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2122 2122 2122 212
वो तेरा छत पर बुलाकर रूठ जाना फिर कहाँ ।
वस्ल के एहसास पर नज़रें चुराना फिर कहाँ ।।

कुछ ग़ज़ल में थी कशिश कुछ आपकी आवाज थी ।
पूछता ही रह गया अगला तराना फिर कहाँ ।।

आरजू के दरमियाँ घायल न हो जाये हया ।
अब हया के वास्ते पर्दा गिराना फिर कहाँ ।।

कातिलाना वार करती वो अदा भूली नहीं ।
शह्र में चर्चा बहुत थी अब निशाना फिर कहाँ ।।

तोड़ते वो आइनों को बारहा इस फिक्र में ।
लुट गया है हुस्न का इतना खज़ाना फिर कहाँ ।।

था बहुत खामोश मैं जज़्बात भी खामोश थे ।
पढ़ लिया उसने मेरे दिल का फ़साना फिर कहाँ ।।

खो गए थे इस तरह हम भी किसी आगोश में ।
याद आया वो ज़माना पर ठिकाना फिर कहाँ ।।

उम्र की दहलीज पर यूँ ही बिखरना था मुझे ।
वो लड़कपन ,वो जवानी, दिन पुराना फिर कहाँ ।।

ढल चुकी हैं शोखियाँ अब ढल चुके अंदाज भी ।
अब हवाओं में दुपट्टे का उड़ाना फिर कहाँ ।।

हुस्न की जागीर पर रुतबा था उसका बेमिशाल।
झुर्रियों की कैद में अब भाव खाना फिर कहाँ ।।

मैकदों के पास जब ग़ुज़रा तो ये आया खयाल ।
सरबती आंखों से अब पीना पिलाना फिर कहाँ ।।

नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

Views: 575

Comment

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Comment by Naveen Mani Tripathi on September 2, 2017 at 2:13pm
आ0 गिरिराज भंडारी साहब सादर आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 2, 2017 at 2:12pm
आ0लक्ष्मण धामी जी सादर आभार
Comment by Naveen Mani Tripathi on September 2, 2017 at 2:11pm
आ0 कबीर सर सादर आभार
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 2, 2017 at 12:04pm
सुंदर, हार्दिक बधाई ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 30, 2017 at 8:43pm

आदरणीय नवीन भाई , अच्छी गज़ल खी है बधाइयाँ स्वीकार करें । आदरनीय समर भाई जी की सलाहों पर गौर कीजियेगा ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 28, 2017 at 6:19pm

बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने आदरणीय | हार्दिक बधाई |

Comment by Samar kabeer on August 28, 2017 at 2:24pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
10वें शैर के ऊला में 'बेमिशाल' को "बे मिसाल" करलें ।
आख़री शैर का ऊला मिसरा यूँ कर लें :-
'मैकदे की राह से गुज़रा तो ये आया ख़याल'
और सानी मिसरे में 'सरबती' को "शरबती" कर लें ।
Comment by नाथ सोनांचली on August 28, 2017 at 1:42pm
आद0 नवीन जी उम्दा ग़ज़ल पर बधाई
Comment by Mohammed Arif on August 28, 2017 at 10:48am
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब, बेहतरीन, लाजवाब ग़ज़ल के लिए हार्दक बधाई स्वीकार करें ।।बाक़ी गुणीजन अपनी अमूल्य राय देंगे ।

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