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मापनी 2122 2122 2122 212

 

कैद  हैं  धनहीन तो, जो सेठ है, आजाद  है

झुग्गियों की लाश  पर  बनता यहाँ प्रासाद है

 

थाम कर दिल मौन कोयल डाल पर बैठी हुई,

तीर लेकर हर  जगह बैठा हुआ सय्याद है

 

भाईचारा प्रेम  सब बातें किताबी हो  गईं,

हो रही  बेघर मनुजता, फैलता अतिवाद है

 

जन्म  रोजाना  यहाँ पर ले रहे राक्षस कई,  

पल रहीं हैं होलिकाएँ जल रहा प्रहलाद है  

 

है समुन्दर तो लबालब, पर नदी सूखी हुई,

और हम सब कह रहे हैं ये धरा आबाद है.

 

घात से प्रतिघात से हल, मित्र निकलेगा नहीं.

युद्ध  से  बेहतर  हमेशा ही  रहा  संवाद  है.

 

खत्म होना चाहिए अब नफरतों का सिलसिला,

प्रेम पर  होती  टिकी हर देश की बुनियाद है

"मौलिक एवं अप्रकाशित" 

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Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 23, 2017 at 4:08pm

आदरणीय रवि शुक्ला जी राक्षस को का विकल्प दानव एकदम सही सुझाया आपने, तो शब्द को भी बदलकर इस प्रकार कह सकते हैं 

कैद हैं धनहीन सारे, सेठ बस आजाद है, शायद पसंद आये आपको  

इसी तरह मार्गदर्शन करते रहिये, सादर नमन आपको 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 23, 2017 at 4:04pm

आदरणीय Samar kabeer जी ग़ज़ल को आपने अपना अमूल्य समय दिया दिल सेउक्रिया आपका, आपके कथन का मैं सम्मान करता हूँ, एक नई जानकारी और शब्दों के प्रयोग से अवगत हुआ.

यहाँ मैंने कोयल को मैंने नारी के प्रतीक और सैयाद को शैतानों के प्रतीक में लिया था, इसे शेर को और बेहतर तरीके से कहने का प्रयास करता हूँ. इस मंच की एक बहुत अच्छी बात है कि सभी वरिष्ठ जन खुलकर मार्गदर्शन करते हैं. 

सादर नमन मंच को और आपको 

Comment by Ravi Shukla on August 22, 2017 at 5:14pm

आदरणीय बसंत कुमार जी आपकी अच्‍छी गजल पढ़ी बहुत बहुत बधाई स्‍वीकार करें ।

चौथे शेर में हिरण्‍य कश्‍यप के लिये राक्षस का बिम्‍ब लिया है आपने अगर लय के अनुसार दानव करें तो क्‍या आपके भाव में कोई अंतर पड़ेगा ।

6ठा शेर बहुत ही अच्‍छा और सकारात्‍मक सोच को बढ़ावा देता लगा पुन: बधाई

मतले के उला के दूसरे रुक्‍न मे तो शब्‍द कुछ असहज कर रहा है । अगर उचित लगे तो इसे और भी बेहतर कर सकते है

एक्‍ त्‍वरित सुझाव मात्र है   कैद मे धनहीन केवल सेठ ही आजाद है ।

आदरणीय समर साहब इस गजल के हवाले से एक नई बात पता चली कोयल को मांसाहारी भी नहीं खाते । आभार ।

Comment by Samar kabeer on August 21, 2017 at 6:48pm
जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
'थाम कर दिल मौन कोयल डाल पर बैठी हुई
तीर लेकर हर जगह बैठा हुआ स्य्याद् है'
इस शैर के ऊला मिसरे में 'कोयल'शब्द तार्किकता के हिसाब से ग़लत है,क्योंकि 'कोयल' का कोई शिकार नहीं करता,उसे मारकर कुछ हासिल नहीं होता उसे तो मांसाहारी भी नहीं खाते,इस लिए ऊला मिसरा यूँ करना उचित होगा :-
"थाम कर दिल मौन पक्षी डाल पर बैठा हुआ"
Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 21, 2017 at 4:03pm

आदरणीय laxman dhami  जी आपका दिल से शुक्रिया 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 20, 2017 at 9:15pm
आ. भाई बसंत जी गजल सुंदर हुई है । हार्दिक बधाई ।
Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 20, 2017 at 7:31pm

आदरणीय Ajay Kumar Sharma जी ह्रदय से आभार आपका 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on August 20, 2017 at 7:30pm

आदरणीय Sheikh Shahzad Usmani  जी आपके प्रतिसाद को सादर नमन 

Comment by Ajay Kumar Sharma on August 20, 2017 at 11:11am
बहुत शानदार गजल...
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 19, 2017 at 7:17pm
समसामयिक परिदृश्य व ज्वलंत मुद्दों पर बेहतरीन अशआर के लिए बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी। ऐसा लगा कि कुछ और अशआर पाठक को चाहिए। समस्याओं के साथ समाधान भी बताना बहुत बढ़िया है, सबसे फरियाद है !

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