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ग़ज़ल -- बाद मरने के भी दुनिया में हो चर्चा मेरा / दिनेश कुमार

2122--1122--1122--22

बाद मरने के भी दुनिया में हो चर्चा मेरा
ऐसी शोहरत की बुलन्दी हो ठिकाना मेरा

मैं हूँ इक प्रेम पुजारी ऐ मेरी जाने-हयात
तू ही मन्दिर, तू कलीसा, तू ही का'बा मेरा

मेरे बेटे की निगाहों में हैं कुछ ख़्वाब मेरे
ज़िन्दगी उसकी है जीने का सहारा मेरा

मौत भी चैन से आती है कहाँ इन्सां को
ज़ेह्न में गूँजता ही रहता है मेरा मेरा

अब भी रातों को मेरी नींद उचट जाती है
आह इक चाँद को छूने का वो सपना मेरा

अनकही बात मेरी क्या वो समझ पाएंगे ?
क्या मुकम्मल कभी हो पायेगा क़िस्सा मेरा ??

सिलवटें वक़्त की पड़ने ही लगीं इस पे 'दिनेश'
तुमने देखा ही कहाँ ग़ौर से चेहरा मेरा

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by दिनेश कुमार on May 22, 2018 at 8:54pm

हौसला अफ़ज़ाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय निलेश सर जी, । प्रयासरत रहूँगा।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 22, 2018 at 8:09pm

अब भी रातों को मेरी नींद उचट जाती है
आह इक चाँद को छूने का वो सपना मेरा
.
विशेष बधाई इस शेर के  लिए 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 22, 2018 at 8:09pm

बहुत अच्छे आ. दिनेश जी 
आप की ग़ज़लें दिन प्रतिदिन बेहतर होती जा रहीं हैं.. बरकरार रखिये.. 
बहुत बहुत बधाई 

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