For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

November 2011 Blog Posts (51)

विराम-चिह्न की आत्मकथा

 

विराम-चिह्न की आत्मकहानी, सुनें उसी की जुबानी ।

 

मैं विराम-चिह्न हूँ। कुछ विद्वान मुझे विराम चिन्ह या विराम भी बोलते हैं लेकिन मुझे कोई आपत्ति नहीं है। हाँ, एक बात मैं…

Continue

Added by Prabhakar Pandey on November 24, 2011 at 3:30pm — 3 Comments

हे चित्रकार !

मिलन की ओस से निखरा ये गुलाबी चेहरा

आखिरी लम्हों की कुछ भर दो सफेदी इनमे…

Continue

Added by Arun Sri on November 23, 2011 at 1:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल :- अस्ल में मौत का है कुआँ ज़िन्दगी !

ग़ज़ल :- अस्ल में मौत का है कुआँ ज़िन्दगी !

 

पेट की भूख का है बयाँ ज़िन्दगी ,

अस्ल में  मौत का है कुआँ ज़िन्दगी |

 

सबसे आगे निकलने की एक होड़ है ,

जलती संवेदनाएं धुआँ ज़िन्दगी |

 

इस तमाशे की कीमत चुकाओगे क्या ,

हम हथेली पे…

Continue

Added by Abhinav Arun on November 22, 2011 at 7:30am — 15 Comments

ग़ज़ल - ऐसे झूटे' ख्वाबों के............

बस क़दमों की आहट आये' आने का' इमकान कहाँ,

ऐसे झूटे' ख्वाबों के सच होने का' इमकान कहाँ।



उम्मीदों के' बागीचे का' पत्ता पत्ता बिखर गया,

इस गुलशन में' फूलों के' फिर खिलने का' इमकान कहाँ।



दाना खाने' के चक्कर में' पंछी जो' उस पार गये,

खा पीकर भी वापिस उनके' आने का' इमकान कहाँ।



हाँ दौलत के' ढेर नहीं ये' माना माँ के आँचल में,

पर' दो वक्ता रोज़ी के ना' मिलने का' इमकान कहाँ।



डगमग होके' गोते खाए रूहें बाबा अम्मा की,

टूटी नय्या' पर…

Continue

Added by इमरान खान on November 21, 2011 at 11:00am — 4 Comments

मुक्तक: भारत -- संजीव 'सलिल'

मुक्तक:

भारत

संजीव 'सलिल'

*

तम हरकर प्रकाश पा-देने में जो रत है.

दंडित उद्दंडों को कर, सज्जन हित नत है..

सत-शिव सुंदर, सत-चित आनंद जीवन दर्शन-

जिसका जग में देश वही अपना भारत है..

*

भारत को भाता है, जीवन का पथ सच्चा.

नहीं सुहाता देना-पाना धोखा-गच्चा..

धीर-वीर गंभीर रहे आदर्श हमारे-

पाक नासमझ समझ रहा है नाहक कच्चा..

*

भारत नहीं झुका है, भारत नहीं झुकेगा.

भारत नहीं रुका है, भारत नहीं रुकेगा..

हम-आप मेहनती हों, हम-आप नेक हों…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on November 21, 2011 at 7:31am — 2 Comments

दोहा मुक्तिका यादों की खिड़की खुली... संजीव 'सलिल'



दोहा मुक्तिका

यादों की खिड़की खुली...

संजीव 'सलिल'

*

यादों की खिड़की खुली, पा पाँखुरी-गुलाब.

हूँ तो मैं खोले हुए, पढ़ता नहीं किताब..



गिनती की सांसें मिलीं, रखी तनिक हिसाब.

किसे पाता कहना पड़े, कब अलविदा जनाब..



हम दकियानूसी हुए, पिया नारियल-डाब.

प्रगतिशील पी कोल्डड्रिंक, करते गला ख़राब..



किसने लब से छू दिया पानी हुआ शराब.

मैंने थामा हाथ तो, टूट गया झट ख्वाब..



सच्चाई छिपती नहीं, ओढ़ें लाख…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on November 20, 2011 at 11:53am — No Comments

रात का शोर

तुमने कभी सुना है, 

रात का शोर?

कभी सुने हैं 

चीखते सन्नाटे?

जो सोने नहीं देते । 

बार बार एक ही 

नाम पुकारते है |

और ये अंधेरा

जो शोर मचाता है  

किसी की याद दिलाता है |

 

सन्नाटों को ये जुबान 

किसने दे दी…

Continue

Added by Vikram Srivastava on November 20, 2011 at 1:47am — No Comments

चलन

हुस्न मिल जायेगा पर नहीं सादगी.

उम्र कट जाएगी पर नहीं ज़िन्दगी.
बंद डिब्बों का ऐसा बढ़ा है चलन,
फल तो मिल जायेंगे पर नहीं ताजगी!!!!!
अविनाश बागडे.
 

Added by AVINASH S BAGDE on November 16, 2011 at 10:30am — No Comments

बचपन.

बचपन.

बचपन इतना मीठा जैसे हो कोई चाकलेट.
महँगी-सस्ती,लम्बी-छोटी,चाहे जो हो रेट
चाहे जो हो रेट,लगे है बस मनभावन.
याद करें इसकी तो मुह में आये सावन.
कहता है अविनाश,सुनो उनका भी क्रंदन!!
ख़त्म हो रहा चौराहों पे जिनका बचपन.
अविनाश बागडे.

 

Added by AVINASH S BAGDE on November 12, 2011 at 9:00pm — 4 Comments

इश्क़

 

ये कैसा व्यापार हुआ,

दुश्मन सारा बाज़ार हुआ |

 

दिल लेकर दिल दे बैठे तो,

क्यूँ जग में हाहाकार हुआ|

 …

Continue

Added by Vikram Srivastava on November 12, 2011 at 2:08am — 12 Comments

दोहा सलिला : गले मिले दोहा यमक --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला

गले मिले दोहा यमक

--संजीव 'सलिल'

*

जिस का रण वह ही लड़े, किस कारण रह मौन.

साथ न देते शेष क्यों?, बतलायेगा कौन??

*

ताज महल में सो रही, बिना ताज मुमताज.

शिव मंदिर को मकबरा, बना दिया बेकाज..

*

भोग लगा प्रभु को प्रथम, फिर करना सुख-भोग.

हरि को अर्पण किये बिन, बनता भोग कुरोग..

*

योग लगाते सेठ जी, निन्यान्नबे का फेर.

योग न कर दुर्योग से, रहे चिकित्सक-टेर..

*

दस सर तो देखे मगर,…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on November 12, 2011 at 1:00am — No Comments

पालनकर्ता

भोर

सोया जगता सा जीवन, बस
यही समय है
प्रार्थना करने का
आज के दिन की यात्रा
आरम्भ करने का |


यही समय है ,जब
हाथ उठें…
Continue

Added by mohinichordia on November 11, 2011 at 9:00am — No Comments

आखिर समस्या कहाँ हैं ?

आज ऑफिस जाना कैंसिल....कितनी अच्छी बारिश हो रही है ....है न गीत नारायण ने अपनी पत्नी कम दोस्त…
Continue

Added by Rajeev Gupta on November 10, 2011 at 8:32pm — 1 Comment

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद

 

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद

 

दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेगें

आज़ाद ही रहे हैं आज़ाद ही रहेगें

 

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद को उपरोक्त पंक्तियां अत्यंत प्रिय थी। इन्हे वह अनेक बार गुनगुनाया भी करते थे। चंद्रशेखर आज़ाद ने 27 फरवरी 1931 को ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के कंमाडर इन चीफ की हैसियत से इलाहबाद के अलेफ्रेड…

Continue

Added by prabhat kumar roy on November 10, 2011 at 8:00am — 3 Comments

आपका यूँ मुस्कुराना क्यों मुझे अच्छा लगा...

एक ग़ज़ल

आपका यूँ मुस्कुराना क्यों मुझे अच्छा लगा ?

एक होना, डूब जाना क्यों मुझे अच्छा लगा ?

 

जब अकेले हैं मिले, दीवानगी बढ़ती गई,

सिर हिलाना, भाग जाना क्यों मुझे अच्छा लगा ?

 

हाथ में मेरे, कलाई जब…

Continue

Added by Afsos Ghazipuri on November 9, 2011 at 12:30am — 4 Comments

गीत - रजा बनारस !

गीत -  रजा बनारस  !
 
नेमतों से सजा बनारस
नो टेंशन बस मजा…
Continue

Added by Abhinav Arun on November 8, 2011 at 3:30pm — 17 Comments

हिमाचल के लेखक जयदेव 'विद्रोही' दिल्ली में महाकवि कालिदास सम्मान से अलंकृत

प्रैस रिपोर्टर : कुमुद शर्मा

रविवार की रात्री को देव प्रबोधनी एकादशी के अवसर पर त्रिवेणी कला संगम सभागार स्थित तानसेन मार्ग मंडी हॉउस नई दिल्ली में अखिल भारतीय स्वतन्त्र लेखक मंच द्वारा महाकवि कालीदास समारोह आयोजित किया गया जिस के मुख्य अतिथि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त डाo जीo वीo जीo कृष्ण मूर्ती थे I त्रिवेणी हाल दर्शकों ,मिडिया,पत्रकारों,कलाकारों से खचाखच…

Continue

Added by Deepak Sharma Kuluvi on November 8, 2011 at 2:45pm — No Comments

त्यागपत्र (कहानी)

त्यागपत्र (कहानी)

लेखक - सतीश मापतपुरी

अंक 8 पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करे

------------- अंक - 9  --------------

रात्रि के 12 बज रहे थे. सिंह साहेब के सम्मान में एक बड़ी दवा कम्पनी ने राजधानी के एक शानदार होटल में भोज का आयोजन किया था.  प्रबल बाबू उस दुनिया से बेखबर हो चुके थे, जहाँ गरीबी रेखा से भी नीचे लोग अपना जीवन बसर करते…

Continue

Added by satish mapatpuri on November 7, 2011 at 8:00pm — 1 Comment

त्यागपत्र (कहानी)

त्यागपत्र (कहानी)

लेखक - सतीश मापतपुरी

अंक 7 पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करे

-------------- अंक - 8 --------------

प्रबल प्रताप सिंह अब पूरी तरह बदल चुके थे. उनकी ममता को नैतिकता की वेदी पर अपने बच्चों का भविष्य कुर्बान करना गंवारा नहीं था. जीवन एक चढ़ान का नाम है, जहाँ से इंसान एक बार फिसलता है तो गिरता ही चला जाता है. उत्थान से…

Continue

Added by satish mapatpuri on November 6, 2011 at 2:30pm — 1 Comment

दोहा सलिला: गले मिले दोहा यमक -- संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:

गले मिले दोहा यमक

संजीव 'सलिल'


*

तेज हुई तलवार से, अधिक कलम की धार.

धार सलिल की देखिये, हाथ थाम पतवार..

*

तार रहे पुरखे- भले, मध्य न कोई तार.

तार-तम्यता बनी है, सतत तार-बे-तार..

*

हर आकार -प्रकार में, है वह निर-आकार.

देखें हर व्यापार में, वही मिला साकार..

*

चित कर विजयी हो हँसा, मल्ल जीत कर दाँव.

चित हरि-चरणों में लगा, तरा मिली हरि छाँव..

*…

Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on November 5, 2011 at 1:23pm — No Comments

Monthly Archives

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

सालिक गणवीर commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"प्रिय रुपम बहुत शुक्रिया ,बालक.ऐसे ही मिहनत करते रहो.बहुत ऊपर जाना है. सस्नेह"
8 hours ago
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post "तरही ग़ज़ल नम्बर 4
"जनाब रूपम कुमार जी आदाब, ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका बहुत शुक्रिय: ।"
13 hours ago
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post एक मुश्किल बह्र,"बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम" में एक ग़ज़ल
"जनाब रूपम कुमार जी आदाब, ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका बहुत शुक्रिय: ।"
13 hours ago
डॉ छोटेलाल सिंह posted a blog post

परम पावनी गंगा

चन्द्रलोक की सारी सुषमा, आज लुप्त हो जाती है। लोल लहर की सुरम्य आभा, कचरों में खो जाती है चाँदी…See More
13 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Samar kabeer's blog post "तरही ग़ज़ल नम्बर 4
"दर्द बढ़ता ही जा रहा है,"समर" कैसी देकर दवा गया है मुझे  क्या शेर कह दिया साहब आपने…"
13 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Samar kabeer's blog post एक मुश्किल बह्र,"बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम" में एक ग़ज़ल
"समर कबीर साहब आपकी ग़ज़ल पढ़ के दिल खुश हो गया मुबारकबाद देता हूँ इस बालक की बधाई स्वीकार करे !!! :)"
13 hours ago
Rupam kumar -'मीत' posted a blog post

ये ग़म ताजा नहीं करना है मुझको

१२२२/१२२२/१२२ ये ग़म ताज़ा नहीं करना है मुझको वफ़ा का नाम अब डसता है मुझको[१] मुझे वो बा-वफ़ा लगता…See More
13 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post गंगादशहरा पर कुछ दोहे
"आ. भाई छोटेलाल जी, सादर अभिवादन । दोहों पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद ।"
13 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की....)
"खूब ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद हार्दिक बधाई सालिक गणवीर  सर "
14 hours ago
डॉ छोटेलाल सिंह commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post गंगादशहरा पर कुछ दोहे
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी बहुत बढ़िया दोहे मन प्रसन्न हो गया सादर बधाई कुबूल कीजिए"
14 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)
"मुझे भी तुम अगर तिनका बनाते हवा के साथ उड़ जाता कभी मैं बनाया है मुझे सागर उसीने हुआ करता था इक…"
14 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on सालिक गणवीर's blog post ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)
"क्या रदीफ़ ली है सालिक गणवीर  सर आपने वाह!"
14 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service