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ग़ज़ल - यूं ही आने वाला वक्त बदलता नहीं|

वैसे तो वक्त किसी के लिए ठहरता नहीं,

उसे रोके बिना दिल हमारा भी भरता नहीं|

आने वाले पलों को खुशामदीद आज करलें

यूं ही तो आने वाला वक्त बदलता नहीं|

क़दमों की गर्मी से पहाड़ को बना दें पानी

रंगीनियों में तो बर्फ भी पिघलता नहीं|

तूफानों से कतरा कर निकलते हैं तिनके

जिस्म वो है किसी दर्द में सिमटता नहीं|

जांबाज़ खेलते हैं आने वाली सदीयों से

आज के पलों से अब मन बहलता नहीं|

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 3, 2013 at 9:50pm

अरुन कुमार जी, मध्यम बहर पर ही आधारित है

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 3, 2013 at 9:50pm

विजय मिश्र जी, बहुत बहुत धन्यवाद आपकी बधाई के लिए

 

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 3, 2013 at 9:49pm

जीतेन्द्र पस्तारिया जी, बहुत शुक्रिया आपने इसे पसंद किया

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 3, 2013 at 9:48pm

डॉ बब्बन जी, आपकी दाद के लिए तहे दिल से शुक्रिया 

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 3, 2013 at 9:48pm

हरीश उप्रेति जी, बहुत शक्रिया आपकी दाद के लिए 

Comment by अरुन शर्मा 'अनन्त' on July 1, 2013 at 1:20pm

आदरणीय कृपया ग़ज़ल की बहर बता दें ताकि कुछ कहने में आसानी हो सके. सादर

Comment by विजय मिश्र on July 1, 2013 at 11:55am
"जिस्म वो है किसी दर्द में सिमटता नहीं|" -- यह टुकड़ा चाँद सा है , चंद्रेशजी ,बधाई .
Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 1, 2013 at 1:28am
"आने वालेपलोंकोखुशामदीदआजकरलें

यूंहीतोआने वालावक्तबदलतानहीं|

क़दमोंकीगर्मीसे पहाड़ कोबनादें पानी

रंगीनियोंमें तोबर्फ भीपिघलतानहीं|"....आदरणीय....चन्द्रेश जी, सुंदर गजल के लिए शुभकामनाऐं
Comment by Dr Babban Jee on June 30, 2013 at 4:18pm

Ati Sundar !

Comment by Harish Upreti "Karan" on June 30, 2013 at 4:05pm

सुन्दर रचना......

 

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