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माना कि तेरे दिल की इनायत भी बहुत थी ।
पर साथ इनायत के हिदायत भी बहुत थी ।।

आते थे वो बेफिक्र मेरे शहर में अक्सर ।
तहजीब निभाने की रवायत भी बहुत थी ।।

महंगे मिले हैं लोग मुहब्बत के सफ़र में ।
यह बात अलग है कि रिआयत भी बहुत थी।।

चेहरे को पढा उसने कई बार नज़र से ।
महफ़िल में तबस्सुम की किफ़ायत भी बहुत थी ।।

वो हार गए फिर से अदालत में सरेआम ।
हालाकि नजीरों की हिमायत भी बहुत थी ।।

छूटी हैं किताबें भी वही उस से अभी तक ।
जिस पर लिखी कुरआन की आयत भी बहुत थी ।।

क्यों पूछ रहे हैं मेरे दिल का वो फ़साना ।
उनको तो मुहब्बत से शिकायत भी बहुत थी ।।

---नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 24, 2017 at 12:36pm

आदरनीय नवीन भाई , अच्छी ग़ज़ल हुई है , आदरणीय समर भाई जी की सलाहों कर गौर कीजियेगा ।

Comment by नाथ सोनांचली on August 24, 2017 at 5:33am
आद0 नवीन मणि जी सादर अभिवादन, ग़ज़ल पर दाद और मुबारकबाद पेश करता हूँ।
Comment by Mohammed Arif on August 23, 2017 at 11:05pm
आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी ने आदाब, अच्छी ग़ज़ल, अच्छे अश'आर । मुबारकबाद क़ुबूल करें । आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की बातों पर ग़ौर करें ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 23, 2017 at 2:33pm
हार्दिक बधाई....
Comment by Samar kabeer on August 23, 2017 at 2:21pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
'माना कि तेरे दिल की इनायत भी बहुत थी
लेकिन गिला के साथ हिदायत भी बहुत थी'
ऊला मिसरे में जब इनायत बहुत थी,तो सानी मिसरे में 'गिला'किस बात का,सानी मिसरा यूँ कर सकते हैं,रवानी भी बढ़ जायेगी :-
'पर साथ इनायत के हिदायत भी बहुत थी'
तीसरे शैर में 'रियायत'ग़लत है,सही शब्द है "रिआयत" ।
'चहरे को पढ़ा था वो बहुत बार नज़र से'
इस मिसरे में रवानी नहीं है,इसे यूँ कर सकते हैं :-
'चहरे को पढ़ा उसने कई बार नज़र से'
छटे शैर में भाव स्पष्ट नहीं हैं ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 23, 2017 at 10:38am
आ0 रवि शुक्ल जी सादर आभार ।
Comment by Naveen Mani Tripathi on August 23, 2017 at 10:37am
भाई मोहित मिश्रा जी सादर आभार
Comment by Ravi Shukla on August 23, 2017 at 10:13am

आदरणीय नवीन मणि जी बहुत ही अच्‍छी गजलकही आपने दाद और मुबारक बाद पेश है । चेहरे को पढा था वो ये वाक्‍य कुछ असहज सा लग रहा है ।  सादर

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