For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

January 2011 Blog Posts (118)

ग़ज़ल :- डूब रहे से नाव की बातें

ग़ज़ल :- डूब रहे से नाव की बातें

डूब रहे से नाव की बातें ,

थोथी है बदलाव की बातें |

 

राजनीति के दुर्दिन आये ,

सब करते अलगाव की बातें |

 …

Continue

Added by Abhinav Arun on January 30, 2011 at 10:30pm — 3 Comments

कविता :- परिंदों दे दो

परिंदों दे दो

अपने दाने दाने

पाने के संघर्ष के पल

हम मानवों…

Continue

Added by Abhinav Arun on January 30, 2011 at 10:00pm — 2 Comments

स्वप्न और यथार्थ...

थाम के मैं हाथ तेरा चल पड़ी सपनों के नगर ..

एक अनजाना सा घर, एक  अनजानी डगर ..

ठान के ,हूँ साथ तेरे,कितना भी हो कठिन ये सफ़र..

पार भव कर ही लेंगे साथ मेरे तुम हो अगर..

 

छोड़ना मत हाथ मेरा तुम कभी वो हमसफ़र..

प्यार से सजाएंगे हम अपना ये प्रेम नगर..

करना नज़रंदाज़ मेरी गलती हो कोई अगर..

कोशिश तो बस ये मेरी, नेह में न हो कोई…

Continue

Added by Lata R.Ojha on January 30, 2011 at 7:30pm — 8 Comments

वो स्थिर ...

कुछ भी तो स्थिर नहीं..

ना घूमती धरा…
Continue

Added by Lata R.Ojha on January 30, 2011 at 12:30am — 5 Comments

खुद को सौंपा अब मैंने 'उनको '..



ओस की बूँद सी आँखों में सिमट आयी है...

फिर भी  क्यों लब पे हंसी छाई है..

सांझ का धुंधलका मेरे आसपास सिमटा है..

जैसे मेरे ज़ेहन की परछाई है..

 

क्यों मिले थे तुम ? क्यों पास हम आये थे?

क्यों अनजान बन के ख्वाब सजाये थे?

एक पत्थर से वो ख़्वाबों का घर बिखरा है..

जो हम अनजाने थे तो पहचाने से क्यों थे ?…

Continue

Added by Lata R.Ojha on January 28, 2011 at 11:00pm — 3 Comments

बह्रे हज़ज़ मुसम्मन सालिम

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के सम्मानित सदस्यों

आप सभी को प्रणाम



     जैसा की पहले ही अवगत कराया जा चुका है की "बह्र पहचानिए" कोई पहेली नहीं है, यह तो एक चर्चा है, इल्मे अरूज और आम आदमी की दुनिया में बरसों से चली आ रही खाई को पाटने की, इसी के तहत हमने पिछली बार आप सबको एक गीत सुनवाया था और…

Continue

Added by RP&VK on January 28, 2011 at 8:30pm — No Comments

इतना कीजिए...

 

सफ़र को हसीं - सा इक मोड़ दीजिए ,
मंजिलें दो दिलों की जोड़ दीजिए |
 
ऐ खुदा ! करने ग़ैरों की भलाई ,
दुनियावालों में कभी होड़ दीजिए |  
 
भरे जो कड़वाहट कभी यूँ दिल में ,…
Continue

Added by Veerendra Jain on January 28, 2011 at 11:45am — 12 Comments

स्मृति में..

 

पिताजी की डायरी से...

स्मृति में..



मेरे नगमे तुम्हारे लबो पर,

अचानक ही आते रहेंगें .

एक गुजरी हुई जिंदगी में ,

फिरसे वापस बुलाते रहेगें.



याद आयेगा तुमको सरोवर

और पीपल की सुन्दर ये छाया .

ये बिल्डिंग खड़ी याद होगी ,

जिसको यादों में हमने बसाया .

बरबस ये कहेंगे कहानी ,

और हम…

Continue

Added by R N Tiwari on January 28, 2011 at 10:00am — 2 Comments

एक थैली बूंदी...

एक थैली बूंदी... 

              - शमशाद इलाही अंसारी "शम्स"

 

पता नहीं मुझे आज

एक थैली बूंदी की याद

इतनी क्यों आ रही है..?

आज के दिन..

जब स्कूल में

बंटा करती थी..

तमाम उबाऊ क्रिया कलापों 

और न्यूनतम स्तर के

पाखण्डों के बाद

बस प्रतीक्षा रहती थी

कब मिलेंगी

वो, गर्म गर्म बूंदियों की

रस भरी थैलियां

जो, न जाने कब और कैसे

जुड़ गयी थी

गणतंत्र दिवस…

Continue

Added by Shamshad Elahee Ansari "Shams" on January 26, 2011 at 7:09pm — 9 Comments

कविता : - केवल तूने ही नहीं खाईं गोलियाँ ..

कविता : -केवल तूने ही नहीं खाईं गोलियाँ ..

बापू केवल…

Continue

Added by Abhinav Arun on January 26, 2011 at 7:00pm — 10 Comments

बह्र पहचानिये-1

ओ. बी. ओ. परिवार के सम्मानित सदस्यों को सहर्ष सूचित किया जाता है की इस ब्लॉग के जरिये बह्र को सीखने समझने का नव प्रयास किया जा रहा है| इस ब्लॉग के अंतर्गत सप्ताह के प्रत्येक रविवार को प्रातः 08 बजे एक गीत के बोल अथवा गज़ल दी जायेगी, उपलब्ध हुआ तो वीडियो भी लगाया जायेगा

आपको उस गीत अथवा गज़ल की बह्र को पहचानना है और कमेन्ट करना है अगर हो सके तो और जानकारी भी देनी है, यदि उसी बहर पर कोई दूसरा गीत/ग़ज़ल मिले तो वह भी बता सकते है। पाठक एक…

Continue

Added by RP&VK on January 26, 2011 at 5:00pm — 18 Comments

नेता जी.

 

 

 

 

पिताजी की डायरी से.....



नेता जी.


राजनीती कहवा से सिखलीं, नेता भयिलिन कहिया .

हम  ता   देखली  कोल्हुवाड़े  में,चाटत  रहलीं महिया.  

त्यागी तपस्वी बनी नाही,कैसे चली यी गाड़ी.

काहें जाएब पटना…
Continue

Added by R N Tiwari on January 26, 2011 at 12:13pm — 3 Comments

आज देखा हमने तिरंगे का बस दो रंग अपने चेहरे पर !

क्यों संसद खामोश और ट्विट्टर चिल्ला रहा ,


क्या बदनसीबी थी हमारी,
हमारा ही रोकेट, हमारे ही घर को जला गया कहीं !


100 मेडल्स जीते हमने इस बार पर,
100 करोड़ की कीमत चूका गया कोई !


ये कैसी विकास गंगा बहा दी अपने देश मे ,
अपने ही लोगो का खून सूखा गया कोई !


ये कैसी छाई है…
Continue

Added by Sujit Kumar Lucky on January 26, 2011 at 9:30am — 6 Comments

जो जितना झुका, उतना उठा अपने वतन में

हर रुख से चली यूं तो हवा अपने वतन में

सावन कभी पतझड़ न बना अपने वतन में

 

साज़िश तो बहुत रचते रहे अम्न के दुश्मन...

रिश्तों पे रही महरे-खुदा अपने वतन में

 

हर हीर के दिल में है बसी झांसी की रानी

हर रांझे में बिस्मिल है छिपा अपने वतन में

 …

Continue

Added by shahid mirza shahid on January 26, 2011 at 4:30am — 7 Comments

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ..

विश्व शक्ति बने और  लहराता रहे ..

गीत अपनी तरक्की के गाता रहे..
कोई छू न सके वो बुलंदी मिले..
भूल शिकवे सभी साथ मिल के चलें..
आंच आये नहीं आन पे अब…
Continue

Added by Lata R.Ojha on January 25, 2011 at 11:30pm — 9 Comments

पिताजी की डायरी से.......

पिताजी की डायरी से.......



मनुष्य में कुछ भावनाएं स्थाई रूप से रहती हैं. उन भावनाओं में परिवर्तन धीरे धीरे आता है.एक लम्बे समय के बाद उसके स्थान पर दूसरी भावना आती है.प्राचीन काल में भारतीय भावना यही रहती थी की ईश्वर को प्रसन्न रखना है. जिसके परिणाम स्वरुप वह… Continue

Added by R N Tiwari on January 25, 2011 at 9:25pm — 1 Comment

कविता :- कहाँ गणतंत्र

कविता :- कहाँ गणतंत्र

 

फेल हुए सब मंत्र…

Continue

Added by Abhinav Arun on January 25, 2011 at 3:51pm — 10 Comments

मोती बीए: भोजपुरी कवि (1919-2009)







मोती बीए: भोजपुरी कवि (1919-2009)…

Continue

Added by R N Tiwari on January 25, 2011 at 11:33am — 1 Comment

ग़ज़ल : दरख़्त बदल रहा है

दरख़्त बदल रहा है

स्वयं खा फल रहा है ।१।

 

मैं लाया आइना क्यूँ

ये सबको खल रहा है ।२।

 

दिया सबने जलाया

महल अब गल रहा है ।३।

 

छुवन वो प्रेम की भी

अभी तक मल रहा है ।४।

 

डरा बच्चों को ही अब

बड़ों का बल रहा है ।५।

 

लिखा जिस पर खुदा था

वही घर जल रहा है ।६।

 

दहाड़े जा रहा वो

जो गीदड़ कल रहा है ।७।

 

उगा तो जल चढ़ाया

अगन दो ढल रहा है ।८।

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 24, 2011 at 9:30pm — 3 Comments

Monthly Archives

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 101 in the group चित्र से काव्य तक
"जय हो.. "
4 hours ago
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post अरसा गुज़र गया है कोई गुफ़्तुगू नहीं (६२ )
"हार्दिक आभार बृजेश कुमार बृज जी "
7 hours ago
surender insan commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post नए ख्वाब दिखाने वाला - ग़ज़ल
"आदरणीय बसन्त जी अच्छी ग़ज़ल कही आपने । बधाई स्वीकार करें जी।"
8 hours ago
surender insan commented on सतविन्द्र कुमार राणा's blog post नहीं अच्छा है यूँ मजबूर होना- ग़ज़ल
"अच्छी ग़ज़ल हुई हक़ी सतविंदर भाई जी। मुबारकबाद कबूल करे।"
8 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on विनय कुमार's blog post व्यस्तता- लघुकथा
"हार्दिक बधाई आदरणीय विनय कुमार जी। बेहतरीन लघुकथा।"
8 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दीप बुझा करते है जिसके चलने पर - गजल( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर')
"हार्दिक बधाई आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर जी। बेहतरीन गज़ल। जख्म दिए  हैं …"
8 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-लालफीताशाही-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"हार्दिक बधाई आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी। बेहतरीन गज़ल। ये  कहा था …"
9 hours ago
TEJ VEER SINGH commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post दु:स्वप्न (लघुकथा )
"हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी। बेहतरीन प्रस्तुति।एक पौराणिक प्रसंग को अति सुंदर…"
9 hours ago
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post उजास- लघुकथा
"इस टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब"
10 hours ago
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post व्यस्तता- लघुकथा
"इस टिप्पणी के लिए बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब"
10 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा posted a blog post

नहीं अच्छा है यूँ मजबूर होना- ग़ज़ल

1222 1222 122 नहीं अच्छा है यूँ मजबूर होना दिखें हैं साथ लेकिन दूर होना।कली का कुछ समय को ठीक है,…See More
14 hours ago
सतविन्द्र कुमार राणा commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-लालफीताशाही-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"उत्तम अति उत्तम!"
14 hours ago

© 2019   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service