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स्वावलम्बी (लघुकथा)

“अरे यार! हद्द है ये तो, अब क्या इसके हाथ का खाना पड़ेगा?”

लोकल ट्रेन में बैठे एक व्यक्ति ने कहा। एक किन्नर इडली-सांभर के डिब्बों का थैला लिए डिब्बे में घूम रहा था| उसकी आवाज़ और उसके हाव-भाव से लोग उसकी ओर आकर्षित तो हो रहे थे | पर उससे सामान कोई नहीं खरीद रहा था| एक मनचले ने कहा, “ क्यों बे हिजड़े अब हमारे ऐसे दिन आ गए हैं कि ...|”

किन्नर ने उसके प्रतिउत्तर में कहा, “ क्यों रे? क्या तू किसी और तरह का अन्न खाता है?|

मनचले ने घृणा से उसकी ओर देखा|

किन्नर ने गुस्से से ताली बजायी और कहा,” क्यों बे भूतनी के, मैं अपनी मर्ज़ी से अपने पैरों पर खड़ा हो रहा हूँ, तुझे क्यों पेट में दर्द हो रहा है? हाँ नहीं बजानी मुझे ताली... नहीं मांगनी मुझे भीख... तुझे तो...|”


अब तक तो ट्रेन के इस डिब्बे में थर्ड जेंडर को इस व्यवसाय में देख, लोगों के बीच कौतुहल का विषय बन गया था |

मनचला तो अपने स्टेशन पर उतर गया| किन्नर अब भी अपने सामान को बेचने के लिए प्रयास कर रहा था|

एक सीट पर एक बच्चा अपनी माँ से सट कर बैठा हुआ था, और शरारतन वह भी किन्नर की स्टाइल में ताली बजा रहा था|


उस बच्चे की हरकतों ने किन्नर का ध्यान आकर्षित किया और वह उस औरत के पास पहुँच गया, “अम्माँ! तू तो ले ले, तेरा बच्चा तो हमारी बिरादरी का लग रहा है, तू तो समझ सकती है अन्न तो सबके लिए समान होता है।”

उस औरत ने आस-पास वालों को देखा जो उस किन्नर और उसके बच्चे को निहार रहे थे और आपस में खुसुर-फुसुर कर रहे थे|

बच्चे को भी भूख लगी थी, वह माँ की ओर देख रहा था| माँ ने इडली-सांभर ख़रीदा और अपने बच्चे को दिया|

उस किन्नर ने उस माँ से पूछा, “इसको हमारे समाज में क्यों नहीं दिया? तू कहे तो मैं कल आ जाती हूँ घर अपने मुखिया को लेकर...।

“न, अभी तो तुमने कहा अन्न में फ़र्क़ नहीं, तो हममें और तुममें फ़र्क़ क्यों...? और मैंने इसको पुरे नौ महीने कोख में रखा है...| प्रसव-पीड़ा के बाद ही इसका जन्म हुआ है, क्या हुआ जो ये... तो क्या यह मेरा बच्चा नहीं?” माँ अपना पक्ष रख रही थी, लोग उसकी बातों को ध्यान से सुन रहे थे|
बच्चा बड़े चाव से इडली-सांभर खा रहा था| माँ उसको निहार रही थी, किन्नर ने प्यार से उसको एक और इडली दे दी, बच्चा कृताग्यापुर्वक उसको देख रहा था|
आस-पास के लोग यह सब देख रहे थे, उनकी खुसुर-फुसुर अब भी चल रही थी|

किन्नर ने माँ से कहा, “ अम्मा ! हमारा अपना एक समाज है, तू इस बच्चे को हमें दे दे, हम इसकी परवरिश करेंगे|”

“क्यों? तुम लोग क्यों करोगे मेरे बच्चे की परवरिश? मैं अपना बच्चा किसी को नहीं दूँगी...|” कहते हुए उसने अपने बच्चे को छाती से लगा लिया |


किन्नर की आँखों से अश्रु बह रहे थे, “सच कहा अम्माँ, न अन्न-अन्न में फ़र्क़ नहीं होता न इंसान-इंसान में, पर काश! इस फर्क को दूर करने वाली आप जैसी अम्मा सब को मिल जाती|” यह कहते हुए उसने उस माँ के चरण छुए|

अनायास ही माँ का हाथ उस किन्नर के सर पर चला गया| किन्नर के अश्रु अब भी बह रहे थे, उसने बच्चे को प्यार किया और वह अपना सामान लिए आगे बढ़ गया|


डिब्बे में बैठे मुसाफ़िर अब इस छोटे किन्नर को देख रहे थे और अब वह चर्चा का विषय बन गया था। पर उसकी माँ उसको सीने से लगाए गौरव का अनुभव कर रही थी।

मौलिक एवं अप्रकाशित।

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Comment by विनय कुमार on December 27, 2018 at 6:03pm

बहुत बढ़िया विषय उठाया है आपने इस लघुकथा में, प्रस्तुति में कहीं कहीं थोड़ी नाटकीयता आ गयी है जिसे दुरुस्त किया जा सकता है. किन्नर भी तो इंसान ही हैं और उनको भी अपने ढंग से जीने का हक़ है. बहरहाल बहुत बहुत बधाई इस गंभीर विषय पर लिखने के लिए आ कल्पना भट्ट साहिबा

Comment by babitagupta on December 27, 2018 at 3:27pm

बहुत ही मार्मिक, संवेदना भरी रचना,विक्षिप्त सोच को आइना दिखाती ।बेहतरीन रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिएगा, आदरणीया कल्पना दी।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 24, 2018 at 11:13pm

धन्यवाद आदरणीय फूल सिंह जी| 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 24, 2018 at 11:12pm

धन्यवाद आदरणीया नीलम उपाध्याय जी| 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 24, 2018 at 11:12pm

नमस्ते आदरणीय समर भाई ! आपको लघुकथा लम्बी लगी, मैं पुनः इसको लिखने का प्रयास करुँगी| सादर|

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 24, 2018 at 11:11pm

धन्यवाद आदरणीय शहजाद जी|

Comment by PHOOL SINGH on December 24, 2018 at 2:42pm

सच्चाई को बयां करती अच्छी लघु कथा बधाई स्वीकारें

Comment by Neelam Upadhyaya on December 24, 2018 at 11:52am

बहुत ही मार्मिक कथा बनी है।  प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई। 

Comment by Samar kabeer on December 23, 2018 at 8:49pm

बहना कल्पना भट्ट रौनक़ जी आदाब,लघुकथा का प्रयास अच्छा है,लेकिन लघुकथा कुछ तवील(लम्बी)हो गई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 22, 2018 at 9:20pm

बहुत बढ़िया मार्मिक रचना। हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना भट्ट साहिबा।

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