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Prabhakar Pandey
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Prabhakar Pandey's Discussions

हे प्रभु ! मृत्यु आपके हाथ में है परंतु मरे तो मरे कौन और कब मरे?
4 Replies

प्रस्तुत कविताएँ ' पारसनाथ ' द्वारा रचित हैं . इन कविताओं कोमेरे दादाजी अक्सर सुनाया करते हैं. आपको भी पसंद आयेंगी .1.प्रस्तुत कविता में एक किसान ईश्वर को अपनी व्यस्तताबताते हुए अर्ज करता है कि आप ही…Continue

Started this discussion. Last reply by आशीष यादव Jul 18, 2010.

ब्राह्मण
12 Replies

सादर नमस्कार।प्रस्तुत है हमारी एक कविता जो मैंने आज से 14 साल पहले लिखी थी।मैं हिन्दू हूँ, जी हाँ एक हिन्दू,कुछ गलत रुढ़ियों एवं प्रथाओं का एक बिन्दू,हाँ मैं एक हिन्दू.ना-ना-ना,हिन्दू तक तो ठीक था,पर…Continue

Started this discussion. Last reply by Manoj Kumar Jha Aug 2, 2010.

 

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PUNE, MUMBAI, महाराष्ट्र
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देवरिया, यूपी
Profession
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एक हिंदुस्तानी

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Prabhakar Pandey's Blog

विराम-चिह्न की आत्मकथा

 

विराम-चिह्न की आत्मकहानी, सुनें उसी की जुबानी ।

 

मैं विराम-चिह्न हूँ। कुछ विद्वान मुझे विराम चिन्ह या विराम भी बोलते हैं लेकिन मुझे कोई आपत्ति नहीं है। हाँ, एक बात मैं…

Continue

Posted on November 24, 2011 at 3:30pm — 3 Comments

गोटी चम किसकी यानि दसों उँगलियाँ घी मे किसकी

सादर नमस्कार,



ये लेख मैंने मुंबई आतंकी हमले के तुरंत बाद लिखी थी। चाहता हूँ कि इ लेख के माध्यम से अपने विचार आप लोगों के साथ भी बाँटूँ। आप भी अपने विचारों से हमें अवगत कराने की कृपा करें। सादर धन्यवाद।।



बाबूजी मुंबई से आए हैं और बहुत उदास हैं। कह रहे हैं कि छोटा-मोटा काम अपने गाँव-जवार में ही मिल जाएगा तो करूँगा पर अब मुंबई नहीं जाऊँगा। अब वहाँ के जीवन का कोई भरोसा नहीं है, कब क्या हो जाएगा कोई नहीं जानता। अब तो पूरे भारत में आतंकवाद ने अपना पैर पसार लिया है। इन सब… Continue

Posted on July 20, 2010 at 11:08am — 3 Comments

हक ???

मुझे भी हक है

कुछ भी करूँ.

दूँ सबको दुख-दर्द

या करुँ किसी का कत्ल.

सबको मारूँ,

लाशों की ढेर पर नाचूँ,

देखकर मेरा मृत्युताण्डव,

काँप जाएँ,भाग जाएँ,

मौत का खेल खेलनेवाले दानव.

मुझे भी हक है

दूँ सबको गाली,

हो जाएँ

अपशब्द की पुस्तकें खाली.

ना देखूँ मैं,

माँ,बहन,भाई,

लगूँ मैं कसाई.

देखकर मेरा ऐसा रंग,

मर जाए मानवता,भाईचारा

और प्रेम का तन.

जब मैं ऐसा हो जाऊँगा,

थर्रा जाएँगे,

अपशब्द बोलने…
Continue

Posted on July 12, 2010 at 2:18pm — 4 Comments

नौ की महत्ता - इति सिद्धम्

महानुभावों "नौ" की महत्ता तो जगजाहिर है ।

यह सबसे बड़ा अंक है । (० से ९)

नौ का गुणनफल करने पर भी प्राप्त संख्या के

अंकों का योग नौ ही होता है । जैसे- अठारह (१+८=९),

सत्ताईस (२+७=९),छत्तीस (३+६=९),पैंतालिस (४+५=९),

चौवन (५+४=९),तिरसठ (६+३=९),बहत्तर (७+२=९),

एकासी (८+१=९),नब्बे (९+०=९) ..........जहाँ तक जाएँगे...वहाँ तक...(९०+९=९९= ९+९=१८= ९)..........अनंत......



नौ की महत्ता को प्रतिपादित करती हैं ये मेरी पंक्तियाँ -



राम के नाम को…
Continue

Posted on July 10, 2010 at 5:26pm — 2 Comments

Comment Wall (7 comments)

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At 1:11pm on January 1, 2011, Rash Bihari Ravi said…
janamdin mubarak ho
At 9:25am on January 1, 2011,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…
At 1:07pm on June 9, 2010, Rash Bihari Ravi said…
sawagat hain aapki
At 12:58pm on June 9, 2010, PREETAM TIWARY(PREET) said…

At 11:48am on June 9, 2010, Ratnesh Raman Pathak said…

At 10:21am on June 9, 2010,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

At 10:18am on June 9, 2010, Admin said…

 
 
 

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"कोई बात नहीं। रचना पर अन्तिम निर्णय लेखक का ही होता। एक बार पुनः बधाई। "
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अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी commented on अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी's blog post ग़ज़ल (उठाओ जितनी भी चाहे क़सम ज़माने की)
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"वैसे दूसरा शेर बेहतर हो सकता है।"
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Mahendra Kumar commented on अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी's blog post ग़ज़ल (उठाओ जितनी भी चाहे क़सम ज़माने की)
"अच्छी ग़ज़ल हुई है आ. अमीरुद्दीन जी। हार्दिक बधाई प्रेषित है। "
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