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बेटी हूँ मैं अभागी बस मेरी है यही खता ......

कोई तो बता दे जरा , हुयी क्या हमसे खता

जमाना बैरी हुआ , सब गैर हुआ ऐसी क्या की खता

बेटी बन जन्म लिया , कसूर बस इतना किया



चाहा था कि मैं भी भैया की तरह खूब पढूंगी

माँ-बाप का नाम रौशन करुँगी

देश का ऊँचा नाम करुँगी

अपने सब सपने साकार करुँगी



लेकिन जब समाज से हुआ सामना

न कोई सपना रहा न कोई अपना

ज़माने की ठोकर मिली और अपनों के ताने

क्यूँ तुने जन्म लिया ओ ! अभागी



मैं गरीब बाप तेरा कहाँ से दहेज़ जुटाऊंगा

दहेज…

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Added by Parveen Malik on September 8, 2012 at 1:00pm — 2 Comments

क्षणिकाएं

लोकतंत्र

जहाँ हर नेता भ्रष्ट

हर अधिकारी घूस खाने को

स्वतंत्र है |

यही तो अपना

लोकतंत्र है ||



पहचान

लोकसभा और विधानसभा को

बना दिया जंग का मैदान |

देख कर इन नेताओं के कारनामे

लोग हो रहे हैरान ||



उजले कपड़ों के पीछे लिपटे

इंसानों की शक्लों में घूम रहे शैतान |

पचा गए यूरिया , खा गए चारा

बच के रहना मेरे भाई

कहीं खा ना जायें इंसान ||



कहें 'योगी ' कविराय

इन नेताओं से उठा…

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Added by Yogi Saraswat on September 7, 2012 at 2:00pm — 8 Comments

रक्तदान के दोहे



प्यारे मित्रो ! आगामी 17 सितम्बर को तेरा पंथ युवक परिषद् ने द्वारा देश भर में रक्तदान का अभियान आयोजित किया है . एक लाख बोतल रक्त का लक्ष्य है ......उनके इस पुनीत कार्य के समर्थन में मैंने अहमदाबाद के संयोजक श्री सुनील वोहरा और अखिल भारतीय संयोजक श्री राजेश सुराणा के लिए कुछ दोहे लिखे हैं जो वे बैनर्स पर काम लेंगे.......आप भी पढ़ कर बताइये ..कैसे लगे ?



रक्तदान के…

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Added by Albela Khatri on September 6, 2012 at 8:50pm — 4 Comments

सनम बेवफा

इतने मिले जख्म कि जख्म ही दवा बने

न पाई ख़ुशी में ख़ुशी न रोये गम में हम

दिल और यह दिमाग सब शून्य हो गये

.................................................

है मुहब्बत इक फरेब औ प्यार इक धोखा

साये में है जिसके  बस आंसूओं का सौदा

चोट पर चोट दिल पे हम खाते चले गये

................................................

वफा को जो न समझे तुम सनम बेवफा हो

रहें गैरों की बाहों में और सिला दो वफा का

मेरे सपनो की तस्वीर के टुकड़े हुए तुम्ही से …

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Added by Rekha Joshi on September 6, 2012 at 5:40pm — 2 Comments

है ग़ज़ल ताज़ा कही तू या लिखी तहरीर है

संदली नाजुक बदन या बोलती तस्वीर है

आयतें खामोशियाँ हैं शर्म ये तफ़सीर है



सर्द हैं जुल्फों के साए सोज साँसों में भरी

कातिलाना है अदा या ख्वाब की ताबीर है



ये गजाली चश्म तेरे श्याह गहरी झील से

औ तबस्सुम होंठ पे जैसे कोई शमशीर है…



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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 6, 2012 at 4:05pm — 5 Comments

कोई फिर भगवान हुआ है

यह रचना उन (ढोंगी ) बाबाओं और गुरुओं के नाम जो अमरबेल से हर गली में  हर रोज उग रहे है .....





कोई फिर भगवान हुआ है
हर घर का दरबान हुआ है 

फैला कर झूठे विज्ञापन

गीता…
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Added by seema agrawal on September 6, 2012 at 10:21am — 11 Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ३६

सर्द सी सुबह और बेरंग सा आसमान. तेज़ बहती हवा और नशे में झूमते से दरख्तोशज़र. चौथी मंज़िल पे मेरा एक अकेला कमरा. बड़ा सा और खाली खाली. सलवटों से भरा बिस्तर, सिकुड़े सहमे से तकिए, किसी नाज़नीन के आँचल सा लहरा के लरज़ता हुआ लेटा कम्बल. सोफे पे रखा शिफर (शून्य) में ताकता खाली ट्रवेल बैग. पति-पत्नी-से अकुला के अगल-बगल मेज़ पे पड़े जिभ्भी (टंग क्लीनर) और टुथ ब्रश- किसी साहूकार के पेट सा फूला टूथपेस्ट... तो किसी गरीब की आंत सा सिकुड़ा मेरे शेविंग क्रीम का ट्यूब. दरवाज़े और दरीचों को बामुश्किल ढँक…

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Added by राज़ नवादवी on September 6, 2012 at 8:56am — 3 Comments

शिक्षक दिवस पर एक गीत-

रोशनी को, जिन्हें हम जलाते हैं

आज हम उनका दिन मनाते हैं.....।

जिनकी मेहनत से हमने सीखा है

जिनके बिन दुनिया एक धोखा है

ज्ञान का दीप जो जलाते हैं......

आज हम उनका दिन मनाते हैं............।

वो हवाओं को मोड देते हैं

और पत्थर को तोड देते हैं

पौधों को पेड जो बनाते हैं....

आज हम उनका दिन मनाते हैं............।

                              सुजान

Added by सूबे सिंह सुजान on September 5, 2012 at 11:35pm — 6 Comments

क्यों प्राण प्रियतम आये ना ??

चाँदनी ढल जायेगी फिर

क्या मिलन बेला आयेगी

मिलने को व्याकुल नयन ये तो

क्यों प्राण प्रियतम आये ना??



नयन बदरा छा गये

रिम-झिम फुहारों की घटा

मुझमें समाने और अब तक

क्यों प्राण प्रियतम आये ना??



विरह की इस वेदना को

अनुपम प्रेम में ढाल

अमानत बनाने मुझे अपनी

क्यों प्राण प्रियतम आये ना??



मुख गरिमा के चंचल तेवर

अलौकिक कर हर प्रेम भाव

मेरे मुख दर्पण के भाव देखने

क्यों प्राण प्रियतम आये ना??



निहारिका सा… Continue

Added by deepti sharma on September 5, 2012 at 8:18pm — 9 Comments

सूनी वीणा के फिर तार बजने लगे..............एक गीत.

---------------------------------------

लो चुपके से तुमने ये क्या कह दिया,

सूनी वीणा के फिर तार बजने लगे

कलियाँ खिल के हंसीं मन मचलने लगा, 

होंठों पे आज फिर गीत सजने लगे.

--------------------------------------

सरसराती हुयी जब हवा ये चली,

घर का आँगन भी मेरा चहकने लगा.

तेरे आने की आहट से हलचल मची,

कोना कोना भी अब तो महकने लगा.

प्यार के बोल सुनने की खातिर प्रिये,

अपने बोलों को पन्छी भी तजने लगे.

कलियाँ खिल के हंसीं मन मचलने लगा, …

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Added by dineshVerma on September 5, 2012 at 1:51pm — 4 Comments

जबाब नहीं है ख़ामोशी

"जबाब नहीं है ख़ामोशी "



जबाब नहीं है ख़ामोशी

सब जानते हैं

इसमें तो छुपा होता है

गलतियाँ स्वीकारने का हाँ

कसमसाहट भरी वो हाँ

जो हाँ कहने पर

जुबान शर्मशार हुई जाती है…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 5, 2012 at 1:25pm — 4 Comments

गुरुवर तुम्हें नमन है ( शिक्षक दिवस पर विशेष )

 

जिसने बताया हमको , लिखना हमारा नाम .

जिसने सिखाया हमको , कविता ,ग़ज़ल -कलाम .

समझाया जिसने हमको , दीने -धरम ,ईमान .

जिसने कहा कि एक है ,कह लो रहीम - राम .

भगवान से भी पहले ,करता नमन उन्हीं को .

मानों तो हैं  खुदा वो , ना मानों तो हैं आम .…

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Added by satish mapatpuri on September 5, 2012 at 3:46am — 18 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
शिक्षक दिवस पर विशेष / सौरभ

शिक्षक और गुरु : कैसी अवधारणा

5 सितंबर यानि ’शिक्षक दिवस’, उद्भट दार्शनिक विद्वान और देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्लि राधाकृष्णन का जन्मदिवस. कृतज्ञ देश आपके जन्मदिवस पर आपको भारतीय नींव की सबलता के प्रति आपकी अकथ भूमिका के लिये स्मरण करता है.…

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Added by Saurabh Pandey on September 5, 2012 at 12:30am — 24 Comments

खूब भटकी यों ग़ज़ल भी काफ़िये की खोज में

रात थकती बुझ रही रोशन दिये की खोज में

जल रहे हैं जाम खाली साकिये की खोज में



लिख दिए किरदार सारे पड़ गये हैं नाम पर

है अधूरी ये कहानी बाकिये की खोज में



हार कर इंसान खुद से आदमीयत खोजता  

जिन्दगी बेचैन फिरती हाशिये की खोज में…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 4, 2012 at 4:00pm — 11 Comments

मानस के रचनाकार में भी पुरुष अहम् भारी .

 [listen on shikhakaushik06  ]
 

Stamp on Tulsidas

सात कांड में रची तुलसी ने ' मानस ' ;

आठवाँ लिखने का क्यों कर न सके साहस ?



आठवे में लिखा जाता सिया का विद्रोह ;

पर त्यागते कैसे श्री राम यश का मोह ?



लिखते…

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Added by shikha kaushik on September 4, 2012 at 3:00pm — 15 Comments

मैं तो बस इक गुरु का शिष्य हूँ

मैं तो बस इक गुरु का शिष्य हूँ



बहुत उकसा के पूछा

बताओ कौन हो तुम

क्या हो तुम ???



तुम दिखावटी हो

या सच में फूल हो

नहीं नहीं

शायद तुम खार हो

कितना ग़ज़ब लगता है

तुम्हारा अलग अलग सा दिखना

किसने पैदा किया है तुम्हे 

कोई जादूगर

बागवान था क्या ??

गेंदे के फूल से 

गुलाब की खुशबू

लाजवाब है ये कारीगरी

खुदाई सी लगती है

पर है हकीकत



चाँद तारा या आफताब

क्या हो तुम

या जर्रा-ए-कायनात…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 4, 2012 at 1:30pm — 3 Comments

काव्य रस अपनाओ जी ----

धीरे धीरे बोंलो जी,
कानो में रस घोलो जी |
 
चबा चबा कर खाओ जी, 
खाओ और पचाओं जी :|
 
भोगी से योगी बनना सीखो, 
रोगी कभी न बनना जी | …
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 4, 2012 at 11:30am — 10 Comments

वक़्त

वक़्त भी क्या चीज है यारों

हर ओर हकूमत, इसकी छाई है

कही छाया है मातम की

तो कहीं बजी शहनाई है l



गिरगिट सा है रंग बदलता

हर्षित, भयभीत, भ्रमित कर

परिचय जग को अपना देता

रंक से राजा पल में बनता

वक़्त जिस पर मेहरबान हुआ

क्षणभर भी न टिकता जग में

काल का भयंकर जब वार हुआ



रावण राजा बड़ा निराला

अहं स्वयं के शिकार हुआ

क्षण भर में परलोक सिधारा

दुस्साहस जब वक़्त से

टकराने का था उसने किया

ग्रसित करता पलभर में…

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Added by PHOOL SINGH on September 4, 2012 at 10:00am — 8 Comments

ओबीओ एक अनूठा मंच है -------

ओबीओ में विशाल मेंला लगा था

छंद कवियों का तांता लगा था |



मैंने वहां ;दोहा;नाम से कविता दागी


प्राचार्य ने यह दोहा नहीं कह हटा दी |



मैंने फिर छन्-पकैयां लिख लगा दिए


गुरुवर ने नरम हो कुछ सुझाव दिए |



एक अलबेला कूद पड़े बोंले मानलो


सिष्य से प्राचार्य बना देंगे जानलो |



गुरुवर बोंले ये कर्म योगी का…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 4, 2012 at 5:30am — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मन को जरा टटोलो जी .......

स्वर में अमृत घोलो जी

फिर अधरों को खोलो जी |



नहीं खर्च कुछ होने का

मीठा – मीठा बोलो जी |.



देने वाला कैसे दे ?

हाथ मलिन…

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Added by अरुण कुमार निगम on September 3, 2012 at 9:30pm — 15 Comments

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