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ताकत .....

"क्या बात है रामदेव जी। आज बहुत  उदास लग रहे हो ।"" दीनानाथ जी ने चाय पीते- पीते पूछा ।

"दीनानाथ जी आजकल किसी को कुछ कहने का जमाना नहीं है ।" रामदेव ने कहा ।

"क्या हुआ कुछ बताओ तो।" दीनानाथ जी बोले ।

"अरे कल रात की ही बात है । आधी रात को सड़क बनाने वाले इंजन की आवाज़ सुनकर हमारी नींद उखड़ गई । बाहर  आकर देखा तो रोड रोलर हमारी गली के कोने की दुकान के सामने की सड़क के छोटे से टुकड़े पर डामरीकरण कर रहे थे ।" रामदेव जी बोले जा रहे थे ।

"फिर क्या हुआ रामदेव जी ।"

"फिर हमने दीनानाथ जी  उनसे  अनुरोध किया कि भाई ये हमारे गेट के सामने सड़क पर छोटा सा गढ्ढा है, इसे भी भर दो ।यहाँ आँगन धोने पर पानी इकट्ठा हो जाता है ।" रामदेव जी ने कहा ।

"फिर गढ्ढा भर गया क्या ?" दीनानाथ जी बोले ।

"अरे कहाँ ।वो हमें आश्वासन दे कर  अपने काम में लग गये ।हम थोड़ी देर तक देखते रहे पर वो हमारे घर के  आगे से निकल गए पर गढ्ढा नहीं भरा  और दो घर छोड़कर ही वार्ड पार्षद के घर के सामने कच्चे फुटपाथ का डामरीकरण करने लगे जहाँ पर  उनकी कार पार्क होनी थी ।" रामदेव बोले ।

"तुमने पार्षद से क्यों नहीं कहा ।"दीनानाथ जी ने कहा ।

"हमने कहा तो बोले रामनाथ जी बजट  आने दो , सबसे पहले आपके सामने वाले गढ्ढे का डामरीकरण करवाएंगे। ये कहकर वो अपने घर चले गए ।हम भौंचके से सोचते रह गए कि सरकार की सबसे छोटी इकाई का एक ही मोहल्ले में बरसों साथ रहकर ये हाल है कुर्सी पर पदासीन नेताओं का क्या हाल होगा ।" रामदेव जी धीरे से बोले ।

"यार दीनानाथ कुर्सी की ताकत कैसे यथार्थ को बेरहमी से कुचल देती है , ये आज हमने देखा । यहाँ सिर्फ मैं , मेरा परिवार का स्वार्थ चलता है यारी दोस्ती पड़ोस सब संबंध व्यर्थ हैं ।" रामदेव जी ने कहा ।

दीनानाथ जी सहमति के  अन्दाज़ में  सिर हिलाते हुए उठे और सोचते हुए चल पड़े कि अगर बाड़ ही खेत खाने लगे तो देश की समस्याओं का हल कैसे होगा ।

सुशील सरना / 30-4-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Sushil Sarna on May 10, 2022 at 8:18pm
आदरणीय समर कबीर जी, आदाब, सृजन पर आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया एवं सुझाव का दिल से आभार ।
Comment by Samar kabeer on May 9, 2022 at 6:32pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब, लघुकथा का प्रयास अच्छा हे , लिखने से पहले पटल पर मौजूद आलेखों का अध्यन ज़रूर करना था , शेष जनाब उस्मानी जी कह चुके हैं I 

Comment by Rachna Bhatia on May 6, 2022 at 11:51am

आदरणीय सुशील सरना जी , मैं समीक्षा करने के लायक़ तो नहीं हूँ।

पर समय मिलते ही अपनी सोच के अनुसार इस लघुकथा को लिखने की कोशिश ज़रूर करूँगी। सादर।

Comment by Sushil Sarna on May 3, 2022 at 12:04pm
आदरणीया रचना जी, सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार । आदरणीया जी मैं लघु कथा बहुत कम लिखता हूँ । आपसे निवेदन है कि
अगर आप एक बार इसकी विस्तृत समीक्षा कर देंगी तो मैं त्रुटियों से रूबरू हो पाऊंगा ।आपका उपकार होगा ।सादर नमन
Comment by Rachna Bhatia on May 2, 2022 at 2:50pm

आदरणीय सुशील सरना जी अच्छी लघुकथा  हुई है बधाई। मैं शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी से सहमत हूँ कि कुछ शब्दों के हेरफेर से लघुकथा की कसावट बेहतर हो सकती है। सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 2, 2022 at 1:09pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुन्दर समसामयिक लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।

Comment by Sushil Sarna on May 1, 2022 at 3:31pm
आदरणीय शेख उस्मानी जी सृजन के प्रयास को मान एवं सुझाव देने के लिए दिल से आभार आदरणीय जी ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on May 1, 2022 at 10:30am

आदाब। एक ज्वलंत समस्या और कड़वे सच को उभारती बढ़िया रचना। हार्दिक बधाई जनाब सुशील सरना जी। इस विधा में भी आपकी सक्रियता हमें प्रभावित व आकर्षित करती है। इस रचना में आपने सब कुछ स्वयं या पात्रों के माध्यम से कह दिया है। बहुत कुछ पाठक स्वयं समझ लेते हैं। आशय यह कि कुछ शब्द कम किये जा सकते हैं। कुछ बातें इशारे में कही जा सकती हैं। संवादों में पात्र नामों को दोहराने के बजाय संवाद के बाद के वाक्यांश में किसी तरह बताने की शैली अपनाई जा सकती है मेरे विचार से। कुछ समस्याएं हमें जनभागीदारी से हल कर लेनी चाहिए चंदा इकट्ठा करके। पार्षद और सांसद विधायक वगैरह आलकमान के निर्देश अनुसार वोटबैंक अनुसार काम करवाते देखे गये हैं या फिर अपने या.केवल नेताओं के लाभार्थ कार्य करवाते हैं ऐसे मौकों पर।

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