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दिनेश कुमार's Blog (83)

ग़ज़ल -- फ़लक में उड़ने का क़ल्बो-जिगर नहीं रखता / दिनेश कुमार

1212---1122---1212---22

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फ़लक में उड़ने का क़ल्बो-जिगर नहीं रखता

मैं वो परिन्दा हूँ जो बालो-पर नहीं रखता

.

न चापलूसी की आदत, न चाह उहदे ( पदवी ) की

फ़क़ीर शाह के क़दमों में सर नहीं रखता

.

उरूज और ज़वाल एक से हैं जिसके लिये

वो हार जीत का दिल पर असर नहीं रखता

.

मिला नसीब से जो कुछ भी, वो बहुत है मुझे

पराई चीज़ पे मैं बद-नज़र नहीं रखता

.

नशा दिमाग़ पे दौलत का जिसके जन्म से हो

वो अपने पाँव कभी फ़र्श पर नहीं रखता

.

वो इस…

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Added by दिनेश कुमार on November 16, 2018 at 3:04pm — 8 Comments

ग़ज़ल -- नेकियाँ तो आपकी सारी भुला दी जाएँगी / दिनेश कुमार

2122---2122---2122---212

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नेकियाँ तो आपकी सारी भुला दी जाएँगी

ग़लतियाँ राई भी हों, पर्वत बना दी जाएँगी

.

रौशनी दरकार होगी जब भी महलों को ज़रा

शह्र की सब झुग्गियाँ पल में जला दी जाएँगी

.

फिर कोई तस्वीर हाकिम को लगी है आइना

उँगलियाँ तय हैं मुसव्विर की कटा दी जाएँगी

.

इनके अरमानों की परवा अह्ले-महफ़िल को कहाँ

सुबह होते ही सभी शमएँ बुझा दी जाएँगी

.

नाम पत्थर पर शहीदों के लिखे तो जाएँगे

हाँ, मगर क़ुर्बानियाँ उनकी भुला दी…

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Added by दिनेश कुमार on November 7, 2018 at 10:22am — 15 Comments

ग़ज़ल --- ख़ुद-परस्ती का दायरा क्या था / दिनेश कुमार

2122---1212---22

ख़ुद-परस्ती का दायरा क्या था

मैं ही मैं था, मेरे सिवा क्या था

.

झूठ बोला तो बच गई गरदन

हक़-बयानी का फ़ाएदा क्या था

.

चाह मंज़िल की थी निगाहों में

ठोकरें क्या थीं आबला क्या था

.

पर निकलते ही थे उड़े ताइर !

ये रिवायत थी, सानेहा क्या था

.

दर्द, ग़ुस्सा, मलाल, मजबूरी

आख़िर उस चश्मे-तर में क्या क्या था

.

क्यों मैं बर्बादियों का सोग करूँ

जब मैं आया, यहाँ मेरा क्या…

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Added by दिनेश कुमार on July 13, 2018 at 12:30am — 14 Comments

ग़ज़ल -- ख़ुशी का पल तो मयस्सर नहीं, हैं दर्द हज़ार / दिनेश कुमार

1212--1122--1212--112

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ख़ुशी का पल तो मयस्सर नहीं, हैं दर्द हज़ार

हमारे हिस्से में क्यों है बस इंतिज़ारे-बहार

.

कि रफ़्ता रफ़्ता थकावट बदन में आएगी

उतर ही जाएगा आख़िर में ज़िन्दगी का ख़ुमार

.

मिलेगी आख़िरी ख़ाने में मौत ही सबको

बिसाते-दह्र पे पैदल हो या हो फिर वो सवार

.

इधर जनाज़ा किसी का बस उठने वाला है

उधर दुल्हन की चले पालकी उठाए कहार

.

ग़मों की धूप भी हमको सुखों की छाँव लगे

हमारा नाम भी कर लो कलन्दरों में…

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Added by दिनेश कुमार on May 30, 2018 at 6:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल --- इक फ़रिश्ता है मेहरबाँ मुझ पर / दिनेश कुमार / ( इस्लाह हेतु )

2122---1212---22

.

जो भी सोचूँ, उसी पे निर्भर है

मेरी दुनिया तो मेरे भीतर है

.

इक फ़रिश्ता है मेहरबाँ मुझ पर

स्वर्ग से ख़ूब-तर मेरा घर है

.

जिसमें जज़्बा है काम करने का

कामयाबी उसे मयस्सर है

.

जीत कैसे मिली, है बेमानी

जो भी जीता, वही सिकन्दर है

.

कोई क़तरा भी भीक में माँगे

और हासिल किसी को सागर है

.

ज़ह्र-आलूदा इन हवाओं में

साँस लेना भी कितना दूभर है

.

हाँ, ये जादूगरी है लफ़्ज़ों की

( हाँ,…

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Added by दिनेश कुमार on May 21, 2018 at 10:00am — 7 Comments

ग़ज़ल --- मैं अपने काम अगर वक़्त पर नहीं करता / दिनेश कुमार / इस्लाह हेतु.

1212--1122--1212--22

.

मैं अपने काम अगर वक़्त पर नहीं करता

तो कामयाबी का पर्वत भी सर नहीं करता

.

हसीन ख़्वाब अगर दिल में घर नहीं करता

तवील रात से मैं दर-गुज़र नहीं करता

.

हरेक मोड़ पे ख़ुशियों तो कम हैं,दर्द बहुत

कहानी वो मेरी क्यों मुख़्तसर नहीं करता

..

सिखा दिया है मुझे ग़म ने ज़िन्दगी का हुनर

किसी भी हाल, मैं अब आँख तर नहीं करता

.

मैं अपने अज़्म की पतवार साथ रखता हूँ

मेरे सफ़ीने पे तूफ़ाँ असर नहीं करता

.

ग़ुरूर साथ…

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Added by दिनेश कुमार on May 20, 2018 at 6:00pm — 3 Comments

ग़ज़ल -- बाद मरने के भी दुनिया में हो चर्चा मेरा / दिनेश कुमार

2122--1122--1122--22

बाद मरने के भी दुनिया में हो चर्चा मेरा

ऐसी शोहरत की बुलन्दी हो ठिकाना मेरा

मैं हूँ इक प्रेम पुजारी ऐ मेरी जाने-हयात

तू ही मन्दिर, तू कलीसा, तू ही का'बा मेरा

मेरे बेटे की निगाहों में हैं कुछ ख़्वाब मेरे

ज़िन्दगी उसकी है जीने का सहारा मेरा

मौत भी चैन से आती है कहाँ इन्सां को

ज़ेह्न में गूँजता ही रहता है मेरा मेरा

अब भी रातों को मेरी नींद उचट जाती है

आह इक चाँद को छूने का वो सपना मेरा

अनकही बात मेरी क्या वो…

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Added by दिनेश कुमार on May 17, 2018 at 5:31am — 3 Comments

ग़ज़ल --- कठिन, सरल का कोई मसअला नहीं होता // दिनेश कुमार

1212---1122--1212--22

.

कठिन, सरल का कोई मसअला नहीं होता

अगर तू ठान ले दिल में तो क्या नहीं होता

.

अगर हो अज़्म तो पत्थर में छेद होता है

हुनर मगर ये सभी को अता नहीं होता

.

हमारे कर्म से प्रारब्ध भी बदलता है

नसीब अपना कभी तयशुदा नहीं होता

.

ये तज्रिबा है हमारा मुशाहिदा भी है

अमीर-ए-शह्र किसी का सगा नहीं होता

.

सितमगरों के इशारों पे खेल होता है

अदालतों में कोई फ़ैसला नहीं होता

.

जुड़ा ही रहता है ममता…

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Added by दिनेश कुमार on May 6, 2018 at 9:00am — 8 Comments

ग़ज़ल -- ये क्या हो गया है भले आदमी को // दिनेश कुमार

122----122----122----122

.

जो आँखों से दिखती नहीं है सभी को

मैं क्यों ढूँढ़ता हूँ उसी रौशनी को

.

जो समझे मेरे दिल की सब अन-कही को

मैं क्या नाम दूँ ऐसे इक अजनबी को

.

सुधारेगा कौन आपके बिन मुझे अब

मुझे डाँटने का था हक़ आप ही को

.

भले रोज़मर्रा में हों मुश्किलें ख़ूब

बहुत प्यार करता हूँ मैं ज़िंदगी को

.

कसौटी पे परखे जो किरदार अपना

भला इतनी फ़ुर्सत कहाँ है किसी को

.

तुम्हें नूरे-जाँ भी दिखेगा इसी में

कभी…

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Added by दिनेश कुमार on May 5, 2018 at 4:46am — 11 Comments

ग़ज़ल -- शीशा-ए-दिल से गर्द हटाने की बात कर // दिनेश कुमार

221---2121---1221---212

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तू मुश्किलों को धूल चटाने की बात कर

तूफ़ाँ में भी चराग़ जलाने की बात कर

.

तू मीरे-कारवाँ है तो ये फ़र्ज़ है तिरा

भटके हुओं को राह दिखाने की बात कर

महफ़िल में जब बुलाया है मुझ जैसे रिन्द को

आँखों से सिर्फ़ पीने पिलाने की बात कर

.

ऐशो-तरब की चाह भी कर लेना बाद में

पहले उदर की आग बुझाने की बात कर

.

मुद्दत से मुन्तज़िर हूँ तिरा ऐ सुकूने-दिल

ख़्वाबों में ही सही कभी आने की बात कर

.

बस पैरहन…

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Added by दिनेश कुमार on April 29, 2018 at 6:30am — 18 Comments

ग़ज़ल -- जो काम बस का नहीं, उसका इश्तिहार किया // दिनेश कुमार

1212----1122----1212----112/22

जो काम बस का नहीं, उसका इश्तिहार किया

यही तो काम सियासत ने बार बार किया

तमाम अहले-चमन भी सज़ा के भागी हैं

अगर उक़ाब ने गोरैया का शिकार किया

उन्हें तो शौक़ था वादों पे वादे करने का

और एक हम थे कि वादों पे ए'तिबार किया

ये कौन आया है साहिल से लौट कर प्यासा

ये किसकी प्यास ने दरिया को शर्मसार किया

मुक़ाम उनको ही हासिल हुआ है दुनिया में

जिन्होंने राह की दुश्वारियों को पार किया

जो इसके साथ न चल पाया रह…

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Added by दिनेश कुमार on April 18, 2018 at 9:39am — 15 Comments

ग़ज़ल -- तृष्णाओं के भँवर में फँसा बद-हवास था // दिनेश कुमार

221 - - 2121 - - 1221 - - 212

तृष्णाओं के भँवर में फँसा बद-हवास था

सब कुछ था मेरे पास मगर मैं उदास था

जीवन के मयकदे में कुछ हालत थी यूँ मेरी

होंठों पे प्यास हाथ में खाली गिलास था

हर आदमी के ज़ेह्न में रक़्साँ थी बेकली

दुनियावी ख़्वाहिशात का हर कोई दास था

आह्वान बंद का था सियासत के नाम पर

होगा नहीं वबाल फ़क़त इक क़यास था

भगवे हरे में बँट गया फिर शह्रे-दुश्मनी

चारों तरफ़ इक आलमे-ख़ौफ़ो-हिरास था

तूफ़ाँ में रात जिसका सफ़ीना बचा…

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Added by दिनेश कुमार on April 8, 2018 at 6:25pm — 12 Comments

ग़ज़ल --- असर होता है // दिनेश कुमार

2122--1122--1122--22

.

एक पत्थर पे भी उल्फ़त का असर होता है

दिल मे जज़्बा हो तो दीवार में दर होता है

.

घुप अँधेरे में उजाले की किरण सा जीवन

जो भी जी जाए, वो दुनिया में अमर होता है

.

उसको हालात की गर्मी की भला क्या चिन्ता

जिसकी दहलीज़ पे अनुभव का शजर होता है

.

आपसी प्यार मकीनों में हो, घर तब होगा

दरो-दीवार का ढांचा तो खँडर होता है

.

वो न सह पायेगा इक पल भी हक़ीक़त की तपिश

जिसके ख़्वाबों का महल मोम का घर होता…

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Added by दिनेश कुमार on December 31, 2017 at 1:33pm — 20 Comments

ग़ज़ल -- "इसके आगे बस ख़ुदा का नाम है" / दिनेश कुमार

2122--2122--212

भाग्य तेरे कर्म का परिणाम है

तुझ पे ही निर्भर तेरा अंजाम है

मेरे हमराही को भी ठोकर लगी

मेरे दिल को अब ज़रा आराम है

सिर्फ़ सच की राह पर चलता हूँ मैं

आबला-पाई मेरा इनआ'म है

उसकी मर्ज़ी है अता कुछ भी करे

बस दुआ करना हमारा काम है

शख़्सियत अपनी निखारो मुफ़्त में

मुस्कुराहट का न कोई दाम है

हम फ़क़ीरों की नज़र से देखिये

जिस्म इक मन्दिर है पावन धाम है

हम यथा सम्भव मदद सब की करें

आदमीयत का यही पैग़ाम…

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Added by दिनेश कुमार on December 26, 2017 at 6:46am — 18 Comments

ग़ज़ल -- दूर कर बद-गुमानी मेरी // दिनेश कुमार

212---212---212



दूर कर बदगुमानी मेरी

ख़त्म हो सरगरानी मेरी



मेरे जीवन से तुम क्या गए

खो गई शादमानी मेरी



अब न आएगी ये लौटकर

जा रही है जवानी मेरी



बीती बातों पे ये बारहा

व्यर्थ की नोहा ख़्वानी मेरी



ग़म के दरिया में रक्खा है क्या

भूल जाओ कहानी मेरी



गुल खिलाएगी कोई नया

एक दिन हक़-बयानी मेरी



ऐ मेरे जिस्म ! ऊबा हूँ मैं

अब न कर मेज़बानी मेरी



मौलिक व… Continue

Added by दिनेश कुमार on October 29, 2017 at 7:14am — 11 Comments

ग़ज़ल -- इस्लाह हेतु / ज़िन्दगी भर सलीब ढ़ोने को / दिनेश कुमार

2122--1212--22



ज़िन्दगी भर सलीब ढ़ोने को

हक़परस्ती है सिर्फ़ रोने को



दिल को पत्थर बना लिया मैंने

ख़्वाब आँखों में फिर पिरोने को



दूर मंज़िल है वक़्त भी कम है

कौन कहता है तुम को सोने को



एक बस वो नहीं हुआ मेरा

क्या नहीं होता वर्ना होने को



किस लिये हैं इन आँखों में आँसू

पास भी क्या था जब कि खोने को



ज़िद नहीं करता अब खिलौनों की

क्या हुआ दिल के इस खिलौने को



दाग़ कुछ ऐसे भी हैं दामन पर

अश्क… Continue

Added by दिनेश कुमार on October 15, 2017 at 11:56pm — 14 Comments

ग़ज़ल --- ख़ुदकुशी बार बार कौन करे // दिनेश कुमार

2122---1212---112/22
.
ख़ुदकुशी बार बार कौन करे
आप का इन्तिज़ार कौन करे
.
आइना टूटने से डरता है
झूट को शर्मसार कौन करे
.
अपना मतलब निकालते हैं सब
बे-ग़रज़ हमसे प्यार कौन करे
.
नाव टूटी है हौसला ग़ायब
ग़म के दरिया को पार कौन करे
.
हम हक़ीक़त से मुँह चुराते हैं
ख़्वाब को तार तार कौन करे
.
उस्तरा बन्दरों के हाथ में है
इन को सर पर सवार कौन करे
.
( मौलिक व अप्रकाशित )

Added by दिनेश कुमार on October 10, 2017 at 5:33am — 8 Comments

ग़ज़ल -- ग़लती कर पछताए कौन // दिनेश कुमार

22__22__22__2
.
ग़लती कर पछताए कौन
ख़ुद से नज़र मिलाए कौन
.
अपनी अना मिटाए कौन
सच्ची अलख जगाए कौन
.
पिछले लेखे-जोखे हैं
अपने कौन पराए कौन
.
राम भी कब से भूखे हैं
झूठे बेर खिलाए कौन
.
कस्तूरी मिल जाएगी
ख़ुद में गहरे जाए कौन
.
तूफ़ां नाम का तूफ़ां है
लहरों से टकराए कौन
.
माज़ी माज़ी करें सभी
मुस्तक़बिल चमकाए कौन
.
( मौलिक व अप्रकाशित )

Added by दिनेश कुमार on October 9, 2017 at 6:18am — 20 Comments

ग़ज़ल -- लिखूं सच को सच ये हुनर शेष है ( दिनेश कुमार )

122___122___122___12



लिखूँ सच को सच, ये हुनर शेष है

अभी रोशनाई में डर शेष है



क़दम उठ रहे हैं इकट्ठे मगर

दिलों के मिलन का सफ़र शेष है



बुझाओ न तुम शम्अ उम्मीद की

फ़क़त रात का इक पहर शेष है



भले उनकी दस्तार है तार तार

वो ख़ुश हैं कि काँधे पे सर शेष है



चमन में लगी आग, लगती रहे

मुझे क्या, अभी मेरा घर शेष है



दशहरा मनाने का क्या फ़ाइदा

बुराई का ख़ूँ में असर शेष है



जो हातिम सा इमदाद सबकी… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 24, 2017 at 6:57am — 22 Comments

ग़ज़ल -- ज़िन्दगी की ग़ज़ल हो रही है ( दिनेश कुमार )

212___212___212___2



बे-ख़ुदी के हसीं मरहले में

चैन दिल को मिला मयकदे में



हौसला जब मिटा हादसे में

मुश्किलें बढ़ गईं रास्ते में



हमसफ़र मेरा कोई नहीं था

यूँ बहुत लोग थे क़ाफ़िले में



इश्क़ में डूब जाओ तुम इतना

क़ुर्ब महसूस हो फ़ासले में



ग़ौर से मेरे चेहरे को पढ़िए

है उदासी निहाँ क़हक़हे में



बोल कर सच मैं तकलीफ़ में हूँ

वो झूठा है देखो मज़े में



ज़िन्दगी की ग़ज़ल हो रही है

बँध रहे दर्दो-ग़म… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 4, 2017 at 10:21pm — 10 Comments

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