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स्वर में अमृत घोलो जी
फिर अधरों को खोलो जी |


नहीं खर्च कुछ होने का
मीठा – मीठा बोलो जी |.


देने वाला कैसे दे ?
हाथ मलिन हैं धो लो जी |


मन से पश्चाताप करो
प्रायश्चित कर रो लो जी |


नाव सम्हल ना पाएगी
इतना भी मत डोलो जी |


मान सहित घर पहुँचा दे
साथ उसी के हो लो जी |


जीवन में क्या दिया-लिया
मन को जरा टटोलो जी |


अधिक जागरण ठीक नहीं
चादर तानो सो लो जी |


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on September 6, 2012 at 8:38pm

आदरणीय बागी जी,सौरभ पाण्डेय जी,सतीश मपतपुरी जी, वीनस केसरी जी,कुमार गौरव जी,लडीवाला जी,संदीप द्विवेदी जी,फूल सिंह जी,प्राची जी, अशोक रक्ताले जी,संदीप पटेल दीप जी,योगराज प्रभाकर जी,विन्ध्येश्वरी प्रसाद जी और रेखा जी आप सभी का आभार.वर्तमान में गुडगाँव में हूँ. अपने स्वभाव के विपरीत एक ही साथ सभी को आभार प्रकट कर रहा हूँ.किसी अन्य के सिस्टम में दिल खोल कर बात भी तो नहीं हो पाती.१० सितम्बर को जबलपुर लौटूंगा,तब विस्तार से बातें होंगी.क्षमा याचना के साथ.

Comment by Rekha Joshi on September 5, 2012 at 12:23pm

नहीं खर्च कुछ होने का
मीठा – मीठा बोलो जी |.,अति सुंदर भाव अरुण जी ,बधाई 

Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on September 4, 2012 at 6:24pm
एकाध स्थानों पर मेहनत की कमी को छोड़कर बाकी पूरी गजल रसगुल्ला है साहब।मुलायम+मजेदार+मौजू।और इसी बात पर मैं आपको 10 में 11 नम्बर देता हूं।आप भी क्या याद करोगे।

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on September 4, 2012 at 2:16pm

//नाव सम्हल ना पाएगी
इतना भी मत डोलो जी |//

वाह वाह वह !! बहुत खूब !!

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on September 4, 2012 at 12:34pm

वाह वाह वाह क्या बात है आदरणीय अरुण सर जी क्या सुन्दर प्रवाहमयी सहज शब्दों की ग़ज़ल है
दाद क़ुबूल कीजिये इस मुसलसल ग़ज़ल के लिए

Comment by Ashok Kumar Raktale on September 4, 2012 at 12:29pm

जीवन में क्या दिया-लिया
मन को जरा टटोलो जी |

बहुत सुन्दर भाव आ. निगम साहब बधाई.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 4, 2012 at 11:06am

सरल सहज सुन्दर सुमधुर ग़ज़ल हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय अरुण निगम जी 

Comment by PHOOL SINGH on September 4, 2012 at 10:40am

अरुण जी नमस्कार

बहुत ही भावपूर्ण रचना.....बधाई....

फूल सिंह

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on September 4, 2012 at 10:20am

नहीं खर्च कुछ होने का
मीठा – मीठा बोलो जी;

अधिक जागरण ठीक नहीं
चादर तानो सो लो जी;

सरल शब्दों में गहन भाव! वाह! बधाईयां श्रीमान!

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on September 4, 2012 at 9:55am

बहुत भाती बच्चो को भी सुहाती रचना बधाई अरुण कुमार निगम भाई 

कृपया ध्यान दे...

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