं सीप तुम मेरा मोती ,

मैं दीपक तुम मेरी ज्योति.

कभी पूर्ण न मैं हो पाता ,

संग मेरे जो…

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Added by Pradeep Bahuguna Darpan on June 30, 2013 at 9:00am — 20 Comments

रविवार ....

कल रविवार था ... 

फिर उदास, सूनी शाम थी ... 

देख रहा था

हल्की बारिश जो 

सब कुछ भिगो रही थी 

सामने पंछी रोशनदान 

मे छिपने का प्रयास कर रहे थे 

हवाएँ तेज चल रहीं थी 

जो आँधी, रुकने के बाद भी 

आँधी चलने का एहसास करा रही थी 

मैं खड़ा अपने आपको खोज रहा था 

सब कुछ फैला हुआ, तितर बितर था 

अतीत के पन्ने अब भी 

हवा मे तैर रहे थे 

कुछ गीले, कुछ फटे 

कुछ बिखरे पड़े थे 

सब कुछ ठहर गया…

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 30, 2013 at 8:00am — 10 Comments

गीतिका ~

शौक है , अजीब लगता है,

दर्द कोई  रकीब लगता है !

रोज तरसा है मुस्कुराने को 

चेहरे-चेहरा गरीब लगता है !

ये गम हैं कि छोड़ते ही…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 29, 2013 at 7:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल - यूं ही आने वाला वक्त बदलता नहीं|

वैसे तो वक्त किसी के लिए ठहरता नहीं,

उसे रोके बिना दिल हमारा भी भरता नहीं|

आने वाले पलों को खुशामदीद आज करलें

यूं ही तो आने वाला वक्त बदलता नहीं|

क़दमों की गर्मी से पहाड़ को बना दें पानी

रंगीनियों में तो बर्फ भी पिघलता नहीं|…

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Added by Chandresh Kumar Chhatlani on June 29, 2013 at 6:00pm — 10 Comments

****तुम हो आँखों में ऐसा लगता क्यूँ है****

तुम हो ख्वाबों में ऐसा लगता क्यूँ है

अब हो यादो में ऐसा लगता क्यूँ है…

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Added by Atendra Kumar Singh "Ravi" on June 29, 2013 at 2:00pm — 4 Comments

पीड़ा

मैंने देखा है ज़िन्दगी को पास से 

मैंने सुना है  उन आंसुओं की  हर एक अवाज  को 
जो चुप चाप मन में घोर विषाद लिए निकल रहे हैं 
मैंने देखा है एक रोटी के लिए बिलखते मासूमों को,
जिन्होंने ज़िन्दगी का प्रथम चरण भी नहीं देखा 
जिन्हें मा कहना भी ढंग से नहीं आता,
सच बहुत दुःख होता है इनको देखकर,
क्यों ऐसा होता है ?
 
क्या…
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Added by Devendra Pandey on June 29, 2013 at 12:29pm — 12 Comments

"गज़ल-ए-जिंदगी"

मुझसे मेरी हयात ऐसी दिल्लगी करे

मंजिल का मेरी फैसला आवारगी करे



तुझसे भी हैं ज़रूरी दुनिया में और काम

सब को भुला के कौन तेरी बंदगी करे



बेपीर बेमुरव्वत मुझसे न पूंछ कुछ भी

मेरा बयान-ए-हाल ये बेचारगी करे



मुद्दत से थोड़े ख्वाब सहेजे हैं आँख में

की इंतज़ार-ए-आब जैसे तिश्नगी करे



हर रोज सबसे छुप कर किसकी हैं ये दुआएं

शामों में आफताब सी ताबिन्दगी करे



रोऊँ तो ये हंसाए, हँसता हूँ तो रुलाए

मुझको यूँ परेशान मेरी जिंदगी… Continue

Added by Anurag Singh "rishi" on June 29, 2013 at 12:13pm — 13 Comments

मेरा मन

जाने क्यो उदास है

मेरा मन

जाने क्यों निराश है

मेरा मन

जाने क्यों हताश है

मेरा मन

अधरों से फूटते नही बोल

घुटन सी होती है इस मन में

चुभन सी होती है इस तन में

चंचलता से भरा मेरा मन

जाने क्यों उदास है

लगता है ऐसे कोई नही

अपना आस-पास है

अपनों को खोजता ये मन

लिए तड़पन, लिए लगन

आँसूओं की धारा में

गुम-सुम हुआ मेरा मन

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Pragya Srivastava on June 29, 2013 at 11:13am — 15 Comments

होवे हृदयाघात यदि, नाड़ी में अवरोध-

होवे हृदयाघात यदि, नाड़ी में अवरोध ।

पर नदियाँ बाँधी गईं, बिना यथोचित शोध ।

बिना यथोचित शोध, इड़ा पिंगला सुषुम्ना ।

रहे त्रिसोता बाँध, होय क्यों जीवन गुम ना ।

अंधाधुंध विकास, खड़ी प्रायश्चित रोवे ।

भौतिक सुख की ललक, तबाही निश्चित होवे ।।

त्रिसोता = गंगा जी

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on June 29, 2013 at 10:50am — 9 Comments

रिश्ता

रिश्ता.... 

ख्वाब नहीं है 

ये मेरा ख्याल नहीं है 

ये तेरा सवाल नहीं है 

रिश्ता ..... 

किसी  के लिए चाँद है …

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 28, 2013 at 10:00pm — 17 Comments

नेता रह मत भूल में, मत-रहमत अनमोल

मत की कीमत मत लगा, जब विपदा आसन्न ।

आहत राहत चाहते, दे मुट्ठी भर अन्न ॥

आहत राहत-नीति से, रह रह रहा कराह |

अधिकारी सत्ता-तहत, रिश्वत रहे उगाह ॥

घोर-विपत आसन्न है, सकल देश है सन्न ।

सहमत क्यूँ नेता नहीं, सारा क्षेत्र विपन्न ॥

नेता रह मत भूल में, मत-रहमत अनमोल |

ले जहमत मतलब बिना, मत शामत से तोल ॥

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on June 28, 2013 at 4:44pm — 8 Comments

न आये लौट के

रूठकर गयी थी सुबह मुझसे 

रात का दर्पण दिखा कर 
फिर लौट आयी है सुबह !!.
.
रूठकर गयी थी बहार मुझसे 
पतझड के पत्ते उड़ा कर 
फिर लौट आयी है फिजा !!…
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Added by Sumit Naithani on June 28, 2013 at 3:30pm — 16 Comments

बारिश की बूंदे

प्यासी धरती पर 

बरसती थी जब 
बारिश की बूंदे 
सोंधी - सोंधी सी खुशबु से 
महक उठता था ......
मेरे घर का आँगन .....
खिल उठते थे बगीचे में 
लगे पेड़ - पोधे .....
और खिल उठता था 
हम सब का मन ......
प्यासी धरती पर 
बरसती थी जब 
बारिश की बूंदे ........
घर के बाहर बहता था वो 
छोटा सा दरिया ......
अक्सर चला करती थी…
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Added by Sonam Saini on June 28, 2013 at 1:11pm — 12 Comments

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